PURAANIC SUBJECT INDEX

पुराण विषय अनुक्रमणिका

(Sa to Suvarnaa)

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

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Sa - Sangata  ( words like Samjnaa / Sanjnaa / Sangya, Samvatsara / year, Samvarta, Sansaara / Samsaara, Samskaara / Sanskaara, Sagara, Samkarshana / Sankarshana, Samkraanti / Sankraanti etc.)

Sangama - Satyaloka (Sangama/confluence, Sangeeta / music, Sati, Satva, Satya/truth, Satyatapaa, Satyabhaamaa etc.)

Satyavat - Sanatkumaara ( Satyavatee /Satyavati, Satyavrata, Satyaa, Satraajit, Sadyojaata, Sanaka, Sanakaadi, Sanatkumaara etc. )

Sanatsujaata - Saptarshi (Sanandana, Sanaatana, Santaana, Sandhi, Sandhyaa, Samnyaasa / Sanyaasa, Saptami, Saptarshi etc.)

Saptavimshatikaa - Samunnata ( Saptashati, Sabhaa / Sabha, Samaadhi, Samidhaa, Samudra / ocean, Samudramanthana etc.)

Samriddhi - Sarasvati (Sampaati / Sampaatee, Sara / pond, Saramaa, Sarayuu, Sarasvati / Sarasvatee etc. )

Saritaa - Sahajaa (Sarga / manifestation, Sarpa / serpent, Sarva / whole, Savana, Savitaa etc.)

Sahadeva - Saadhya ( Sahadeva, Sahasranaama, Sahsraaksha, Sahasraarjuna, Saagara, Saankhya / Samkhya, Saadhu, Saadhya etc.)

Saadhvee - Saalakatankataa (  Saabhramati, Saama, Saamba / Samba, Saarasvata etc.)

Saalankaayana - Siddhasena  (Saavarni, Saavitri, Simha / lion, Simhikaa, Siddha etc.)

Siddhaadhipa - Suketumaan  (Siddhi / success, Sineevaali, Sindhu, Seetaa / Sita, Sukanyaa, Sukarmaa etc.) 

Sukesha - Sudarshana ( Sukesha, Sukha, Sugreeva, Sutapaa, Sudarshana etc. )

Sudarshanaa - Supaarshva   (Sudaamaa / Sudama, Sudyumna, Sudharmaa, Sundara / beautiful, Supaarshva etc.)

Suptaghna - Sumedhaa  ( Suprateeka, Suprabhaa, Subaahu, Subhadraa, Sumati, Sumanaa , Sumaalee / Sumali, Sumukha etc.)

Sumeru - Suvarnaa (Suyajna, Sumeru, Suratha, Surabhi / Surabhee, Surasaa, Suvarchaa, Suvarna / gold etc.)

 

 

 

सावित्री

टिप्पणी

1.वेद में सावित्री सविता की कन्या है जिसका विवाह सोम से किया गया है। ऋग्वेद 10.85 सूक्त सावित्री के विवाह को समर्पित है। दूसरी ओर, पुराणों में सावित्री का विवाह ब्रह्मा से करने का निर्देश है। कहा गया है कि ब्रह्मा के वीर्य को ही सावित्री शास्त्रों, रागों आदि के रूप में जन्म देती है। वेदों में सविता देवता की प्रतिष्ठा एक ऐसे प्राण के रूप में की गई है जिसको किसी भी कार्य को आरम्भ करने से पहले सक्रिय बनाना है(सवितुः प्रसविताभ्यां अश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां इति)। हो सकता है कि सविता देवता रूपी प्राण यह निर्देश देता हो कि अमुक कार्य को सर्वश्रेष्ठ रूप में इस प्रकार सम्पन्न किया जा सकता है।

2.ऐसा प्रतीत होता है कि सविता रूपी प्राण सम्पूर्ण प्रकृति का प्रसुवन नहीं कर सकता। प्रसुवन की उसकी शक्ति केवल उसकी कन्या सावित्री तक ही सीमित है। वेद के सूक्त में सावित्री को सूर्या सावित्री नाम दिया गया है। सूर्या शब्द से र अक्षर का लोप कर देने पर यह सूया हो जाता है। अतः कहा जा सकता है कि सावित्री उस प्रकृति का नाम है जो सविता की भांति प्रसुवन करने में समर्थ है। हम सभी प्रकृति के अधिक निकट हैं, पुरुष के निकट कम हैं। लौकिक रूप में, पुरुष की साधना कठिन होती है, फल भी देर से मिलता है। शक्ति की साधना त्वरित है, तुरन्त फल देने वाली है।

3.पुराण कथा में सावित्री को राजा अश्वपति की कन्या का रूप दिया गया है। अश्वमेध याग में यजमान यज्ञस्थल पर प्रतिष्ठित रहता है और अश्व सारे भूमण्डल पर एक वर्ष तक विचरण करता है। लेकिन यह समझा जाता है कि यद्यपि अश्व यजमान से दूर चला गया है, लेकिन यजमान अश्व पर से अपना नियन्त्रण नहीं खोएगा। इसीलिए सावित्री की कथा में उसे अश्वपति कहा गया है। अश्व की विशेषता यह है कि वह श्वः से, भूत भविष्य से, कार्य- कारण से परे है। शकुन, पक्षी के रूप में कभी कभी अश्व की स्थिति प्राप्त हो जाए, यह पर्याप्त नहीं है। सर्वत्र, सदैव, संवत्सर पर्यन्त ऐसी स्थिति रहे, उसे अश्व और अश्वपति कह सकते हैं। एक ओर सविता देव की कन्या सावित्री है, दूसरी ओर पृथिवी पर अश्वपति की कन्या सावित्री है। स्पष्ट है कि अश्वपति सविता देव का ही मर्त्य स्तर का रूप है।

5.शतपथ ब्राह्मण 9.5.1.43(सावित्राणि प्रायणं वैश्वकर्मणान्युदयनं) व 10.4.1.16(तस्यार्धमेव सावित्राण्यर्धं वैश्वकर्मणान्यष्टावेवास्य कलाः सावित्राण्यष्टौ वैश्वकर्मणान्यथ यदेतदन्तरेण कर्म क्रियते स एव सप्तदशः प्रजापतिः) से संकेत मिलता है कि सावित्र प्रक्रिया दैव का, भाग्य का रूपान्तरण है। उसके फलस्वरूप जो कार्य होगा वह पुरुषार्थ है। यहां पुरुषार्थ को विश्वकर्मा कृत कहा गया है, अर्थात् अब पुरुषार्थ मात्र पुरुषार्थ नहीं रह जाएगा, अपितु देवों के शिल्पी विश्वकर्मा द्वारा किया गया कार्य होगा।

6.वट-सावित्री व्रत में वट वृक्ष की पूजा की जाती है। वैदिक कर्मकाण्ड में वट शब्द प्रकट नहीं हुआ है, अपितु अवट प्रकट हुआ है। सोमयाग आदि में यूप की तथा औदुम्बरी की प्रतिष्ठा अवट नामक एक छिछले गर्त में की जाती है। यूप को ही पुराणों का वट वृक्ष कहा जा सकता है। कहा गया है कि यूप का जो भाग अवट में रहता है, वह पितृदेवत्य होता है, अर्थात् उससे हमारे जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं क्षुधा आदि का निवारण होता है। स्वयं हमारा यह शरीर भी एक यूप है। इस शरीर में पाद से लेकर शिर तक के अंग क्रमिक रूप से विकसित से विकसिततर होते चले जाते हैं। शिर में जाकर ज्ञानेन्द्रियों का विकास हो जाता है, जो पाद में अविकसित स्थिति में ही रहती हैं।

कुशतर्पणदेशे तु तत्तीर्थं कुशतर्पणम्॥

तत्रैव कल्पितो यूपो मया विन्ध्यस्य चोत्तरे।

विसृष्टो लोकपूज्योऽसौ विष्णोरासीत्समाश्रयः॥

अक्षयश्चाभवच्छ्रीमानक्षयोऽसौ वटोऽभवत्।

नित्यश्च कालरूपोऽसौ स्मरणात्क्रतुपुण्यदः॥ ब्रह्म पुराण 2.91.६७॥

 

ज्योति अप्तोर्याम सोमयाग, गार्गेयपुरम् कर्नूल, आंध्रप्रदेश, (20 जनवरी से 1 फरवरी, 2015) को आरुणकेतुक अग्नि के समीप स्थित यूप का एक चित्र

 

गाथा वटवृक्ष की

तीर्थदीपिका में पाँच वटवृक्षों का वर्णिन मिलता है-
वृंदावने वटो वंशी प्रयागेय मनोरथा:
गयायां अक्षय ख्यातः कल्पस्तु पुरुषोत्तमे ।।
निष्कुंभ खलु लंकायां मूलैकः पंचधावटः ।
स्तेषु वटमूलेषु सदा तिष्ठति माधवः ।।

 

7.पुराणों की कथाओं में वट वृक्ष को गरुड भी कह दिया गया है। इसका अर्थ होगा कि अपने शरीर को गरुड का रूप देना है जिस पर विष्णु विराजमान हो सकें(मार्कण्डेय वट पर बालमुकुन्द के विराजमान होने की कथा सर्वप्रसिद्ध है)। वट धातु का उल्लेख कईं अर्थों में किया गया है जैसे आवेष्टने, अवयवे(पीसना), परिभाषणे, विभाजने आदि। यदि आवेष्टन अर्थ लिया जाए तो इस अर्थ का उपयोग  सोमयाग में  श्येन चिति की प्रतिष्ठा के संदर्भ में किया जा सकता है। सोमयाग में एक के ऊपर एक ईंट रखकर श्येन चिति की स्थापना की जाती है। यह यूप स्थापना का ही एक विकसित रूप है। एक इष्टिका (ईंट) के ऊपर जो दूसरी इष्टिका रखी जाएगी, उसकी अव्यवस्था पहले वाली इष्टिका से कम होने चाहिए। सबसे ऊपर की इष्टिका में ब्रह्माण्ड में उडने की सामर्थ्य, विष्णु को धारण करने की सामर्थ्य होनी चाहिए। उपनिषदों में वट वृक्ष को अन्नमय से लेकर आनन्दमय कोशों का, ध्यान, धारणा, समाधि आदि अष्टांग योग का प्रतीक कहा गया है।  

ज्योति अप्तोर्याम सोमयाग, गार्गेयपुरम् कर्नूल, आंध्रप्रदेश, (20 जनवरी से 1 फरवरी, 2015) को श्री राजशेखर शर्मा के संग्रह से गृहीत श्येनचिति का एक चित्र

गरुडो वटभाण्डीरः सुदामा नारदो मुनिः ॥ २४॥

वृन्दा भक्तिः क्रिया बुद्धीः सर्वजन्तुप्रकाशिनी । - कृष्णोपनिषद

 

8.पौराणिक कर्मकाण्ड में वटवृक्ष को कच्चे सूत्र द्वारा आवेष्टित किया जाता है। वैदिक कर्मकाण्ड में यूप के ऊपर रशना लपेटी जाती है। निहितार्थ अन्वेषणीय है।

9.यह एक विवाद का विषय रहा है कि सावित्री और गायत्री में क्या अन्तर है। गायत्री मन्त्र तत् सवितुर् वरेण्यं में भी सविता देव का ही नाम प्रकट होता है। कहा गया है कि गायत्री दो भुजाओं वाली है, सावित्री चार भुजाओं वाली। दो भुजाएं ऊर्ध्व व अधो दिशाओं का प्रतीक हो सकता है। डा. फतहसिंह इस तथ्य की व्याख्या इस प्रकार किया करते थे कि मनुष्य में दो त्रिलोकी निहित हैं। एक त्रिलोकी अन्नमय कोश, प्राणमय कोश व मनोमय कोश से बनी है। दूसरी त्रिलोकी मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश व आनन्दमय कोश से बनी है। अध्यात्म में यह ऊर्ध्व विकास की स्थिति है जो गायत्री साधना का मार्ग है। मनुष्य का मार्ग यही है। दूसरी ओर पशुओं का मार्ग है जो तिर्यक् विकास ही कर सकते हैं। उनके चार पैर हैं। सावित्री का विकास चारों दिशाओं के अनुदिश है। जब वट वृक्ष का निर्माण किया जाता है तो इसका अर्थ होगा कि चारों दिशाओं को समेट कर ऊर्ध्व अधो दिशाओं तक सीमित करना है। सावित्री क्रमिक साधना का मार्ग है, गायत्री त्वरित साधना का। स्वयं सविता देव को गायत्री वर्ग में रखा गया है(एष वै गायत्रो देवानां यत् सविता तै.सं. 6.5.7.1)। जैसे जैसे सविता प्राण का वास्तविक जीवन में, प्रकृति में अवतरण कराने का प्रयास किया जाएगा, वह सावित्री प्रकार का बनता जाएगा। द्वादशाह आदि कर्मकाण्ड में स्थिति की गंभीरता के साथ, आवश्यकता के साथ गायत्री मन्त्र बदल दिया जाता है। उदाहरण के लिए, ऐतरेय ब्राह्मण में कण्डिका 4.30, 4.32, 5.5, 5.13,5.17, 5.19, 5.21, 5.26 में द्वादशाह के 10 दिनों में प्रयुक्त होने वाले सावित्री मन्त्रों को दिया गया है।  

10.जो मूलभूत तत्त्व प्रेरणा, सूया प्रक्रिया करते हैं, उनमें प्राण और मन का नाम आया है(शतपथ ब्राह्मण 4.4.1.1, 4.4.1.7)। कहा गया है कि प्रेरणा देते समय वाक् के, कर्म के दोनों ओर दोनों का योगदान होना चाहिए। कभी मन पहले होता है तो कभी प्राण। इस प्रकार मन, वाक्, प्राण मिलकर चन्द्रमा, पृथिवी, सूर्य रूपी संवत्सर का निर्माण करते हैं।

11. शतपथ ब्राह्मण 12.9.1.3 में हृदय को ऐन्द्र पुरोडाश तथा यकृत को सावित्र पुरोडाश कहा जा रहा है(हृदयमेवास्यैन्द्रः पुरोडाशः। यकृत् सावित्रः। क्लोमा वारुणः)। चूंकि परम्परागत रूप से हृदय को प्रेम का स्थान माना जाता है, अतः यह कहा जा सकता है कि यकृत आदि प्रेम से निम्नतर स्थितियां मैत्री, कृपा, उपेक्षा आदि हैं। इन्हें सावित्र कहा जा रहा है। स्वयं हृदय गायत्री की स्थिति हो सकती है। शतपथ ब्राह्मण 12.9.1.8 के कथन से स्थिति और अधिक स्पष्ट हो जाती है(पूर्ववयसमैन्द्रेण। मध्यमवयसं सावित्रेण। उत्तमवयसं वारुणेन) । गायत्री गो रूपा है, सावित्री अश्व रूपा। वास्तुसूत्रोपनिषद ६.२१टीका में सावित्री मेधा रूपा, गायत्री ज्ञानरूपा, सरस्वती प्रज्ञारूपा होने का कथन ध्यान देने योग्य है।

12. यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है कि वट-सावित्री व्रत का विधान ज्येष्ठ कृष्ण अमावास्या को है या ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को।

13.स्कन्द पुराण 5.1.56.14 में सूर्या सावित्री के अतिरिक्त अनुसूर्या सावित्री का भी उल्लेख है जो सूर्य की पत्नी संज्ञा का उपनाम है। अनुसूर्या नाम अत्रि पत्नी अनसूया की ओर संकेत करता है। देवी सावित्री ऋग्वेद, यजुर्वेद व सामवेद को प्रकट करने वाली है। अत्रि की स्थिति में लगता है कि यह तीनों मिलकर एक हो जाते हैं।

14.

प्रथम लेखन 22-5-2015ई.( ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी , विक्रम संवत् 2072)

 

सावित्री अग्नि १९४.४(ज्येष्ठ मास में सावित्री अमावास्या पूजा की विधि),

वक्ष्ये सावित्र्यमावास्याम्भुक्तिमुक्तिकरीं शुभां  ॥१९४.००४

पञ्चदश्यां व्रती ज्यैष्ठे वटमूले महासतीं  ।१९४.००५

त्रिरात्रोपोषिता नारी सप्तधान्यैः प्रपूजयेत् ॥१९४.००५

प्ररूढैः कण्ठसूत्रैश्च रजन्यां कुङ्कुमादिभिः  ।१९४.००६

वटावलम्बनं कृत्वा नृत्यगीतैः प्रभातके  ॥१९४.००६

नमः सावित्र्यै सत्यवते नैवेद्यं चार्पयेद्द्विजे  ।१९४.००७

वेश्म गत्वा द्विजान् भोज्य स्वयं भुक्त्वा विसर्जयेत् ॥१९४.००७

सावित्री प्रीयतां देवी सौभाग्यादिकमाप्नुयात् ॥८॥१९४.००८

 

इत्याग्नेये महापुराणे तिथिव्रतानि नाम चतुर्नवत्यधिकतशततमोऽध्यायः ॥

 

गणेश १.७६.२(बुध - भार्या, वेश्यारत पति द्वारा हत्या, स्वर्ग प्राप्ति), २.३६.६(ब्रह्मा के यज्ञ में सावित्री को आहूत न करने पर सावित्री द्वारा देवों को जड होने का शाप), गरुड १.९४.११(प्रातःकाल गायत्री तथा सायंकाल सावित्री जप का निर्देश), १.९४.२४(सावित्री पतित की व्रात्य संज्ञा), ३.१६.८२(विरिञ्च-पत्नी), देवीभागवत  ९.१.३८(५ प्रकृतियों में चतुर्थ सावित्री देवी का स्वरूप व महिमा), ९.२६(सावित्री पूजा व स्तुति विधान, पराशर द्वारा अश्वपति को कथन), ९.२७+ (सावित्री - सत्यवान् की कथा, यम से कर्म फल विषयक वार्तालाप), १२.६.१५०(गायत्री सहस्रनामों में से एक), नारद १.२७, १.८३.१०९(सावित्री की राधा से उत्पत्ति, स्वरूप व मन्त्र विधान ; १०८ नाम), १.८३.१२८(सावित्री पञ्जर स्तोत्र का कथन), पद्म १.१७(ब्रह्मा के यज्ञ में सावित्री द्वारा देवों को शाप का प्रसंग), १.१७.८१(ब्रह्मा के यज्ञ में विष्णु द्वारा सावित्री की स्तुति, तीर्थों में सावित्री के नाम), १.२२, १.३४.७५(सावित्री के ब्रह्मा के यज्ञ में आगमन का वृत्तान्त, गायत्री के ब्रह्मा के वामाङ्ग में तथा सावित्री के दक्षिणाङ्ग में स्थित होकर कार्य करने का उल्लेख), १.३४.७५(पुष्कर में गायत्री के ब्रह्म के वाम पार्श्व में तथा सावित्री? के दक्षिण पार्श्व में स्थित होने का उल्लेख), ३.२१, ६.१११(स्वरा नाम, ब्रह्मा के यज्ञ में शाप देने की कथा), ६.२२८(अष्ट दल कमल में कर्णिका का रूप), ब्रह्म २.३२(ब्रह्मा द्वारा स्वसुता का अनुगमन करने पर गायत्री, सावित्री आदि पांच सुताओं का नदीभूत होकर गङ्गा से सङ्गम), ब्रह्मवैवर्त्त १.४.२(कृष्ण की रसनाग्र से सावित्री की उत्पत्ति का कथन), १.८.१(सावित्री द्वारा ब्रह्मा के वीर्य को धारण कर शास्त्रों, रागों आदि को जन्म देने का कथन), २.२३(सावित्री - सत्यवान् उपाख्यान), २.२५+ (सावित्री का यम से संवाद), ३.७.१०३(तेजोरूप कृष्ण की स्तुति में सावित्री के शब्द), ४.६.१४३(सावित्री का नाग्नजिती रूप में अवतरण), ४.४५(सावित्री द्वारा शिव विवाह में हास्य), ४.१०९(सावित्री द्वारा कृष्ण व रुक्मिणी विवाह में हास्य), भविष्य १४, ४.१०२(सावित्री व्रत व सावित्री - सत्यवान् की कथा), भागवत ६.१८.१(सविता व पृश्नि - पुत्री), मत्स्य ३.३०(सावित्री की ब्रह्मा से उत्पत्ति, ब्रह्मा द्वारा सावित्री रूप के अवलोकनार्थ मुखों की सृष्टि, सरस्वती उपनाम), , २०८+ (सावित्री - सत्यवान् की कथा, यम से वार्तालाप, वर प्राप्ति), वराह २.६८(नारद द्वारा वेद रूपी शरीर धारी सावित्री के दर्शन), विष्णुधर्मोत्तर १.४१.९(ओंकार पुरुष, सावित्री प्रकृति), २.३६+ (सावित्री - सत्यवान् उपाख्यान), ३.६३, स्कन्द ३.१.४०.१( गायत्री व सरस्वती का वृत्तान्त) ५.१.५६.१४(अनुसूर्या सावित्री : त्वष्टा - पुत्री, सूर्य - पत्नी संज्ञा का उपनाम, वडवा रूप में शिप्रा सङ्गम पर सूर्य से मिलन), ५.१.६६(सावित्री व्रत की महिमा), ५.२.५२.१०, ५.२.५८.१३(सावित्री कन्या के दर्शन से नारद द्वारा वेदों की विस्मृति का वृत्तान्त), ५.३.१३.४२(सावित्र १४ कल्पों में से एक), ५.३.२८.१७(शिव के रथ में गायत्री व सावित्री द्वारा रश्मिबन्धन का कार्य करने का उल्लेख), ५.३.२००(गायत्री व सावित्री का स्वरूप, सावित्री तीर्थ का माहात्म्य),

युधिष्ठिर उवाच -

सावित्री का द्विजश्रेष्ठ कथं वाराध्यते बुधैः  ।

प्रसन्ना वा वरं कं च ददाति कथयस्व मे  ॥ २००.२ ॥

 

श्रीमार्कण्डेय उवाच -

पद्मा पद्मासनस्थेनाधिष्ठिता पद्मयोगिनी  ।

सावित्रतेजःसदृशी सावित्री तेन चोच्यते  ॥ २००.३ ॥

पद्मानना पद्मवर्णा पद्मपत्रनिभेक्षणा  ।

ध्यातव्या ब्राह्मणैर्नित्यं क्षत्रवैश्यैर्यथाविधि  ॥ २००.४ ॥

ब्रह्महत्याभयात्सा हि न तु शूद्रैः कदाचन  ।

उच्चारणाद्धारणाद्वा नरके पतति ध्रुवम्  ॥ २००.५ ॥

वेदोच्चारणमात्रेण क्षत्रियैर्धर्मपालकैः  ।

जिह्वाछेदोऽस्य कर्तव्यः शूद्रस्येति विनिश्चयः  ॥ २००.६ ॥

बाला बालेन्दुसदृशी रक्तवस्त्रानुलेपना  ।

उषःकाले तु ध्यातव्या सन्ध्या सन्धान उत्तमे  ॥ २००.७ ॥

उत्तुङ्गपीवरकुचा सुमुखी शुभदर्शना  ।

सर्वाभरणसम्पन्ना श्वेतमाल्यानुलेपना  ॥ २००.८ ॥

श्वेतवस्त्रपरिच्छन्ना श्वेतयज्ञोपवीतिनी  ।

मध्याह्नसन्ध्या ध्यातव्या तरुणा भुक्तिमुक्तिदा  ॥ २००.९ ॥

प्रदोषे तु पुनः पार्थ श्वेता पाण्डुरमूर्धजा  ।

सुमृता तु दुर्गकान्तारे मातृवत्परिरक्षति  ॥ २००.१० ॥

विशेषेण तु राजेन्द्र सावित्रीतीर्थमुत्तमम्  ।

स्नात्वाचम्य विधानेन मनोवाक्कायकर्मभिः  ॥ २००.११ ॥

प्राणायामैर्दहेद्दोषान् सप्तजन्मार्जितान्बहून्  ।

आपोहिष्ठेति मन्त्रेण प्रोक्षयेदात्मनस्तनुम्  ॥ २००.१२ ॥

नवषट्च तथा तिस्रस्तत्र तीर्थे नृपोत्तम  ।

आपोहिष्ठेति त्रिरावृत्य प्रतिग्राहैर्न लिप्यते  ॥ २००.१३ ॥

अघमर्षणं त्र्यृचं तोयं यथावेदमथापि वा  ।

उपपापैर्न लिप्येत पद्मपत्रमिवाम्भसा  ॥ २००.१४ ॥

त्र्यापं हि कुरुते विप्र उल्लेखत्रयमाचरेत् ।

चतुर्थं कारयेद्यस्तु ब्रह्महत्यां व्यपोहति  ॥ २००.१५ ॥

द्रुपदाख्यश्च यो मन्त्रो वेदे वाजसनेयके  ।

अन्तर्जले सकृज्जप्तः सर्वपापक्षयंकरः  ॥ २००.१६ ॥

उदुत्यमिति मन्त्रेण पूजयित्वा दिवाकरम्  ।

गायत्रीं च जपेद्देवीं पवित्रां वेदमातरम्  ॥ २००.१७ ॥

गायत्रीं तु जपेद्देवीं यः सन्ध्यानन्तरं द्विजः  ।

सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोकं स गच्छति  ॥ २००.१८ ॥

दशभिर्जन्मभिर्लब्धं शतेन तु पुराकृतम्  ।

त्रियुगं तु सहस्रेण गायत्री हन्ति किल्बिषम्  ॥ २००.१९ ॥

गायत्रीसारमात्रोऽपि वरं विप्रः सुयन्त्रितः  ।

नायन्त्रितश्चतुर्वेदी सर्वाशी सर्वविक्रयी  ॥ २००.२० ॥

सन्ध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु  ।

यदन्यत्कुरुते किंचिन्न तस्य फलभाग्भवेत् ॥ २००.२१ ॥

सन्ध्यां नोपासते यस्तु ब्राह्मणो मन्दबुद्धिमान्  ।

स जीवन्नेव शूद्रः स्यान्मृतः श्वा सम्प्रजायते  ॥ २००.२२ ॥

सावित्रीतीर्थमासाद्य सावित्रीं यो जपेद्द्विजः  ।

त्रैविद्यं तु फलं तस्य जायते नात्र संशयः  ॥ २००.२३ ॥

पित्ःनुद्दिश्य यः स्नात्वा पिण्डनिर्वपणं नृप  ।

कुरुते द्वादशाब्दानि तृप्यन्ति तत्पितामहाः  ॥ २००.२४ ॥

सावित्रीतीर्थमासाद्य यः कुर्यात्प्राणसंक्षयम्  ।

ब्रह्मलोकं वसेत्तावद्यावदाभूतसम्प्लवम्  ॥ २००.२५ ॥

 

 ६.१८१(ब्रह्मा के यज्ञ में सावित्री के न आने पर गोप कन्या रूपी गायत्री द्वारा यज्ञ का अनुष्ठान), ६.१८८, ६.१९१+ (सावित्री द्वारा ब्रह्मा के यज्ञ में आए देवों को शाप, गायत्री द्वारा उत्शाप), ६.१९२(सावित्री पूजा का माहात्म्य), ६.२५२.१०(चातुर्मास में तिलों में सावित्री की स्थिति का उल्लेख),

ब्रह्मा तु वटमाश्रित्य प्राणिनां स वरप्रदः ।। 6.252.१० ।। सावित्रीं तिलमास्थाय पवित्रं श्वेतभूषणम् ।। सुप्ते देवे विशेषेण तिलसेवा महाफला ।। ११ ।। तिलाः पवित्रमतुलं तिला धर्मार्थसाधकाः ।। तिला मोक्षप्रदाश्चैव तिलाः पापापहारिणः ।। १२ ।। तिला विशेषफलदास्तिलाः शत्रुविनाशनाः । तिलाः सर्वेषु पुण्येषु प्रथमं समुदाहृताः ।। १३ ।। न तिला धान्यमित्याहुर्देवधान्यमिति स्मृतम् ।। तस्मात्सर्वेषु दानेषु तिल दानं महोत्तमम् ।। १४ ।। कनकेन युता येन तिलादत्तास्तु शूद्रज ।। ब्रह्महत्यादिपापानां विनाशस्तेन वै कृतः ।। १५ ।। सावित्री च तिलाः प्रोक्ता सर्वकार्यार्थसाधकाः ।। तिलैस्तु तर्पणं कुर्याच्चातुर्मास्ये विशेषतः ।। १६ ।। तिलानां दर्शनं पुण्यं स्पर्शनं सेवनं तथा ।। हवनं भक्षणं चैव शरीरोद्वर्त्तनं तथा ।। १७ ।। सर्वथा तिलवृक्षोऽयं दर्शनादेव पापहा ।। चातुर्मास्ये विशेषेण सेवितः सर्वसौख्यदः ।। १८ ।।

६.२७८, ७.१.१५१(सावित्री द्वारा भैरवेश्वर लिङ्ग की स्थापना), ७.१.१६५(ब्रह्मा के यज्ञ में गायत्री की प्रतिष्ठा पर सावित्री द्वारा देवों को शाप), ७.१.१६६(सावित्री व सत्यवान की कथा), लक्ष्मीनारायण १.२००, १.२६७, १.३०४, १.३१८.३५(सती व रुद्र की मानस पुत्री वम्री के वट सावित्री आदि बनने का कथन), १.३६४.३४, १.३६६, १.३८५.४७(सावित्री का कार्य : यज्ञोपवीत), १.४४१.८२(सावित्री का तिल गुल्म के रूप में अवतार), १.५०९.६९(सावित्री के गायत्री रूप में जन्म लेने का वृत्तान्त ), १.५१२, १.५२२, ४.६४, ४.७५, ४.१०१.९३, कथासरित् १४.१.२२(अङ्गिरा द्वारा अष्टावक्र कन्या सावित्री को भार्या रूप में प्राप्त न कर पाने का कथन), वास्तुसूत्रोपनिषद ६.२१टीका(सावित्री मेधा रूपा, गायत्री ज्ञानरूपा, सरस्वती प्रज्ञारूपा),  saavitree/ savitri

 

वटसावित्री स्कन्द ७.१.१६६(ज्येष्ठ पूर्णिमा को सावित्री व्रत की विधि व सत्यवान् - सावित्री कथा),

देव्युवाच ।। ।। प्रभासे संस्थिता या तु सावित्री ब्रह्मणः प्रिया ।। तस्याश्चरित्रं मे ब्रूहि देवदेव जगत्पते ।। १ ।। व्रतमाहात्म्यसंयुक्तमितिहाससमन्वितम् ।। पातिव्रत्यकरं स्त्रीणां महाभाग्यं महोदयम् ।। २ ।। ।। ईश्वर उवाच ।। ।। कथयामि महादेवि सावित्र्याश्चरितं महत् ।। प्रभासक्षेत्रसंस्थायाः स्थल स्थाने महेश्वरि ।। यथा चीर्णं व्रतकरं सावित्र्या राजकन्यया ।। ३ ।। आसीन्मद्रेषु धर्मात्मा सर्वभूतहिते रतः ।। पार्थिवोऽश्वपतिर्नाम पौरजानपद प्रियः ।। ४ ।। क्षमावाननपत्यश्च सत्यवादी जितेन्द्रियः ।। प्रभासक्षेत्रयात्रायामाजगाम स भूपतिः ।। यात्रां कुर्वन्विधानेन सावित्रीस्थलमागतः ।। ५ ।। स सभार्यो व्रतमिदं तत्र चक्रे नृपः स्वयम् ।। सावित्रीति प्रसिद्धं यत्सर्वकामफलप्रदम् ।। ६ ।। तस्य तुष्टाऽभवद्देवि सावित्री ब्रह्मणः प्रिया ।। भूर्भुवःस्वरितीत्येषा साक्षान्मूर्तिमती स्थिता ।। ७ ।। कमंडलुधरा देवी जगामादर्शनं पुनः ।। कालेन हुना जाता दुहिता देवरूपिणी ।। ८ ।। सावित्र्या प्रीतया दत्ता सावित्र्याः पूजया तथा ।। सावित्रीत्येव नामाऽस्याश्चक्रे विप्राज्ञया नृपः।। ९ ।। सा विग्राहवतीव श्रीः प्रावर्धत नृपात्मजा ।। सावित्री सुकुमारांगी यौवनस्था बभूव ह ।। १० ।। या सुमध्या पृथुश्रोणी प्रतिमा काञ्चनी यथा ।। प्राप्तेयं देवकन्या वा दृष्ट्वा तां मेनिरे जनाः ।। ।। ११ ।। सा तु पद्मा विशालाक्षी प्रज्वलतीव तेजसा ।। चचार सा च सावित्री व्रतं यद्धृगुणोदितम् ।।१२।। अथोपोष्य शिरःस्नाता देवतामभिगम्य च ।। हुत्वाग्निं विधिवद्विप्रान्वाचयेद्वरवर्णिनी ।।१३।। तेभ्यः सुमनसः शेषां प्रतिगृह्य नृपात्मजा।। सखीपरिवृताऽभ्येत्य देवी श्रीवत्सरूपिणी ।।१४।। साऽभिवाद्य पितुः पादौ शेषां पूर्वं निवेद्य च ।। कृताञ्जलिर्वरारोहा नृपतेः पार्श्वतः स्थिता ।। १५ ।। तां दृष्ट्वा यौवनप्राप्तां स्वां सुतां देवरूपिणीम् ।। उवाच राजा संमन्त्र्य पुत्र्यर्थं सह मन्त्रिभिः ।। १६ ।। पुत्रि प्रदानकालस्ते न हि कश्चिद्वृणोति माम् ।। विचारयन्न पश्यामि वरं तुल्यमिहात्मनः ।। ।।१७।।देवादीनां यथा वाच्यो न भवेयं तथा कुरु ।।पठ्यमानं मया पुत्रि धर्मशास्त्रेषु च श्रुतम् ।।१८।। पितुर्गेहे तु या कन्या रजः पश्यत्यसंस्कृता ।। ब्रह्महत्या पितुस्तस्य सा कन्या वृषली स्मृता ।। १९ ।। अतोऽर्थं प्रेषयामि त्वां कुरु पुत्रि स्वयंवरम् ।। वृद्धैरमात्यैः सहिता शीघ्रं गच्छावधारय ।। ।। 7.1.166.२० ।। एवमस्त्विति सावित्री प्रोच्य तस्माद्विनिर्ययौ ।। तपोवनानि रम्याणि राजर्षीणां जगाम सा ।। २१ ।। मान्यानां तत्र वृद्धानां कृत्वा पादाभिवन्दनम् ।। ततोऽभिगम्य तीर्थानि सर्वाण्येवाश्रमाणि च ।। २२ ।।आजगाम पुनर्वेश्म सावित्री सह मंत्रिभिः ।। तत्रापश्यत देवर्षिं नारदं पुरतः शुचिम् ।। २३ ।। आसीनमासने विप्रं प्रणम्य स्मितभाषिणी ।। कथयामास तत्कार्यं येनारण्यं गता च सा ।। २४ ।। ।। सावित्र्युवाच ।। आसीच्छाल्वेषु धर्मात्मा क्षत्रियः पृथिवीपतिः ।। द्युमत्सेन इति ख्यातो दैवादन्धो भूव सः ।। २५ ।। आर्यस्य बालपुत्रस्य द्युमत्सेनस्य रुक्मिणा ।। सामन्तेन हृतं राज्यं छिद्रेऽस्मिन्पूर्ववैरिणा ।। २६ ।। स बालवत्सया सार्धं भार्यया प्रस्थितो वनम् ।। २७ ।। स तस्य च वने वृद्धः पुत्रः परमधार्मिकः ।। सत्यवागनुरूपो मे भर्तेति मनसेप्सितः ।। २८ ।। ।। नारद उवाच ।। ।। अहो बत महत्कष्टं सावित्र्या नृपते कृतम् ।। बालस्वभावादनया गुणवान्सत्यवाग्वृतः ।। २९ ।। सत्यं वदत्यस्य पिता सत्यं माता प्रभाषते ।। सत्यं वदेति मुनिभिः सत्यवान्नाम वै कृतम् ।।7.1.166.३।। नित्यं चाश्वाः प्रियास्तस्य करोत्यश्वाश्च मृन्मयान् ।। चित्रेऽपि च लिखत्यश्वांश्चित्राश्व इति चोच्यते ।। ३१ ।। सत्यवान्रंतिदेवस्य शिष्यो दानगुणैः समः ।। ब्रह्मण्यः सत्यवादी च शिबिरौशीनरो यथा ।। ३२ ।। ययातिरिव चोदारः सोमवत्प्रियदर्शनः ।। रूपेणान्यतमोऽश्विभ्यां द्युमत्सेनसुतो बली ।। ३३ ।। एको दोषोऽस्ति नान्यश्च सोऽद्यप्रभृति सत्यवान् ।। संवत्सरेण क्षीणायुर्देहत्यागं करिष्यति ।। ३४ ।। नारदस्य वचः श्रुत्वा दुहिता प्राह पार्थिवम् ।। ३५ ।। ।। सावित्र्युवाच ।। ।। सकृल्पंति राजानः सकृज्जल्पंति ब्राह्मणाः ।। सकृत्कन्या प्रदीयेत त्रीण्येतानि सकृत्सकृत् ।। ३६ ।। दीर्घायुरथवाल्पायुः सगुणो निर्गुणोऽपि वा ।। सकृद्वृतो मया भर्ता न द्वितीयं वृणोम्यहम्  ।। ३७ ।। मनसा निश्चयं कृत्वा ततो वाचाऽभिधीयते ।। क्रियते कर्मणा पश्चात्प्रमाणं हि मनस्ततः ।। ३८ ।। ।। नारद उवाच ।। ।। यद्येतदिष्टं भवतः शीघ्रमेव विधीयताम् ।। अविघ्नेन तु सावित्र्याः प्रदानं दुहितुस्तव ।। ३९ ।। एवमुक्त्वा समुत्पत्य नारदस्त्रिदिवं गतः ।। राजा च दुहितुः सर्वं वैवाहिकमथाकरोत् ।। शुभे मुहूर्ते पार्श्वस्थैर्ब्राह्मणैर्वेदपारगैः ।। 7.1.166.४० ।। सावित्र्यपि च तं लब्ध्वा भर्तारं मनसेप्तितम् ।।। मुमुदेऽतीव तन्वंगी स्वर्गं प्राप्येव पुण्यकृत् ।। ४१ ।। एवं तत्राश्रमे तेषां तदा निवसतां सताम् ।। कालस्तु पश्यतां किञ्चिदतिचक्राम पार्वति ।। ४२ ।। सावित्र्यास्तु तदा नार्यास्तिष्ठन्त्याश्च दिवानिशम् ।। नारदेन यदुक्तं तद्वाक्यं मनसि वर्तते ।। ४३ ।। ततः काले बहुतिथे व्यतिक्रान्ते कदाचन ।। प्राप्तः कालोऽथ मर्तव्यो यत्र सत्यव्रतो नृपः ।। ४४ ।। ज्येष्ठमासे सिते पक्षे द्वादश्यां रजनीमुखे ।। गणयंत्याश्च सावित्र्या नारदोक्तं वचो हृदि ।। ४५ ।। चतुर्थेऽहनि मर्तव्यमिति संचिंत्य भामिनी ।। व्रतं त्रिरात्रमुद्दिश्य दिवारात्रं स्थिताऽऽश्रमे ।। ४६ ।। ततस्त्रिरात्रं न्यवसत्स्नात्वा संतर्प्य देवताम् ।। श्वश्रूश्वशुरयोः पादौ ववंदे चारुहासिनी ।। ४७ ।। अथ प्रतस्थे परशुं गृहीत्वा सत्यवान्वनम् ।। सावित्र्यपि च भर्तारं गच्छंतं पृष्ठतोऽन्वयात् ।। ४८ ।। ततो गृहीत्वा तरसा फलपुष्पसमित्कुशान् ।। अथ शुष्काणि चादाय काष्ठभारमकल्पयत् ।। ४९ ।। अथ पाटयतः काष्ठं जाता शिरसि वेदना ।। काष्ठभारं क्षणात्त्यक्त्वा वटशाखावलंबितः ।। 7.1.166.५० ।। सावित्रीं प्राह शिरसो वेदना मां प्रबाधते ।। तवोत्संगे क्षणं तावत्स्वप्तुमिच्छामि सुन्दरि ।। ५१ ।। विश्रमस्व महाबाहो सावित्री प्राह दुःखिता ।। पश्चादपि गमिष्यामि ह्याश्रमं श्रमनाशनम् ।। ।। ५२ ।। यावदुत्संगगं कृत्वा शिरोस्य तु महीतले ।। तावद्ददर्श सावित्री पुरुषं कृष्णपिंगलम् ।। ५३ ।। किरीटिनं पीतवस्त्रं साक्षात्सूर्यमिवोदितम् ।। तमुवाचाथ सावित्री प्रणम्य मधुराक्षरम् ।। ५४ ।। कस्त्वं देवोऽथवा दैत्यो यो मां धर्षितुमागतः ।। न चाहं केनचिच्छक्या स्वधर्माद्देव रोधितुम् ।। ५५ ।। विद्धि मां पुरुषश्रेष्ठ दीप्तामग्निशिखामिव ।। ५६ ।। ।। यम उवाच ।। ।। यमः संयमनश्चास्मि सर्वलोकभयंकरः ।। ५७ ।। क्षीणायुरेष ते भर्ता संनिधौ ते पतिव्रते ।। न शक्यः किंकरैर्नेतुमतोऽहं स्वयमागतः ।। ५८ ।। एवमुक्त्वा सत्यव्रतशरीरात्पाशसंयुतः ।। अंगुष्ठमात्रं पुरुषं निचकर्ष यमो बलात् ।। ५९ ।। अथ प्रयातुमारेभे पंथानं पितृसेवितम् ।। सावित्र्यपि वरारोहा पृष्ठतोऽनुजगाम ह ।। 7.1.166.६० ।। पतिव्रतत्वाच्चाश्रांता तामुवाच यमस्तथा ।। निवर्त गच्छ सावित्रि मुहूर्तं त्वमिहागता ।। ६१ ।। एष मार्गो विशालाक्षि न केनाप्यनुगम्यते ।। ६२ ।। ।। सावित्र्युवाच ।। ।। न श्रमो न च मे ग्लानिः कदाचिदपि जायते ।। भर्तारमनुगच्छन्त्या विशिष्टस्य च संनिधौ ।। ६३ ।। सतां सन्तो गतिर्नान्या स्त्रीणां भर्ता सदा गतिः ।। वेदो वर्णाश्रमाणां च शिष्याणां च गतिर्गुरुः ।। ६४ ।। सर्वेषामेव भूतानां स्थानमस्ति महीतले ।। भर्त्तारमेकमुत्सृज्य स्त्रीणां नान्यः समाश्रयः ।। ६५ ।। एवमन्यैः सुमधुरैर्वाक्यैर्धर्मार्थसंहितैः ।। तुतोष सूर्यतनयः सावित्रीं वाक्यमब्रवीत् ।। ६६ ।। ।। यम उवाच ।। ।। तुष्टोऽस्मि तव भद्रं ते वरं वरय भामिनि ।। सापि वव्रे च राज्यं स्वं विनयावनतानना ।। ६७ ।। चक्षुःप्राप्तिं तथा राज्यं श्वशुरस्य महात्मनः ।। पितुः पुत्रशतं चैव पुत्राणां शतमात्मनः ।। ६८ ।। जीवितं च तथा भर्तुर्धर्मसिद्धिं च शाश्वतीम् ।। धर्मराजो वरं दत्त्वा प्रेषयामास तां ततः ।। ६९ ।। अथ भर्तारमासाद्य सावित्री हृष्टमानसा ।। जगाम स्वाश्रमपदं सह भर्त्रा निराकुला ।। 7.1.166.७० ।।

लक्ष्मीनारायण १.३१८.३५(सती व रुद्र की मानसी कन्या वम्री का वटसावित्री बनना, वटसावित्री का तात्पर्य )

 

१०,०८५.०१  सत्येनोत्तभिता भूमिः सूर्येणोत्तभिता द्यौः ।

१०,०८५.०१ ऋतेनादित्यास्तिष्ठन्ति दिवि सोमो अधि श्रितः ॥

१०,०८५.०२  सोमेनादित्या बलिनः सोमेन पृथिवी मही ।

१०,०८५.०२ अथो नक्षत्राणामेषामुपस्थे सोम आहितः ॥

१०,०८५.०३  सोमं मन्यते पपिवान्यत्सम्पिंषन्त्योषधिम् ।

१०,०८५.०३ सोमं यं ब्रह्माणो विदुर्न तस्याश्नाति कश्चन ॥

१०,०८५.०४  आच्छद्विधानैर्गुपितो बार्हतैः सोम रक्षितः ।

१०,०८५.०४ ग्राव्णामिच्छृण्वन्तिष्ठसि न ते अश्नाति पार्थिवः ॥

१०,०८५.०५  यत्त्वा देव प्रपिबन्ति तत आ प्यायसे पुनः ।

१०,०८५.०५ वायुः सोमस्य रक्षिता समानां मास आकृतिः ॥

१०,०८५.०६  रैभ्यासीदनुदेयी नाराशंसी न्योचनी ।

१०,०८५.०६ सूर्याया भद्रमिद्वासो गाथयैति परिष्कृतम् ॥

१०,०८५.०७  चित्तिरा उपबर्हणं चक्षुरा अभ्यञ्जनम् ।

१०,०८५.०७ द्यौर्भूमिः कोश आसीद्यदयात्सूर्या पतिम् ॥

१०,०८५.०८  स्तोमा आसन्प्रतिधयः कुरीरं छन्द ओपशः ।

१०,०८५.०८ सूर्याया अश्विना वराग्निरासीत्पुरोगवः ॥

१०,०८५.०९  सोमो वधूयुरभवदश्विनास्तामुभा वरा ।

१०,०८५.०९ सूर्यां यत्पत्ये शंसन्तीं मनसा सविताददात् ॥

१०,०८५.१०  मनो अस्या अन आसीद्द्यौरासीदुत च्छदिः ।

१०,०८५.१० शुक्रावनड्वाहावास्तां यदयात्सूर्या गृहम् ॥

१०,०८५.११  ऋक्सामाभ्यामभिहितौ गावौ ते सामनावितः ।

१०,०८५.११ श्रोत्रं ते चक्रे आस्तां दिवि पन्थाश्चराचारः

१०,०८५.१२  शुची ते चक्रे यात्या व्यानो अक्ष आहतः ।

१०,०८५.१२ अनो मनस्मयं सूर्यारोहत्प्रयती पतिम् ॥

१०,०८५.१३  सूर्याया वहतुः प्रागात्सविता यमवासृजत् ।

१०,०८५.१३ अघासु हन्यन्ते गावोऽर्जुन्योः पर्युह्यते ॥

१०,०८५.१४  यदश्विना पृच्छमानावयातं त्रिचक्रेण वहतुं सूर्यायाः ।

१०,०८५.१४ विश्वे देवा अनु तद्वामजानन्पुत्रः पितराववृणीत पूषा ॥

१०,०८५.१५  यदयातं शुभस्पती वरेयं सूर्यामुप ।

१०,०८५.१५ क्वैकं चक्रं वामासीत्क्व देष्ट्राय तस्थथुः ॥

१०,०८५.१६  द्वे ते चक्रे सूर्ये ब्रह्माण ऋतुथा विदुः ।

१०,०८५.१६ अथैकं चक्रं यद्गुहा तदद्धातय इद्विदुः ॥

१०,०८५.१७  सूर्यायै देवेभ्यो मित्राय वरुणाय च ।

१०,०८५.१७ ये भूतस्य प्रचेतस इदं तेभ्योऽकरं नमः ॥

१०,०८५.१८  पूर्वापरं चरतो माययैतौ शिशू क्रीळन्तौ परि यातो अध्वरम् ।

१०,०८५.१८ विश्वान्यन्यो भुवनाभिचष्ट ऋतूंरन्यो विदधज्जायते पुनः ॥

१०,०८५.१९  नवोनवो भवति जायमानोऽह्नां केतुरुषसामेत्यग्रम् ।

१०,०८५.१९ भागं देवेभ्यो वि दधात्यायन्प्र चन्द्रमास्तिरते दीर्घमायुः ॥

१०,०८५.२०  सुकिंशुकं शल्मलिं विश्वरूपं हिरण्यवर्णं सुवृतं सुचक्रम् ।

१०,०८५.२० आ रोह सूर्ये अमृतस्य लोकं स्योनं पत्ये वहतुं कृणुष्व ॥

१०,०८५.२१  उदीर्ष्वातः पतिवती ह्येषा विश्वावसुं नमसा गीर्भिरीळे ।

१०,०८५.२१ अन्यामिच्छ पितृषदं व्यक्तां स ते भागो जनुषा तस्य विद्धि ॥

१०,०८५.२२  उदीर्ष्वातो विश्वावसो नमसेळा महे त्वा ।

१०,०८५.२२ अन्यामिच्छ प्रफर्व्यं सं जायां पत्या सृज ॥

१०,०८५.२३  अनृक्षरा ऋजवः सन्तु पन्था येभिः सखायो यन्ति नो वरेयम् ।

१०,०८५.२३ समर्यमा सं भगो नो निनीयात्सं जास्पत्यं सुयममस्तु देवाः ॥

१०,०८५.२४  प्र त्वा मुञ्चामि वरुणस्य पाशाद्येन त्वाबध्नात्सविता सुशेवः ।

१०,०८५.२४ ऋतस्य योनौ सुकृतस्य लोकेऽरिष्टां त्वा सह पत्या दधामि ॥

१०,०८५.२५  प्रेतो मुञ्चामि नामुतः सुबद्धाममुतस्करम् ।

१०,०८५.२५ यथेयमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रा सुभगासति ॥

१०,०८५.२६  पूषा त्वेतो नयतु हस्तगृह्याश्विना त्वा प्र वहतां रथेन ।

१०,०८५.२६ गृहान्गच्छ गृहपत्नी यथासो वशिनी त्वं विदथमा वदासि ॥

१०,०८५.२७  इह प्रियं प्रजया ते समृध्यतामस्मिन्गृहे गार्हपत्याय जागृहि ।

१०,०८५.२७ एना पत्या तन्वं सं सृजस्वाधा जिव्री विदथमा वदाथः ॥

१०,०८५.२८  नीललोहितं भवति कृत्यासक्तिर्व्यज्यते ।

१०,०८५.२८ एधन्ते अस्या ज्ञातयः पतिर्बन्धेषु बध्यते ॥

१०,०८५.२९  परा देहि शामुल्यं ब्रह्मभ्यो वि भजा वसु ।

१०,०८५.२९ कृत्यैषा पद्वती भूत्व्या जाया विशते पतिम् ॥

१०,०८५.३०  अश्रीरा तनूर्भवति रुशती पापयामुया ।

१०,०८५.३० पतिर्यद्वध्वो वाससा स्वमङ्गमभिधित्सते ॥

१०,०८५.३१  ये वध्वश्चन्द्रं वहतुं यक्ष्मा यन्ति जनादनु ।

१०,०८५.३१ पुनस्तान्यज्ञिया देवा नयन्तु यत आगताः ॥

१०,०८५.३२  मा विदन्परिपन्थिनो य आसीदन्ति दम्पती ।

१०,०८५.३२ सुगेभिर्दुर्गमतीतामप द्रान्त्वरातयः ॥

१०,०८५.३३  सुमङ्गलीरियं वधूरिमां समेत पश्यत ।

१०,०८५.३३ सौभाग्यमस्यै दत्त्वायाथास्तं वि परेतन ॥

१०,०८५.३४  तृष्टमेतत्कटुकमेतदपाष्ठवद्विषवन्नैतदत्तवे ।

१०,०८५.३४ सूर्यां यो ब्रह्मा विद्यात्स इद्वाधूयमर्हति ॥

१०,०८५.३५  आशसनं विशसनमथो अधिविकर्तनम् ।

१०,०८५.३५ सूर्यायाः पश्य रूपाणि तानि ब्रह्मा तु शुन्धति ॥

१०,०८५.३६  गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः ।

१०,०८५.३६ भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः ॥

१०,०८५.३७  तां पूषञ्छिवतमामेरयस्व यस्यां बीजं मनुष्या वपन्ति ।

१०,०८५.३७ या न ऊरू उशती विश्रयाते यस्यामुशन्तः प्रहराम शेपम् ॥

१०,०८५.३८  तुभ्यमग्रे पर्यवहन्सूर्यां वहतुना सह ।

१०,०८५.३८ पुनः पतिभ्यो जायां दा अग्ने प्रजया सह ॥

१०,०८५.३९  पुनः पत्नीमग्निरदादायुषा सह वर्चसा ।

१०,०८५.३९ दीर्घायुरस्या यः पतिर्जीवाति शरदः शतम् ॥

१०,०८५.४०  सोमः प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तरः ।

१०,०८५.४० तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः ॥

१०,०८५.४१  सोमो ददद्गन्धर्वाय गन्धर्वो दददग्नये ।

१०,०८५.४१ रयिं च पुत्रांश्चादादग्निर्मह्यमथो इमाम् ॥

१०,०८५.४२  इहैव स्तं मा वि यौष्टं विश्वमायुर्व्यश्नुतम् ।

१०,०८५.४२ क्रीळन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिर्मोदमानौ स्वे गृहे ॥

१०,०८५.४३  आ नः प्रजां जनयतु प्रजापतिराजरसाय समनक्त्वर्यमा ।

१०,०८५.४३ अदुर्मङ्गलीः पतिलोकमा विश शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे ॥

१०,०८५.४४  अघोरचक्षुरपतिघ्न्येधि शिवा पशुभ्यः सुमनाः सुवर्चाः ।

१०,०८५.४४ वीरसूर्देवकामा स्योना शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे ॥

१०,०८५.४५  इमां त्वमिन्द्र मीढ्वः सुपुत्रां सुभगां कृणु ।

१०,०८५.४५ दशास्यां पुत्राना धेहि पतिमेकादशं कृधि ॥

१०,०८५.४६  सम्राज्ञी श्वशुरे भव सम्राज्ञी श्वश्र्वां भव ।

१०,०८५.४६ ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषु ॥

१०,०८५.४७  समञ्जन्तु विश्वे देवाः समापो हृदयानि नौ ।

१०,०८५.४७ सं मातरिश्वा सं धाता समु देष्ट्री दधातु नौ

 

(.८२.२ ) येन सूर्यां सावित्रीमश्विनोहतुः पथा ।

(.८२.२ ) तेन मामब्रवीद्भगो जयामा वहतादिति ॥२॥

(१४.२.३० ) रुक्मप्रस्तरणं वह्यं विश्वा रूपाणि बिभ्रतम् ।

(१४.२.३० ) आरोहत्सूर्या सावित्री बृहते सौभगाय कम् ॥३०॥ {}

 

 

1.4.23 अनुवाक 23 सावित्रग्रहः

VERSE: 1
वामम् अद्य सवितर् वामम् उ श्वो दिवेदिवे वामम् अस्मभ्यम्̇ सावीः । वामस्य हि क्षयस्य देव भूरेर् अया धिया वामभाजः स्याम ॥
उपयामगृहीतो ऽसि देवाय त्वा सवित्रे ॥

1.4.24 अनुवाक 24 सावित्रग्रहः

VERSE: 1
अदब्धेभिः सवितः पायुभिष् ट्वम्̇ शिवेभिर् अद्य परि पाहि नो गयम् । हिरण्यजिह्वः सुविताय नव्यसे रक्षा माकिर् नो अघशम्̇स ईशत ॥
उपयामगृहीतो ऽसि देवाय त्वा सवित्रे ॥

1.4.25 अनुवाक 25 सावित्रग्रहः

VERSE: 1
हिरण्यपाणिमूतये सवितारम् उप ह्वये । स चेत्ता देवता पदम् ॥
उपयामगृहीतो ऽसि देवाय त्वा सवित्रे ॥

5.5.18

कृकवाकुः सावित्रः ॥

6.5.7 अनुवाक  7 सावित्रवैश्वदेवग्रहकथनम् 

VERSE: 1 

    अन्तर्यामपात्रेण सावित्रम् आग्रयणाद् गृह्णाति

    प्रजापतिर् वा एष यद् आग्रयणः

    प्रजानाम् प्रजननाय

न सादयति ।

    असन्नाद् धि प्रजाः प्रजायन्ते

    नानु वषट् करोति

    यद् अनुवषट्कुर्याद् रुद्रम् प्रजा अन्ववसृजेत् ।

    एष वै गायत्रो देवानां यत् सविता ।

    एष गायत्रियै लोके गृह्यते यद् आग्रयणः ।

6.5.7

   यद् अन्तर्यामपात्रेण सावित्रम् आग्रयणाद् गृह्णाति स्वाद् एवैनं योनेर् निर् गृह्णाति

    विश्वे

यत् तृतीयसवने सावित्रो गृह्यते तृतीयस्य सवनस्योद्यत्यै

    सवितृपात्रेण वैश्वदेवं कलशाद् गृह्णाति

    वैश्वदेव्यो वै प्रजा

    वैश्वदेवः कलशः

    सविता प्रसवानाम् ईशे

    यत् सवितृपात्रेण वैश्वदेवं कलशाद् गृह्णाति सवितृप्रसूत एवास्मै प्रजाः प्र 



 

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मनो ह वा अस्य सविता । तस्मात्सावित्रं गृह्णाति प्राणो ह वा अस्य सविता तमेवास्मिन्नेतत्पुरस्तात्प्राणं दधाति यदुपांशु गृह्णाति तमेवास्मिन्नेतत्पश्चात्प्राणं दधाति यत्सावित्रं गृह्णाति ताविमा उभयतः प्राणौ हितौ यश्चायमुपरिष्टाद्यश्चाधस्तात्

अथातो गृह्णात्येव । वाममद्य सवितर्वाममु श्वो दिवेदिवे वाममस्मभ्यं सावीः वामस्य हि क्षयस्य देव भूरेरया धिया वामभाजः स्याम उपयामगृहीतो ऽसि सावित्रोऽसि चनोधाश्चनोधा असि चनो मयि धेहि जिन्व यज्ञं जिन्व यज्ञपतिम् भगायेति

 

...[]

तं गृहीत्वा न सादयति । मनो ह वा अस्य सविता तस्मादिदमसन्नं मनः प्राणो ह वा अस्य सविता तस्मादयमसन्नः प्राणः संचरत्यथाह देवाय सवित्रे ऽनुब्रूहीत्याश्राव्याह देवाय सवित्रे प्रेष्येति वषट्कृते जुहोति नानुवषट्करोति मनो ह वा अस्य सविता नेन्मनोऽग्नौ प्रवृणजानीति प्राणो ह वा अस्य सविता नेत्प्राणमग्नौ प्रवृणजानीति

 

...[४३]

यद्वेव वैश्वकर्मणानि जुहोति । प्रायणं च हाग्नेरुदयनं च सावित्राणि प्रायणं वैश्वकर्मणान्युदयनं स यत्सावित्राण्येव जुहुयान्न वैश्वकर्मणानि यथा प्रायणमेव कुर्यान्नोदयनं तादृक्तदथ यद्वैश्वकर्मणान्येव जुहुयान्न सावित्राणि यथोदयनमेव कुर्यान्न प्रायणं तादृक्तदुभयानि जुहोति प्रायणं च तदुदयनं च करोति

१०...[१६]

स एष संवत्सरः प्राजापतिरग्निः  तस्यार्धमेव सावित्राण्यर्धं वैश्वकर्मणान्यष्टावेवास्य कलाः सावित्राण्यष्टौ वैश्वकर्मणान्यथ यदेतदन्तरेण कर्म क्रियते स एव सप्तदशः प्रजापतिर्यो वै कला मनुष्याणामक्षरं तद्देवानाम्

ग्रीष्ममेवैन्द्रेण। वर्षाः सावित्रेण। हेमन्तं वारुणेन। - १२...३३

 

हृदयमेवास्यैन्द्रः पुरोडाशः। यकृत् सावित्रः। क्लोमा वारुणः। - १२...

पूर्ववयसमैन्द्रेण। मध्यमवयसं सावित्रेण। उत्तमवयसं वारुणेन

-    १२...

 

१३...[]

सावित्र्या एवेष्टेः  पुरस्तादनुद्रुत्य सकृदेव रूपाण्याहवनीये जुहोत्यथ सायं धृतिषु हूयमानासु राजन्यो वीणागाथी दक्षिणत उत्तरमन्द्रामुदाघ्नंस्तिस्रः स्वयंसम्भृता गाथा गायतीत्ययुध्यतेत्यमुं संग्राममजयदिति तस्योक्तम् ब्राह्मणम्

 

१३...[]

अथ श्वो भूते द्वितीयेऽहन्  एवमेवैतासु सावित्रीष्विष्टिषु संस्थितास्वेषैवावृदध्वर्यविति हवै होतरित्येवाध्वर्युर्यमो वैवस्वतो राजेत्याह तस्य पितरो विशस्त इम आसत इति स्थविरा उपसमेता भवन्ति तानुपदिशति यजूंषि वेदः सोऽयमिति यजुषामनुवाकं व्याचक्षाण इवानुद्रवेदेवमेवाध्वर्युः सम्प्रेष्यति न प्रक्रमान्जुहोति

 

१३...[]

अथ तृतीयेऽहन्  एवमेवैतास्विष्टिषु संस्थितास्वेषैवावृदध्वर्यविति हवै होतरित्येवाध्वर्युर्वरुण आदित्यो राजेत्याह तस्य गन्धर्वा विशस्त इम आसत इति युवानः शोभना उपसमेता भवन्ति तानुपदिशत्यथर्वाणो वेदः सोऽयमित्यथर्वणामेकं पर्व व्याचक्षाण इवानुद्रवेदेवमेवाध्वर्युः सम्प्रेष्यति न प्रक्रमान्जुहोति

 

१३...[]

अथ चतुर्थेऽहन्  एवमेवैतास्विष्टिषु संस्थितास्वेषैवावृदध्वर्यविति हवै होतरित्येवाध्वर्युः सोमो वैष्णवो राजेत्याह तस्याप्सरसो विशस्ता इमा आसत इति युवतयः शोभनाः उपसमेता भवन्ति ता उपदिशत्यङ्गिरसो वेदः सोऽ यमित्यङ्गिरसामेकं पर्व व्याचक्षाण इवानुद्रवेत्। एवमेवाध्वर्युः संप्रेष्यति। न प्रक्रमान् जुहोति।

 

१३...[]

अथ पञ्चमेऽहन्  एवमेवैतास्विष्टिषु संस्थितास्वेषैवावृदध्वर्यविति हवै होतरित्येवाध्वर्युरर्बुदः काद्रवेयो राजेत्याह तस्य सर्पा विशस्त इम आसत इति सर्पाश्च सर्पविदश्चोपसमेता भवन्ति तानुपदिशति सर्पविद्या वेदः सोऽयमिति सर्पविद्याया एकं पर्व व्याचक्षाण इवानुद्रवेत्। एवमेवाध्वर्युः संप्रेष्यति। न प्रक्रमान् जुहोति।

 

१३...[१०]

अथ षष्ठेऽहन्  एवमेवैतास्विष्टिषु संस्थितास्वेषैवावृदध्वर्यविति हवै होतरित्येवाध्वर्युः कुबेरो वैश्रवणो राजेत्याह तस्य रक्षांसि विशस्तानीमान्यासत इति सेलगाः पादकृत उपसमेता भवन्ति तानुपदिशति देवजनविद्या वेदः सोऽयमिति देवजनविद्याया एकं पर्व व्याचक्षाण इवानुद्रवेत्। एवमेवाध्वर्युः संप्रेष्यति। न प्रक्रमान् जुहोति।

 

१३...[११]

अथ सप्तमेऽहन्  एवमेवैतास्विष्टिषु संस्थितास्वेषैवावृदध्वर्यविति हवै होतरित्येवाध्वर्युरसितो धान्वो राजेत्याह तस्यासुरा विशस्त इम आसत इति कुसीदिन उपसमेता भवन्ति तानुपदिशति माया वेदः सोऽयमिति कांचिन्मायां कुर्यादेवमेवाध्वर्युः सम्प्रेष्यति न प्रक्रमान्जुहोति

 

१३...[१२]

अथाष्टमेऽहन्  एवमेवैतास्विष्टिषु संस्थितास्वेषैवावृदध्वर्यविति हवै होतरित्येवाध्वर्युर्मत्स्यः साम्मदो राजेत्याह तस्योदकेचरा विशस्त इम आसत इति मत्स्याश्च मत्स्यहनश्चोपसमेता भवन्ति तानुपदिशतीतिहासो वेदः सोऽयमिति कंचिदितिहासमाचक्षीतैवमेवाध्वर्युः सम्प्रेष्यति न प्रक्रमान्जुहोति

 

१३...[१३]

अथ नवमेऽहन्  एवमेवैतास्विष्टिषु संस्थितास्वेषैवावृदध्वर्यविति हवै होतरित्येवाध्वर्युस्तार्क्ष्यो वैपश्यतो राजेत्याह तस्य वयांसि विशस्तानीमान्यासत इति वयांसि च वायोविद्यिकाश्चोपसमेता भवन्ति तानुपदिशति पुराणं वेदः सोऽयमिति किंचित्पुराणमाचक्षीतैवमेवाध्वर्युः सम्प्रेष्यति न प्रक्रमान्जुहोति

 

१३...[१४]

अथ दशमेऽहन्  एवमेवैतास्विष्टिषु संस्थितास्वेषैवावृदध्वर्यविति हवै होतरित्येवाध्वर्युर्धर्म इन्द्रो राजेत्याह तस्य देवा विशस्त इम आसत इति श्रोत्रिया अप्रतिग्राहका उपसमेता भवन्ति तानुपदिशति सामानि वेदः सोऽयमिति साम्नां दशतं ब्रूयादेवमेवाध्वर्युः सम्प्रेष्यति न प्रक्रमान्जुहोतीति

१३...[]

स वै पशूनुपाकरिष्यन्  एतास्तिस्रः सावित्रीराहुतीर्जुहोति देव सवितस्तत्सवितुर्वरेण्यं विश्वानि देव सवितरिति सवितारं प्रीणाति सोऽस्मै प्रीत एतान्पुरुषान्प्रसौति तेन प्रसूतानालभते

तै.ब्रा.

VERSE: 1 { 1.3.5.1}
सावित्रं जुहोति कर्मणः कर्मणः पुरस्तात् ।
कस् तद् वेद_इत्य् आहुः ।
यद् वाजपेयस्य पूर्वं यद् अपरम् इति ।
सवितृप्रसूत एव यथापूर्वं कर्माणि करोति ।
सवने_सवने जुहोति ।
आक्रमणम् एव तत् सेतुं यजमानः कुरुते ।

 

VERSE: 1 { 2.3.10.1}
प्रजापतिः सोमम्̐ राजानम् असृजत ।
तं त्रयो वेदा अन्वसृज्यन्त ।
तान् हस्ते ऽकुरुत ।
अथ ह सीता सावित्री ।
सोमम्̐ राजानं चकमे ।
श्रद्धाम् उ स चकमे ।
सा ह पितरं प्रजापतिम् उपससार ।
तम्̐_उवाच ।
नमस् ते अस्तु भगवः ।
उप त्वा_अयानि ।

VERSE: 2 { 2.3.10.2}
प्र त्वा पद्ये ।
सोमं वै राजानं कामये ।

 

3.3.7.6
जुह्व् एह्य् अग्निस् त्वा ह्वयति देवयज्याया उपभृद् एहि देवस् त्वा सविता ह्वयति देवयज्याया इत्य् आह ।
आग्नेयी वै जुहूः ।
सावित्र्य् उपभृत् ।

 

VERSE: 3 { 3.8.8.3}
यस्यानायतने ऽन्यत्राग्नेर् आहुतीर् जुहोति ।
सावित्रिया इष्ट्याः पुरस्तात् स्विष्टकृतः ।

 

VERSE: 1 { 3.8.12.1}
सावित्रम् अष्टाकपालं प्रातर् निर्वपति ।
अष्टाक्षरा गायत्री ।
गायत्रं प्रातःसवनम् ।
प्रातःसवनाद् एवैनं गायत्रियाश् छन्दसो ऽधि निर्मिमीते ।
अथो प्रातःसवनम् एव तेन_आप्नोति ।
गायत्रीं छन्दः ।
सवित्रे प्रसवित्र एकादशकपालं मध्यंदिने ।
एकादशाक्षरा त्रिष्टुप् ।
त्रैष्टुभं माध्यंदिनम्̐ सवनम् ।
माध्यंदिनाद् एवैनम्̐ सवनात् त्रिष्टुभश् छन्दसो ऽधि निर्मिमीते ।

VERSE: 2 { 3.8.12.2}
अथो माध्यंदिनम् एव सवनं तेन_आप्नोति ।
त्रिष्टुभं छन्दः ।
सवित्र आसवित्रे द्वादशकपालम् अपराह्णे ।
द्वादशाक्षरा जगती ।
जागतं तृतीयसवनम् ।

 

3.9.13.1

यत् संवत्सरम् इष्टिभिर् यजते ।
अश्वम् एव तद् अन्विच्छति ।
सावित्रियो भवन्ति ।
VERSE: 2 { 3.9.13.2}
इयं वै सविता ।
यो वा अस्यां नश्यति यो निलयते ।
अस्यां वाव तं विन्दन्ति ।
न वा इमाम् कश् चन_इत्य् आहुः ।
तिर्यङ् न_ऊर्ध्वो ऽत्येतुम् अर्हतीति ।
यत् सावित्रियो भवन्ति ।
सवितृप्रसूत एव_एनम् इच्छति ।

 

अनुवाक 1 सावित्रचयनम्
VERSE: 1 { 3.10.1.1}
संज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं जानद् अभिजानत् ।
संकल्पमानं प्रकल्पमानम् उपकल्पमानम् उपक्लृप्तं क्लृप्तम् ।
श्रेयो वसीय आयत् सम्भूतं भूतम् ।
चित्रः केतुः प्रभान् आभान्त् संभान् ।
ज्योतिष्माम्̐स् तेजस्वान् आतपम्̐स् तपन्न् अभितपन् ।
रोचनो रोचमानः शोभनः शोभमानः कल्याणः ।
दर्शा दृष्टा दर्शता विश्वरूपा सुदर्शना ।
आप्यायमाना प्यायमाना प्याया सूनृतेरा ।
आपूर्यमाणा पूर्यमाणा पूरयन्ती पूर्णा पौर्णमासी ।
दाता प्रदाता_आनन्दो मोदः प्रमोदः ।
अनुवाक 2 सावित्रचयनम्
VERSE: 1 { 3.10.2.1}
भूर् अग्निं च पृथिवीं च मां च ।
त्रीम्̐श् च लोकान्त् संवत्सरं च ।
प्रजापतिस् त्वा सादयतु ।
तया देवतया_अङ्गिरस्वद् ध्रुवा सीद ।
भुवो वायुं चान्तरिक्षं च मां च ।
त्रीम्̐श्च लोकान्त् संवत्सरं च ।
प्रजापतिस् त्वा सादयतु ।
तया देवतया_अङ्गिरस्वद् ध्रुवा सीद ।
स्वर् आदित्यं च दिवं च मां च ।
त्रीम्̐श् च लोकान्त् संवत्सरं च ।
प्रजापतिस् त्वा सादयतु ।
तया देवतया_अङ्गिरस्वद् ध्रुवा सीद ।
भूर् भुवः स्वश् चन्द्रमसं च दिशश् च मां च ।
त्रीम्̐श् च लोकान्त् संवत्सरं च ।
प्रजापतिस् त्वा सादयतु ।
तया देवतया_अङ्गिरस्वद् ध्रुवा सीद ।

अनुवाक 3 सावित्रचयनम्
VERSE: 1 { 3.10.3.1}
त्वम् एव त्वां वेत्थ यो ऽसि सो ऽसि ।
त्वम् एव त्वाम् अचैषीः ।
चितश् चासि संचितश् चास्य् अग्ने ।
एतावाम्̐श् चासि भूयाम्̐श् चास्य् अग्ने ।
यत् ते अग्ने न्यूनं यद् उ ते ऽतिरिक्तम् ।
आदित्यास् तद् अङ्गिरसश् चिन्वन्तु ।
विश्वे ते देवाश् चितिम् आपूरयन्तु ।
चितश् चासि संचितश् चास्य् अग्ने ।
एतावाम्̐श् चासि भूयाम्̐श् चास्य् अग्ने ।
मा ते अग्ने ऽचयेन मा_अतिचयेन_आयुर् आवृक्षि ।
सर्वेषां ज्योतिषां ज्योतिर् यद् अदाव् उदेति ।
तपसो जातम् अनिभृष्टम् ओजः ।
तत् ते ज्योतिर् इष्टके ।
तेन मे तप ।
तेन मे ज्वल ।
तेन मे दीदिहि ।
यावद् देवाः ।
यावद् असाति सूर्यः ।
यावद् उतापि ब्रह्म ।

अनुवाक 4 सावित्रचयनम्
VERSE: 1 { 3.10.4.1}
संवत्सरो ऽसि परिवत्सरो ऽसि ।
इदावत्सरो ऽसीदुवत्सरो ऽसि ।
इद्वत्सरो ऽसि वत्सरो ऽसि ।
तस्य ते वसन्तः सिरः ।
ग्रीष्मो दक्षिणः पक्षः ।
वर्षाः पुच्छम् ।
शरद् उत्तरः पक्षः ।
हेमन्तो मध्यम् ।
पूर्वपक्षाश् चितयः ।
अपरपक्षाः पुरीषम् ।
अनुवाक 5 सावित्रचयनम्
VERSE: 1 { 3.10.5.1}
भूर् भुवः स्वः ।
ओजो बलम् ।
ब्रह्म क्षत्रम् ।
यशो महत् ।
सत्यं तपो नाम ।
रूपम् अमृतम् ।
चक्षुः स्रोत्रम् ।
मन आयुः ।
विश्वं यशो महः ।
समं तपो हरो भाः ।
जातवेदा यदि वा पावको ऽसि ।
वैश्वानरो यदि वा वैद्युतो ऽसि ।
शं प्रजाभ्यो यजमानाय लोकम् ।
ऊर्जं पुष्टिं ददद् अभ्याववृत्स्व {आनंदा. अभ्यावभृत्स्व) ।

अनुवाक 6 सावित्रचयनम्
VERSE: 1 { 3.10.6.1}
राज्ञी विराज्ञी ।
सम्राज्ञी स्वराज्ञी ।
अर्चिः शोचिः ।
तपो हरो भाः ।
अग्निर् इन्द्रो बृहस्पतिः ।
विश्वे देवा भुवनस्य गोपाः ।
ते मा सर्वे यशसा सम्̐सृजन्तु ।

अनुवाक 7 सावित्रचयनम्
VERSE: 1 { 3.10.7.1}
असवे स्वाहा ।
वसवे स्वाहा ।
विभुवे स्वाहा ।
विवस्वते स्वाहा ।
अभिभुवे स्वाहा_अधिपतये स्वाहा ।
दिवां पतये स्वाहा_अम्̐हस्पत्याय स्वाहा ।
चाक्षुष्मत्याय स्वाहा ज्योतिष्मत्याय स्वाहा ।
राज्ञे स्वाहा विराज्ञे स्वाहा ।
संराज्ञे स्वाहा ।
स्वराज्ञे स्वाहा ।
शूषाय स्वाहा सूर्याय स्वाहा ।
चन्द्रमसे स्वाहा ज्योतिषे स्वाहा ।
सम्̐सर्पाय स्वाहा ।
कल्याणाय स्वाहा ।
अर्जुनाय स्वाहा ।

अनुवाक 8 सावित्रचयनम्
VERSE: 1 { 3.10.8.1}
विपश्चिते पवमानाय गायत ।
मही न धारा_अत्य् अन्धो अर्षति ।
अहिर् ह जीर्णाम् अतिसर्पति त्वचम् ।
अत्यो न क्रीडन्न् असरद् वृषा हरिः ।
उपयामगृहीतो ऽसि मृत्यवे त्वा जुष्टं गृह्णामि ।
एष ते योनिर् मृत्यवे त्वा ।
अप मृत्युम् अप क्षुधम् ।
अप_इतः शपथं जहि ।
अधा { अथा} नो अग्न आवह ।
रायस्पोषम्̐ सहस्रिणम् ।

अनुवाक 8 सावित्रचयनम्
VERSE: 1 { 3.10.8.1}
विपश्चिते पवमानाय गायत ।
मही न धारा_अत्य् अन्धो अर्षति ।
अहिर् ह जीर्णाम् अतिसर्पति त्वचम् ।
अत्यो न क्रीडन्न् असरद् वृषा हरिः ।
उपयामगृहीतो ऽसि मृत्यवे त्वा जुष्टं गृह्णामि ।

 

VERSE: 3 { 3.10.9.3}
वृश्चतश् च ।
अत्यम्̐हो ह_आरुणिः ।
ब्रह्मचारिणे प्रश्नान् प्रोच्य प्रजिघाय ।
परेहि ।
प्लक्षं दैयाम्पातिं पृच्छ ।
वेत्थ सावित्रा3न्  न वेत्था3 इति ।
तम् आगत्य पप्रच्छ ।
आचार्यो मा प्रा हैषीत् ।
वेत्थ सावित्रा3न्  न वेत्था3 इति ।
स ह_उवाच वेद_इति ।

VERSE: 4 { 3.10.9.4}
स कस्मिन् प्रतिष्ठित इति ।
परोरजसीति ।
कस् तद् यत् परोरजा इति ।
एष वाव स परोरजा इति ह_उवाच ।
य एष तपति ।
एषो ऽर्वाग्रजा इति ।
स कस्मिन् त्व् एष इति ।
सत्य इति ।
किं तत् सत्यम् इति ।
तप इति ।

VERSE: 5 { 3.10.9.5}
कस्मिन् नु तप इति ।
बल इति ।
किं तद् बलम् इति ।
प्राण इति ।
मा स्म प्राणम् अतिपृच्छ इति मा_आचार्यो ऽब्रवीद् इति ह_उवाच ब्रह्मचारी ।
स ह_उवाच प्लक्षो दैयाम्पातिः ।
यद् वै ब्रह्मचारिन् प्राणम् अत्यप्रक्ष्यः  
मूर्धा ते व्यपतिष्यत्  
अहम् उ त आचार्यात्_श्रेयान् भविष्यामि ।
यो मा सावित्रे समवादिष्ट_इति ।

VERSE: 6 { 3.10.9.6}
तस्मात् सावित्रे न संवदेत ।
स यो ह वै सावित्रं विदुषा सावित्रे संवदते ।
सहास्मिन्_श्रियं दधाति ।
अहीना ह_आश्वत्थ्यः ।
सावित्रं विदांचकार ।

VERSE: 11 { 3.10.9.11}
स ह हम्̐सो हिरण्मयो भूत्वा ।
स्वर्गं लोकम् इयाय ।
आदित्यस्य सायुज्यम् ।
हम्̐सो ह वै हिरण्मयो भूत्वा ।
स्वर्गं लोकम् एति ।
आदित्यस्य सायुज्यम् ।
य एवं वेद ।
देवभागो ह श्रौतर्षः ।
सावित्रं विदांचकार ।
तम्̐ ह वाग् अदृश्यमानाऽभ्युवाच ।

VERSE: 12 { 3.10.9.12}
सर्वं बत गौतमो वेद ।
यः सावित्रं वेद_इति ।
स ह_उवाच ।
का_एषा वाग् असीति ।
अयम् अहम्̐ सावित्रः ।
VERSE: 14 { 3.10.9.14}
एतद् वै सावित्रस्याष्टाक्षरं पदम्̐ श्रिया_अभिषिक्तम् ।
य एवं वेद ।
श्रिया हैवा_अभिषिच्यते ।
तद् एतद् ऋचा_अभ्युक्तम् ।
ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् ।
यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः ।
यस् तन् न वेद किम् ऋचा करिष्यति ।
य इत् तद् विदुस् त इमे समासत इति ।
न ह वा एतस्य_ऋचा न यजुषा न साम्ना_अर्थो ऽस्ति ।
यः सावित्रं वेद ।
VERSE: 15 { 3.10.9.15}
तद् एतत् परि यद् देवचक्रम् ।
आर्द्रं पिन्वमानम्̐ स्वर्गे लोक एति ।
विजहद् विश्वा भूतानि संपश्यत् ।
आर्द्रो ह वै पिन्वमानः स्वर्गे लोक एति ।
विजहन् विश्वा भूतानि संपश्यन् ।
य एवं वेद ।
शूषो ह वै वार्ष्णेयः ।
आदित्येन समाजगाम ।
तम्̐_उवाच ।
एहि सावित्रं विद्धि ।
अयं वै स्वर्ग्यो ऽग्निः पारयिष्णुर् अमृतात् संभूत इति ।
एष वाव स सावित्रः ।
य एष तपति ।
एहि मां विद्धि ।
इति हैवैनं तद् उवाच ।

अनुवाक 10 सावित्रचयनम्
VERSE: 1 { 3.10.10.1}
इयं वाव सरघा ।
तस्या अग्निर् एव सारघं मधु ।
या एताः पूर्वपक्षापरपक्षयो रात्रयः ।
ता मधुकृतः ।
यान्य् अहानि ।
ते मधुवृषाः ।
स यो ह वा एता मधुकृतश् च मधुवृषाम्̐श् च वेद ।
क्रुवन्ति हास्यैता अग्नौ मधु ।
नास्य_इष्टापूर्तं धयन्ति ।
अथ यो न वेद ।

अनुवाक 11 सावित्रचयनम्
VERSE: 1 { 3.10.11.1}
कश् चिद् ध वा अस्माल् लोकात् प्रेत्य ।
आत्मानं वेद ।
आयम् अहम् अस्मीति ।
कश् चित् स्वं लोकं न प्रतिप्रजानाति ।
अग्निमुग्धो हैव धुमतान्तः ।
स्वं लोकं न प्रतिप्रजानाति ।
अथ यो हैवैतम् अग्निम्̐ सावित्रं वेद ।
स एवास्माल् लोकात् प्रेत्य ।
आत्मानं वेद ।
अयम् अहम् अस्मीति ।

VERSE: 2 { 3.10.11.2}
स स्वं लोकं प्रतिप्रजानाति ।
एष उ चैवैनं { उवेवैनं} तत् सावित्रः ।
स्वर्गं लोकम् अभिवहति ।

 


किम् एनेन कुर्या इति ।
ब्रह्मचर्यम् एव_एनेन चरेयम् इति ह_उवाच ।

VERSE: 4 { 3.10.11.4}
तम्̐ ह त्रीन् गिरिरूपान् अविज्ञातान् इव दर्शयां चकार ।
तेषाम्̐_एकैकस्मान् मुष्टिन् आददे ।
स ह_उवाच ।
भरद्वाज_इत्य् आमन्त्र्य ।
वेदा वा एते ।
अनन्ता वै वेदाः ।
एतद् वा एतैस् त्रिभिर् आयुर्भिर् अन्ववोचथाः ।
अथ त इतरद् अननूक्तम् एव ।
एहीमं विद्धि ।
अयं वै सर्वविद्या_इति ।

VERSE: 5 { 3.10.11.5}
तस्मै हैतम् अग्निम्̐ सावित्रम् उवाच ।
तम्̐ स विदित्वा ।
अमृतो भूत्वा ।
स्वर्गं लोकम् इयाय ।
आदित्यस्य सायुज्यम् ।

 

3.10.11.7
स वा एषो ऽग्निर् अपक्षपुच्छो वायुर् एव ।
तस्याग्निर् मुखम् ।
असाव् आदित्यः सिरः ।
स यद् एते देवते अन्तरेण ।
तत् सर्वम्̐ सीव्यति ।
तस्मात् सावित्रः ।

 

अथ सावित्रीप्रसवाः। यद् इह विषुरूपम् इमा नानारूपाः प्रतिपद् उपागाम तन् नस् सवितृप्रसूतम् असद् इति। अथाग्निपावमान्यः। पथम् इव वा एते यन्ति ये पावमानीभिः प्रतिपद्यन्त इति। अग्निर् वै पथिकृद् देवतानाम्। - जै.ब्रा. 2.186

अथ ब्राह्मणस्पत्या, ब्रह्मण्य क्षत्रं सूयाता इति। अथ सावित्री, सवितृप्रसूत सूयाता इति। अथैते उभे प्रतिपदौ भवतः। - 2.198

सविता यन्त्रैः पृथिवीम् अरम्णाद् इति सावित्रं वैश्वदेवे होतारम् अनुशंस्तवै ब्रूयात्। - जै.ब्रा. 2.349

सावित्रं पूर्वेद्युः पशुम् आलभन्ते। सविता वै देवानां प्रसविता। सवितृप्रसूता एवैतत् संवत्सरम् आरभन्ते। - 2.371

 

असावि सोम इन्द्र त इत्य् असावीति सिमानां रूपम्॥3.133॥

 

असावि सोमो अरुषो वृषा हरिर् इति वृषण्वतीर् भवन्ति बृहतो रूपम्। बार्हतम् एतद् अहः। - 3.259

अग्नये मथ्यमानायानुब्रूहीत्याहाध्वर्युरभि त्वा देवा सवितरिति सावित्रीमन्वाह तदाहुर्यदग्नये मथ्यमानायानु वाचाहाथ कस्मात्सावित्रीमन्वाहेति सविता वै प्रसवानामीशे सवितृप्रसूता एवैनं तन्मन्थन्ति तस्मात्सावित्रीमन्वाह मही द्यौः ऐ.ब्रा. 1.16

अभि त्यं देवं सवितारमोण्योरिति सावित्री प्राणो वै सविता प्राणमेवास्मिंस्तद्दधाति। 1.19

प्रजापतिर्वै सोमाय राज्ञे दुहितरं प्रायच्छत्सूर्यां सावित्रीं तस्यै सर्वे देवा वरा आगच्छंस्तस्या एतत्सहस्रं वहतुमन्वाकरोद्यदेतदाश्विनमित्याचक्षतेऽनाश्विनं हैव तद्यदर्वाक्सहस्रं तस्मात्तत्सहस्रं वैव शंसेद्भूयो वा। प्राश्य घृतं शंसेद्यथा ह वा इदमनो वा रथो वाऽक्तो वर्तत एवं हैवाक्तो वर्तते। शकुनिरिवोत्पतिष्यन्नाह्वयीत। तस्मिन्देवा न समजानत ममेदमस्तु ममेदमस्त्विति ते संजानाना अब्रुन्नाजिमस्याऽऽयामहै स यो न उज्जेष्यति तस्येदं भविष्यतीति ते ऽग्नेरेवाधि गृहपतेरादित्यं काष्ठामकुर्वत तस्मादाग्नेयी प्रतिपद्भवत्याश्विनस्याग्निहोता गृहपतिः स राजेति। तद्धैक आहुरग्निं मन्ये ऐ.ब्रा. 4.7


तत्सवितुर्वृणीमहेऽद्या नो देव सवितरिति वैश्वदेवस्य प्रतिपदनुचरौ राथंतरेऽहनि प्रथमेऽहनि प्रथमस्याह्नो रूपं युञ्जते मन उत युञ्जते धिय इति सावित्रं युक्तवत्प्रथमेऽहनि प्रथमस्याह्नो रूपम्प्र द्यावा यज्ञैः पृथिवी ऐ.ब्रा. 4.30

 

उदु ष्य देवः सविता हिरण्ययेति सावित्रमूर्ध्ववद्द्वितीयेऽहनि द्वितीयस्याह्नो रूपम्। - 4.32

आ देवो यातु सविता सुरत्न इति सावित्रमेति चतुर्थेऽहनि चतुर्थस्याह्नो रूपम्प्र 5.5

उदु ष्य देवः सविता दमूना इति सावित्रमा दाशुषे सुवति भूरि वाममिति वाम-म्पशुरूपम्पञ्चमेऽहनि पञ्चमस्याह्नो रूपम्मही द्यावापृथिवी इह ज्ये 5.8

उदु ष्य देवः सविता सवायेति सावित्रं शश्वत्तमं तदपा वह्निरस्थादित्यन्तो वै स्थितमन्तः षष्ठमहः- 5.13

तत्सवितुर्वृणीमहेऽद्या नो देव सवितरिति वैश्वदेवस्य प्रतिपदनुचरौ राथंतरेऽहनि सप्तमेऽहनि सप्तमस्याह्नो रूपमभि त्वा देव सवितरिति सावित्रं यद्वाव 5.17

हिरण्यपाणिमूतय इति सावित्रमूर्ध्ववदष्टमेऽहन्यष्टमस्याह्नो रूपम्मही द्यौः पृथिवी च न इति द्यावापृथिवीयम्महद्वदष्टमेऽहनि 5.19

तत्सवितुर्वृणीमहेऽद्या नो देव सवितरिति वैश्वदेवस्य प्रतिपदनुचरौ राथंतरेऽहनि नवमेऽहनि नवमस्याह्नो रूपं दोषो आगादिति सावित्रं अन्तो वै गतमन्तो नवममहर्नवमेऽहनि नवमस्याह्नो रूपम्प्र 5.21

द्यावापृथिवीयमुद्वासितं सावित्रम्प्रक्रान्तं वैष्णवं ह्रियमाणम्बा 5.26

 

 

अथ प्राङेत्य ध्रुवामाप्याययत्याप्यायतां ध्रुवा घृतेन यज्ञंयज्ञं प्रति देवयद्भ्यः सूर्याया ऊधोऽदित्या उपस्थ उरुधारा पृथिवी यज्ञे अस्मिन्नित्यथाज्यस्थाल्याः स्रुवेणोपघातं प्रायश्चित्तानि जुहोत्या बौ.श्रौ.सू. 1.21.

ध्रुवामाप्याय्यमानामनुमन्त्रयत आप्यायतां ध्रुवा घृतेन यज्ञंयज्ञं प्रति देवयद्भ्यः सूर्याया ऊधोऽदित्या उपस्थ उरुधारा पृथिवी यज्ञे अस्मिन्नित्यथ यजमानभागं प्राश्नाति बौ.श्रौ.सू. 3.20