PURAANIC SUBJECT INDEX

पुराण विषय अनुक्रमणिका

(Sa to Suvarnaa)

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

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Sa - Sangata  ( words like Samjnaa / Sanjnaa / Sangya, Samvatsara / year, Samvarta, Sansaara / Samsaara, Samskaara / Sanskaara, Sagara, Samkarshana / Sankarshana, Samkraanti / Sankraanti etc.)

Sangama - Satyaloka (Sangama/confluence, Sangeeta / music, Sati, Satva, Satya/truth, Satyatapaa, Satyabhaamaa etc.)

Satyavat - Sanatkumaara ( Satyavatee /Satyavati, Satyavrata, Satyaa, Satraajit, Sadyojaata, Sanaka, Sanakaadi, Sanatkumaara etc. )

Sanatsujaata - Saptarshi (Sanandana, Sanaatana, Santaana, Sandhi, Sandhyaa, Samnyaasa / Sanyaasa, Saptami, Saptarshi etc.)

Saptavimshatikaa - Samunnata ( Saptashati, Sabhaa / Sabha, Samaadhi, Samidhaa, Samudra / ocean, Samudramanthana etc.)

Samriddhi - Sarasvati (Sampaati / Sampaatee, Sara / pond, Saramaa, Sarayuu, Sarasvati / Sarasvatee etc. )

Saritaa - Sahajaa (Sarga / manifestation, Sarpa / serpent, Sarva / whole, Savana, Savitaa etc.)

Sahadeva - Saadhya ( Sahadeva, Sahasranaama, Sahsraaksha, Sahasraarjuna, Saagara, Saankhya / Samkhya, Saadhu, Saadhya etc.)

Saadhvee - Saalakatankataa (  Saabhramati, Saama, Saamba / Samba, Saarasvata etc.)

Saalankaayana - Siddhasena  (Saavarni, Saavitri, Simha / lion, Simhikaa, Siddha etc.)

Siddhaadhipa - Suketumaan  (Siddhi / success, Sineevaali, Sindhu, Seetaa / Sita, Sukanyaa, Sukarmaa etc.) 

Sukesha - Sudarshana ( Sukesha, Sukha, Sugreeva, Sutapaa, Sudarshana etc. )

Sudarshanaa - Supaarshva   (Sudaamaa / Sudama, Sudyumna, Sudharmaa, Sundara / beautiful, Supaarshva etc.)

Suptaghna - Sumedhaa  ( Suprateeka, Suprabhaa, Subaahu, Subhadraa, Sumati, Sumanaa , Sumaalee / Sumali, Sumukha etc.)

Sumeru - Suvarnaa (Suyajna, Sumeru, Suratha, Surabhi / Surabhee, Surasaa, Suvarchaa, Suvarna / gold etc.)

 

 

सर्वहुत

लक्ष्मीनारायण संहिता में पुरुषोत्तम मास उत्तरा द्वितीया का माहात्म्य संक्षेप में इस प्रकार दिया गया है सर्वहुत नामक एक राजा हुआ जो मेरा भक्त था और जिसने मेरे लिए अपना सब कुछ अर्पित कर दिया था। वह मेरा प्रसाद रूप अन्न खाता था जिससे आत्मा पवित्र होती थी। उसने चातुर्मास्य व्रत ग्रहण किया कि सात खण्डों वाली, सात द्वीपों, सात समुद्रों वाली इस भूमि पर जो भी चातुर्मास्य व्रत करेगा, वह मेरा दिया हुआ भोजन करे, मेरे दिए हुए वस्त्र धारण करे। उसने स्थान स्थान पर अन्न सत्र खोल दिए। इससे सत्य, तप, जन, स्वर्ग आदि सब लोकों में उसकी कीर्ति फैल गई। देव, ऋषि, दैत्य व अन्य देहधारी हंसादि का रूप धारण कर उसके दर्शन के लिए आते थे ओर उसका तेजोमण्डल युक्त मुखमण्डल देखकर आश्चर्यचकित होते थे। देवता दूर से तो बहुत तेज वाले प्रतीत होते थे, लेकिन उस राजा के निकट जाकर निस्तेज हो जाते थे। ऐसा यह अग्नि नाम वाला सर्वहुत राजा हुआ जो देवों के गर्व का हरण करता था। देवगण उसे सम्मान देते थे, इन्द्र उसे अपना आधा आसन देता था, दिक्पाल उसे पूजते थे। ऐसे उस रागशून्य नृप की पत्नी का नाम गोऋतम्भरा था। वह जब देव देवियों की सभा में बैठती थी तो लज्जा से मुख नीचा करके बैठती थी। उसने अपने पति से कहा कि मुझे समाज में लज्जापूर्वक बैठना पडता है। ऐसा उपाय करो कि इन्द्राणी, वारुणी, सौर्या, चान्द्री आदि देवियां मुझे प्रणाम करें। राजा ने कहा कि हम तो मनुष्य हैं। यह क्या कम है कि हमें देवों के समाज में बैठने का अवसर मिल जाता है। तृष्णा मत करो। मनुष्य जन्म में तो वह नहीं हो सकता। फिर भी, यदि पुण्यों के प्रताप से कभी ऐसा सम्भव हो सका तो नारायण के समीप स्तुति करूंगा। लेकिन बता देता हूं कि तृष्णा की शान्ति फिर भी न होगी। रानी राजा को प्रतिदिन उसके वचन की याद दिला देती। एक बार उन दोनों ने अधिक मास कृष्ण पक्ष द्वितीया को दुन्दुभी की घोषणा सुनी कि इस दिन व्रत करने से सारे भूमण्डल का राज्य मिल सकता है, स्वर्ग, जन आदि 7 तथा अतल, पाताल आदि 7 कुल मिलाकर 14 लोकों का आधिपत्य मिल सकता है, परमेष्ठी पद मिल सकता है, वारुण, आग्नेय आदि दिक्पालों का पद , लोकपाल पद, निधियां,  रुद्र पद, मारुत पद, नाकपृष्ठ, अष्टसिद्धियां आदि सब कुछ प्राप्त हो सकता है। उन दोनों ने संकल्प किया कि हम व्रत करके ब्रह्मा और ब्रह्माणी का पद प्राप्त करें, 14 लोकों का आधिपत्य प्राप्त करें। उन्होंने पूजा में पुरुषोत्तम को अन्य वस्तुओं के अतिरिक्त 14 भूमिकाओं वाला भवन भी अर्पित किया जो दैनिक उपयोग में आने वाले सभी कक्षों जैसे शय्या, भोजन, पितृतर्पण, दान आदि कक्षों से सुसज्जित था। कृष्ण प्रकट हो गए। दम्पत्ति ने उनसे प्रार्थना की कि हमें परमेष्ठी पद प्रदान करो और उसके पश्चात् अपना अक्षर धाम शाश्वत मोक्ष प्रदान करो। कृष्ण ने गोऋतम्भरा से कहा कि वह पृथिवी पर पुष्कर तीर्थ में गायत्र नामक का गोप नृप है। उसकी भार्या का नाम आर्षी है। तुम उसकी कन्या गोपी गोमती गायत्री बनोगी। यह राजा सर्वहुत वहां ब्रह्मा बनेगा और पुष्कर में यज्ञ करने जाएगा। वहां यज्ञ में दीक्षाकाल में अध्वर्यु द्वारा बुलाने पर सावित्री सजधज कर तत्काल यज्ञभूमि पर नहीं आएगी। ब्रह्मा शक्र को बुलाकर कहेगा कि मेरे लिए अन्य पत्नी को शीघ्र लाओ। शक्र तुम्हें वहां ले जाएगा। ब्रह्मा गान्धर्व विवाह द्वारा तुम्हें ग्रहण करेगा। तब से तुम ब्रह्माणी लोकमाता, वेदमाता, सृष्टिमाता बन जाओगी। सौ वर्षों के पश्चात् अक्षर धाम को प्राप्त करोगी। ऐसा कहकर कृष्ण अदृश्य हो गए।

 

विवेचन

 

सर्वहुत शब्द ध्यान देने योग्य है। सर्वहुत का सामान्य लौकिक अर्थ है जिसने अपनी सभी वासनाएं, सभी गुण अवगुण ईश्वर को अर्पित कर दिए हैं। यदि मेरे अन्दर कोई दोष है, वह भी तेरा है, कोई गुण है, वह भी तेरा है। ऐसे भक्त ने मान लिया है कि वह जिस स्थान पर रह रहा है, उसके परितः स्थित समाज, सामाजिक परिस्थितियां सब उसकी आध्यात्मिक प्रगति के लिए विधाता ने निर्मित की हैं। अतः किसी विपरीत परिस्थिति में घबराकर विद्रोह करने का कोई स्थान नहीं है। लेकिन उसने पुरुषार्थ को नहीं त्यागा है। उसने अपना ध्यान चातुर्मास पर केन्द्रित किया है। वैदिक चातुर्मास के चार भाग होते हैं वैश्वदेव(अग्नि अनीकवती इष्टि), वरुणप्रघास, साकमेध व शुनासीर। चातुर्मास अपने दोषों के अपनयन के लिए, अपनी प्रकृति का शोधन करने के लिए है। अब उसकी पत्नी का नाम गोऋतम्भरा कहा गया है। गौ सूर्य की किरणों का अधिकतम अवशोषण करती है और फिर उनका एक नए रूप में विसर्जन करती है। ऋतम्भरा शब्द को या तो अंग्रेजी के रिदम्भरा के आधार पर समझा जा सकता है अर्थात् प्रकृति से अपना तादात्म्य स्थापित करना, रिदम् स्थापित करना। अथवा कृतम्भरा के आधार पर समझा जा सकता है कि प्रकृति में चल रहे जुए में जीतना, कृतयुग स्थापित करना। अथवा शृतम्भरा के आधार पर समझा जा सकता है अर्थात् पृथिवी पर जो फल अभी कच्ची अवस्था में है, हमारे विचार जो अभी पके नहीं हैं, संशय की अवस्था है,  ऋतम्भरा उसको श्रद्धा, ज्ञान आदि से पकाएगी। हो सकता है कि वर्तमान माहात्म्य में राजा सर्वहुत द्वारा चातुर्मास में जो अन्न आदि के सत्र स्थापित करना कहा गया है, वह कार्य उसकी प्रकृति गोऋतम्भरा के माध्यम से सम्पन्न होता हो। कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया में यमुना भगिनी अपने भ्राता यम के लिए भोजन प्रस्तुत करती है। इस पर्व पर जिस लोककथा का स्मरण किया जाता है, उसमें भी भगिनी द्वारा भोजन को विषरहित बनाने का  तथा भ्राता के मार्ग को आपदा रहित करने का वर्णन मुख्य रूप से आता है।

    

     अब कठिनाई यह है कि गोऋतम्भरा की स्थिति देवी के समकक्ष नहीं बन पाई है। इसके लिए उन्हें अधिक मास द्वितीया व्रत करना पड रहा है। व्रत में चतुर्दश लोकों को प्राप्त करने के लिए 14 तलों वाला भवन दान करने का क्या तात्पर्य है, यह अन्वेषणीय है। मोक्ष तक की साधना के पारम्परिक रूप से 14 तल ही माने जाते हैं। गोऋतम्भरा के गायत्री बन जाने की व्याख्या यह हो सकती है कि अभी गोऋतम्भरा का कार्य चारों दिशाओं में फैला हुआ है, लेकिन गायत्री का कार्य ऊर्ध्वमुखी है भूः, भुवः, स्वः।

     द्वितीया तिथि का क्या अर्थ हो सकता है, इस संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि आत्मा और प्रजा यह दो हैं। इन दोनों को एक दूसरे का सहयोग करना है। प्राण, मन, वाक, यह हमारी आत्मा की प्रजा हैं। दो के बदले एक हो जाना है। द्वितीया तिथि के एक अन्य व्रत में अश्विनी द्वय की पूजा की जाती है। कहा गया है कि अश्विनी द्वय में से एक विष्णु बन जाता है, एक विष्णु की शेषनाग रूपी शय्या।

     सर्वहुत शब्द सारे वैदिक साहित्य में सर्वत्र लेकिन संक्षिप्त रूप में ही पुरुष सूक्त में प्रकट हुआ है

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् ।

पशून्तांश्चक्रे वायव्यानारण्यान्ग्राम्याश्च ये ॥

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।

छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥

तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः ।

 

इस सूक्त की व्याख्याओं में कहा गया है कि अग्नि ही तो सर्वहुत है। अग्नि में जो भी आहुति डाली जाती है, अग्नि उसे देवों तक पहुंचा देती है। अग्नि की कार्यविधि यह है कि वह किसी भी भौतिक वस्तु को जलाकर उसका सारभाग, गंध का संग्रह कर लेती है जिसका देवगण उपभोग कर सकते हैं (उपरोक्त माहात्म्य में भी सर्वहुत को अग्नि नाम दिया गया है)। सर्वहुत राजा द्वारा चातुर्मास करने में शुनासीर स्थिति की व्याख्या भी सारे पार्थिव स्तर का सार प्राप्त कर लेने के रूप में की गई है।  लेकिन केवल अग्नि कहने से पृषदाज्य शब्द की व्याख्या नहीं हो पाती। पृषदाज्य अर्थात् चितकबरा घी। डा. फतहसिंह कहा करते थे कि पृषदाज्य बीच की स्थिति है, मनुष्यलोक की। यहां शुद्ध आज्य नहीं मिल सकता। यहां तो वासनाओं से युक्त आज्य ही मिल सकता है। ऋग्वेद के पुरुषसूक्त में पृषदाज्य का होम करने से पहले सब प्रकार के पशुओं की उत्पत्ति का उल्लेख है। उसके बाद ऋचा, साम आदि की उत्पत्ति होती है। अथर्ववेद में इससे उल्टी स्थिति दी गई है। लक्ष्मीनारायण संहिता का उपरोक्त माहात्म्य पुरुषसूक्त के इस भाग की सर्वोत्कृष्ट व्याख्या कहा जा सकता है।   

  

सर्वहुत

संदर्भ

१०,०९०.०६  यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।

१०,०९०.०६ वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ॥

१०,०९०.०७  तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन्पुरुषं जातमग्रतः ।

१०,०९०.०७ तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ॥

१०,०९०.०८  तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् ।

१०,०९०.०८ पशून्तांश्चक्रे वायव्यानारण्यान्ग्राम्याश्च ये ॥

१०,०९०.०९  तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।

१०,०९०.०९ छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥

१०,०९०.१०  तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः ।

१०,०९०.१० गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः ॥

 

पशुहिंसनाभिधानम्  --     पर्यग्नि करोति सर्वहुतम् एवैनं करोत्य् अस्कन्दायास्कन्नं हि तद् यद् धुतस्य स्कन्दति त्रिः पर्यग्नि करोति त्र्यावृद् धि यज्ञो ऽथो रक्षसाम् अपहत्यै तैसं ६.३.८.१

 

वा.सं. VERSE: 31.6
तस्माद् यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् ।
पशूम्
̐स् ताम्̐श् चक्रे वायव्यान् आरण्या ग्राम्याश् च ये ॥

VERSE: 31.7
तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऽ ऋचः सामानि जज्ञिरे ।
छन्दाम्
̐सि जज्ञिरे तस्माद् यजुस् तस्माद् अजायत ॥

VERSE: 31.8
तस्माद् अश्वा ऽ अजायन्त ये के चोभयादतः ।
गावो ह जज्ञिरे तस्मात् तस्माज् जाता ऽ अजावयः ॥

VERSE: 31.9
तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातम् अग्रतः ।
तेन देवा ऽ अयजन्त साध्या ऽ ऋषयश् च ये ॥

VERSE: 31.10
यत् पुरुषं व्य् अदधुः कतिधा व्यकल्पयन् ।
मुखं किम् अस्य कौ बाहू का ऊरू पादा ऽ उच्येते ॥

 

यज्ञ एति विततः कल्पमान ईजानमभि लोकं स्वर्गम् ।

तमग्नयः सर्वहुतं जुषन्तां प्राजापत्यं मेध्यं जातवेदसः ॥शौअ १८.४.१३

 

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।
छन्दो ह जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥१३॥
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः संभृतं पृषदाज्यम् ।
पशूंस्तांश्चक्रे वायव्यान् आरण्या ग्राम्याश्च ये ॥१४॥
सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः ।
देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम् ॥१५॥
मूर्ध्नो देवस्य बृहतो अंशवः सप्त सप्ततीः ।
राज्ञः सोमस्याजायन्त जातस्य पुरुषादधि ॥शौअ १९.६.१६

यजमानो वा एककपालः, आहवनीयः स्वर्गो लोको, यत् सर्वहुतं करोति हविर्भूतमेवैनं स्वर्गं लोकं गमयति, - -- - -सर्वहुतं करोति प्रतिष्ठित्यै मै.सं. 1.10.7

यत्प्राङ् पर्यावर्तेत दैवीर्विशो मुह्येयुर्यद्दक्षिणा यमदेवत्या स्याद्, यत्प्रत्यङ् सौर्यो, यदुदुङ् रौद्र, ऋजु होतव्यः प्रतिष्ठित्यै, सर्वहुतं करोति प्रतिष्ठित्यै क्षत्रं वै वैश्वानरो , विण् मारुता , यदेतं हुत्वा मारुतान् जुहोति विशँ वा एतत् क्षत्राय नियुनक्ति मै.सं.३.३.१०

 

तेर्चन्तः श्राम्यन्तश्चेरुः । श्रमेण ह स्म वै तद्देवा जयन्ति यदेषां जय्यमासर्षयश्च तेभ्यो देवा वैव प्ररोचयां चक्रुः स्वयं वैव दध्रिरे प्रेत तदेष्यामो यतो देवाः स्वर्गं लोकं समाश्नुवतेति ते किं प्ररोचते किं प्ररोचत इति चेरुरेत्पुरोडाशमेव कूर्मं भूत्वा सर्पन्तं ते ह सर्व एव मेनिरेयं वै यज्ञ इति - १.६.२.[३]

 

 

ते होचुः । अश्विभ्यां तिष्ठ सरस्वत्यै तिष्ठेन्द्राय तिष्ठेति स ससर्पैवाग्नये तिष्ठेति ततस्तस्थावग्नये वाअस्थादिति तमग्नावेव परिगृह्य सर्वहुतमजुहवुराहुतिर्हिदेवानां तत एभ्यो यज्ञः प्रारोचत तमसृजन्त तमतन्वत सोऽयं परोऽवरं यज्ञोऽनूच्यते पितैव पुत्राय ब्रह्मचारिणे माश १.६.२.४

 

ते देवा यज्ञमब्रुवन् । योषा वा इयं वागुपमन्त्रयस्व ह्वयिष्यते वै त्वेति स्वयं वा हैवैक्षत योषा वा इयं वागुपमन्त्रयै ह्वयिष्यते वै मेति तामुपामन्त्रयत सा हास्मा आरकादिवैवाग्र आसूयत्तस्मादु स्त्री पुंसोपमन्त्रितारकादिवैवाग्रेऽसूयति स होवाचारकादिव वै म आसूयीदिति - ३.२.१.[१९]

 

ते होचुः । उपैव भगवो मन्त्रयस्व ह्वयिष्यते वै त्वेति तामुपामन्त्रयत सा हास्मै निपलाशमिवोवाद तस्मादु स्त्री पुंसोपमन्त्रिता निपलाशमिवैव वदति स होवाच निपलाशमिव वै मेऽवादीदिति - ३.२.१.[२०]

 

ते होचुः । उपैव भगवो मन्त्रयस्व ह्वयिष्यते वै त्वेति तामुपामन्त्रयत सा हैनं जुहुव तस्मादु स्त्री पुमांसं ह्वयत एवोत्तमं स होवाचाह्वत वै मेति - ३.२.१.[२१]

 

ते देवा ईक्षां चक्रिरे । योषा वा इयं वाग्यदेनं न युवितेहैव मा तिष्ठन्तमभ्येहीति ब्रूहि तां तु न आगतां प्रतिप्रब्रूतादिति सा हैनं तदेव तिष्ठन्तमभ्येयाय तस्मादु स्त्री पुमांसं संस्कृते तिष्ठन्तमभ्यैति तां हैभ्य आगतां प्रतिप्रोवाचेयं वा आगादिति - ३.२.१.[२२]

 

 

तां देवाः । असुरेभ्योऽन्तरायंस्तां स्वीकृत्याग्नावेव परिगृह्य सर्वहुतमजुहवुराहुतिर्हि देवानां स यामेवामूमनुष्टुभाऽजुहवुस्तदेवैनां तद्देवाः स्व्यकुर्वत तेऽसुरा आत्तवचसो हेऽलवो हेऽलव इति वदन्तः पराबभूवुः माश ३.२.१.[२३]

 

यथा वै हविषोऽहुतस्य स्कन्देत्  एवमेतत्पशोः स्कन्दति यं निक्तमनालब्धमुत्सृजन्ति यत्स्तोकीया जुहोति सर्वहुतमेवैनं जुहोत्यस्कन्दायास्कन्नं हि तद्यद्धुतस्य स्कन्दति सहस्रं जुहोति सहस्रसम्मितो वै स्वर्गो लोकः स्वर्गस्य लोकस्याभिजित्यै - माश १३.१.३.१

 

तदाहुः  यन्मिता जुहुयात्परिमितमवरुन्धीतेत्यमिता जुहोत्यपरिमितस्यैवावरुद्ध्या उवाच ह प्रजापति स्तोकीयासु वा अहमश्वमेधं संस्थापयामि तेन संस्थितेनैवात ऊर्ध्वं चरामीति माश १३.१.३.[२]

 

 

यथा वै हविषोऽहुतस्य स्कन्देत्  एवमेतत्पशो स्कन्दति यम् प्रोक्षितमनालब्धमुत्सृजन्ति यद्रूपाणि जुहोति सर्वहुतमेवैनं जुहोत्यस्कन्दायास्कन्नं हि तद्यद्धुतस्य स्कन्दति हिङ्काराय स्वाहा हिङ्कृताय स्वाहेत्येतानि वा अश्वस्य रूपाणि तान्येवावरुन्द्धे - माश १३.१.३.५

 

तदाहुः  अनाहुतिर्वै रूपाणि नैता होतव्या इत्यथो खल्वाहुरत्र वा अश्वमेधः संतिष्ठते यद्रूपाणि जुहोति होतव्या एवेति बहिर्धा वा एतमायतनात्करोति भ्रातृव्यमस्मै जनयति यस्यानायतनेऽन्यत्राग्नेराहुतीर्जुहोति - १३.१.३.[६]

 

 

उदिते ब्रह्मोद्ये  प्रपद्याध्वर्युर्हिरण्मयेन पात्रेण प्राजापत्यं महिमानं ग्रहं गृह्णाति तस्य पुरोरुग्घिरण्यगर्भः समवर्तताग्र इत्यथास्य पुरोऽनुवाक्या सुभूः स्वयम्भूः प्रथम इति होता यक्षत्प्रजापतिमिति प्रैषः प्रजापते न त्वदेतान्यन्य इति होता यजति वषट्कृते जुहोति यस्तेऽहन्त्सम्वत्सरे महिमा सम्बभूवेति नानुवषट्करोति सर्वहुतं हि जुहोति।  अथातो वपानां होमः नानैव चरेयुरा वैश्वदेवस्य वपायै वैश्वदेवस्य वपायां हुतायां तदन्वितरा जुहुयुरिति ह स्माह सत्यकामो जाबालो विश्वे वै सर्वे देवास्तदेनान्यथादेवतं प्रीणातीति - माश १३.५.२.२३

 

यथा वै हविषो गृहीतस्य स्कन्दति । एवं वा एतदश्वस्य स्कन्दति । यन्निक्तमनालब्धमुत्सृजन्ति । यत्स्तोक्या अन्वाह । सर्वहुतमेवैनं करोत्यक्सन्दाय । अस्कन्नँ हि तत् । यद्धुतस्य स्कन्दति । सहस्रमन्वाह । - तैब्रा. ३.८.६.१

 

यथा वै हविषो गृहीतस्य स्कन्दति । एवं वा एतदश्वस्य स्कन्दति । यत्प्रोक्षितमनालब्धमुत्सृजन्ति । यदश्वचरितानि जुहोति । सर्वहुतमेवैनं करोत्यस्कन्दाय । अस्कन्नँ हि तत् । यद्धुतस्य स्कन्दति । - तैब्रा. ३.८.८.१

अश्वं तूपरं गोमृगमिति सर्वहुत एताञ्जुहोति । एषां लोकानामभिजित्यै । - तैब्रा ३.८.२०.५


प्रजापतिर् वावेदम् अग्र आसीत्। सो ऽक्रामयत
 -  बहु स्यां, प्रजायेय, भूमानं गच्छेयम् इति। सो ऽशोचत्। सो ऽतप्यत। तं शोचन्तं तप्यमानं प्राणा अभ्यवदन् - वयं वा इमं यज्ञम् अदृशम् तेन त्वा याजयामेति। सो ऽब्रवीत्  -  तं कथम् अद्राष्ट, कतमम् अद्राष्टेति। ते ऽब्रुवन्न्  -  आश्रावयास्तु श्रौषट्। यज ये यजामहे। वौषड् इत्य् एतम् अदृश्मेति। सो ऽवेद्  -  अदृशन् वा इति। यत् पञ्चासन्, पांक्तो यज्ञः। तेनावेद - अदृशन् वा इति। तेषाम् उ यत् पञ्चानां सतां सप्तदशाक्षराण्य् आसन् - सप्त - दशः प्रजापतिः  -  प्राजापत्यो यज्ञः। तेनो एवावेद् अदृशन् वावेति। सो ऽब्रवीत्  -  ते केन होष्यामः, कस्मिन् होष्याम इति। ते ऽब्रुवंस्  -  तवैव वपाम् उत्खिद्य तां तवैव हृदये ऽग्नौ सर्वहुतां होष्याम इति। ते प्रजापतेर् एव वपाम् उदखिदन्। वाचम् एव तेषां प्राण एवाश्रावयद्, अपानः प्रत्याश्रावयत्। मन एव होतासीत्। प्रजापतिर् एव चतुर्थो ब्रह्मा दक्षिणत आस्त। तां प्रजापतेर् एव हृदये ऽग्नौ सर्वहुताम् अजुहवुः। तां यद् अवपंस् तद् वपायै वपात्वम्। यद् वो एनां तद् अजुहवुस् तद् एनाम् अवपन्। तस्माद् उ ह वप्तव्यम् एव। उप्ताद् ध्य् एवेदं सर्वं जायते। तस्यै हुताया अजः  - जैब्रा. २.२६१

 -  श्वेतो लोमशस्तूपरो लप्सुद्य् अन्यतोदंश् चतुष्पाद् अजायत् तस्मिन् सर्वांणि रूपाणि पर्यपश्यन्। ते ऽब्रुवन्न् - इमानि वा अस्मिन् सर्वाणि रूपाणि। एतेमम् एवालभामहा इति। ते तम् आलभन्त। तेषां प्राण एवाश्रावयद् अपानः प्रत्याश्रावयत्। मन एव होतासीत्। प्रजापतिर् एव चतुर्थो ब्रह्मा दक्षिणत आस्त। तं प्रजापतेर् एव हृदये ऽग्नौ सर्वहुतम् अजुहवुः। तस्माद् धुताद् अग्निर् देवताजायत। तद् ऋचो वेदः। अनु वायुर् देवताजायत। तद् यजूंषि वेदः। अन्व् आदित्यो देवताजायत्। तत् सामानि वेदः। अन्व् एते च त्रयो देवानां श्रेष्ठा अजायन्तैताश् च तिस्रो विद्याः। शश्वद् धैतावद् एव प्रजापतिना सृष्टम्। अथैताभिर् एव देवताभिर् इदम् इतरत् सर्वम्। ते ऽब्रुवन् - येन नः पिता प्रजापतिर् यज्ञेनेष्ट्वारात्सीत् तेन यजामहा इति। ते तम् आहरन्त। तेषां वायुर् एवाश्रावयद्, आदित्यः प्रत्याश्रावयत्। अग्निर् एव होतासीत्। प्रजापतिर् एव चन्द्रमाश् चतुर्थो ब्रह्मा दक्षिणत आस्त- जैब्रा. २.२६२

 

तै.आ. 3.12 अनुवाक १२

 

तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् । पुरुषं जातमग्रतः () । तेन देवा अयजन्त । साध्या ऋषयश्च ये, इति । तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः । संभृतं पृषदाज्यम् । पशूस्ताश्चक्रे वायव्यान् । आरण्यान्ग्राम्याश्च ये, इति । तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः । ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दासि जज्ञिरे तस्मात् । यजुस्तस्मादजायत (), इति । तस्मादश्वा अजायन्त

 

सुतमाजुहोमि स्वाहेति प्रतिप्रस्थाता ८
सानुवषट्कारावननुवषट्कारौ वा ९
सर्वहुतौ आप.श्रौ. १२.२३.१०

उपांशु मारुतान्सर्वहुताञ्जुहोति १४
ईदृङ् चान्यादृङ् चेति सप्तभिर्गुणैरासीनो हस्तेन गणेन गणमनुद्रुत्य मारुताञ्जुहोति १५
मध्येऽरण्येऽनुवाक्येन गणेनगणेन जुहोतीत्येके १६
मारुतैः सर्वतो वैश्वानरं परिचिनोतीत्येके १७
स्वतवांश्च प्रघासी च सांतपनश्च गृहमेधी च क्रीडी च साकी चोर्जिषी चेत्येष षष्ठ आम्नातः १८
मितासश्च संमितासश्च न इति सर्वत्रानुषजति १९ आपश्रौ. १७.१६.१४

आक्रान्वाजी क्रमैरत्यक्रमीद्वाजी द्यौस्ते पृष्ठमिति वैतसेन कटेनाश्वतूपरगोमृगान्सर्वहुतान्हुत्वेलुवर्दाय स्वाहा बलिवर्दाय स्वाहेत्यश्वमभिजुहोति आप.श्रौ. २०.२१.६

अवदाय प्रत्यभिघारणं प्राक् स्विष्टकृतः ११ सर्वहुत एककपालः कात्या.श्रौ १.९.१२

विपर्यस्य पात्रं होतुर्द्विर्भक्षणम् २२ तावद्वा सर्वहुतत्वात्पूर्वेषाम् कात्या. श्रौ. ९.१३.२३

होता शंसत्याश्विनम् ७ शस्त्रान्त आश्विनेन सर्वहुतेन चरति । एकप्रदानश्चमसैः कात्या.श्रौ. १२.६.८

वैश्वानरेण प्रचर्य सर्वहुतेन हस्तेन मारुतान् जुहोत्युपविश्य वैश्वानरे वा वैश्वानरं पृथु कृत्वा शुक्रज्योतिरिति प्रतिमन्त्रम् -  कात्या.श्रौ. १८.४.२३

यजमानोऽध्वर्यु पृच्छामि त्वेति १४ इयं वेदिरित्यध्वर्युः १५ सर्वहुतेन महिम्ना चरति यस्तेऽहन्निति जुहोति कात्या.श्रौ. २०.७.१६

जुहुयाज्जीवेभ्यः २२ सर्वहुतं सर्वजीविनः आश्व.श्रौ. २.६.२३

अध्वे प्रमीतस्याभिवान्यवत्सायाः पयसाऽग्निहोत्रं तूष्णीं सर्वहुतं जुहुयुरासमवायात् आश्व.श्रौ. ३.१०. १७