PURAANIC SUBJECT INDEX

पुराण विषय अनुक्रमणिका

(Sa to Suvarnaa)

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

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Sa - Sangata  ( words like Samjnaa / Sanjnaa / Sangya, Samvatsara / year, Samvarta, Sansaara / Samsaara, Samskaara / Sanskaara, Sagara, Samkarshana / Sankarshana, Samkraanti / Sankraanti etc.)

Sangama - Satyaloka (Sangama/confluence, Sangeeta / music, Sati, Satva, Satya/truth, Satyatapaa, Satyabhaamaa etc.)

Satyavat - Sanatkumaara ( Satyavatee /Satyavati, Satyavrata, Satyaa, Satraajit, Sadyojaata, Sanaka, Sanakaadi, Sanatkumaara etc. )

Sanatsujaata - Saptarshi (Sanandana, Sanaatana, Santaana, Sandhi, Sandhyaa, Samnyaasa / Sanyaasa, Saptami, Saptarshi etc.)

Saptavimshatikaa - Samunnata ( Saptashati, Sabhaa / Sabha, Samaadhi, Samidhaa, Samudra / ocean, Samudramanthana etc.)

Samriddhi - Sarasvati (Sampaati / Sampaatee, Sara / pond, Saramaa, Sarayuu, Sarasvati / Sarasvatee etc. )

Saritaa - Sahajaa (Sarga / manifestation, Sarpa / serpent, Sarva / whole, Savana, Savitaa etc.)

Sahadeva - Saadhya ( Sahadeva, Sahasranaama, Sahsraaksha, Sahasraarjuna, Saagara, Saankhya / Samkhya, Saadhu, Saadhya etc.)

Saadhvee - Saalakatankataa (  Saabhramati, Saama, Saamba / Samba, Saarasvata etc.)

Saalankaayana - Siddhasena  (Saavarni, Saavitri, Simha / lion, Simhikaa, Siddha etc.)

Siddhaadhipa - Suketumaan  (Siddhi / success, Sineevaali, Sindhu, Seetaa / Sita, Sukanyaa, Sukarmaa etc.) 

Sukesha - Sudarshana ( Sukesha, Sukha, Sugreeva, Sutapaa, Sudarshana etc. )

Sudarshanaa - Supaarshva   (Sudaamaa / Sudama, Sudyumna, Sudharmaa, Sundara / beautiful, Supaarshva etc.)

Suptaghna - Sumedhaa  ( Suprateeka, Suprabhaa, Subaahu, Subhadraa, Sumati, Sumanaa , Sumaalee / Sumali, Sumukha etc.)

Sumeru - Suvarnaa (Suyajna, Sumeru, Suratha, Surabhi / Surabhee, Surasaa, Suvarchaa, Suvarna / gold etc.)

 

 

सरस्वती

पा॒व॒का न॒ः सर॑स्वती॒ वाजे॑भिर्वा॒जिनी॑वती ।

य॒ज्ञं व॑ष्टु धि॒याव॑सुः ॥

चो॒द॒यि॒त्री सू॒नृता॑नां॒ चेत॑न्ती सुमती॒नाम् ।

य॒ज्ञं द॑धे॒ सर॑स्वती ॥

म॒हो अर्ण॒ः सर॑स्वती॒ प्र चे॑तयति के॒तुना॑ ।

धियो॒ विश्वा॒ वि रा॑जति ॥

टिप्पणी : प्रयाग में द्रष्टव्य गंगा व यमुना के संगम पर एक अदृश्य नदी सरस्वती और मिलती है। गंगा और यमुना को पवित्र करने का काम सरस्वती का है। सरस्वती के बिना गंगा जाह्नवी (श्रम का नाश करने वाली अवांछनीय, जह धातु) है और यमुना काली की पुत्री कालिन्दी है जिसमें कालिय नाग का निवास हो सकता है। अपने शुभ्र वर्ण से सरस्वती विचार, अभिव्यक्ति और क्रिया की पवित्रता का प्रतीक है। पर्वतों रूपी ज्ञानेन्द्रियों और मन रूपी समुद्र से निकलने वाली सभी नदियों (चेतना धाराओं) का शुद्ध एकीकृत रूप सरस्वती है। ( फतहसिंह, ऋग्वेद १.३.१० के संदर्भ में वेद सविता फरवरी १९८६ में )

     सरस्वती सौ अयस् के पुरों में बंद है। जब यह प्रवाहित होती है तब सब पुर ढह जाते हैं। यह आत्मा की चेतना है, वह चेतना जो परमात्मा से दिव्य चेतना के रूप में आ सकती है। ध्यान का अर्थ है इसे खोजना। सरस्वती हिरण्यवर्तनी सुनहरी ज्योति का मार्ग है। जब यह आती है तो सोने की धारा की तरह चमचमाती हुई। - फतहसिंह

     वेद की सरस्वती समुद्र से भी निकलती है और पहाडों से भी, जबकि सामान्य रूप से नदियां पहाडों से निकलकर समुद्र में गिरती हैं।

एकाचेतत्सरस्वती नदीनां शुचिर्यती गिरिभ्य आ समुद्रात् ।

रायश्चेतन्ती भुवनस्य भूरेर्घृतं पयो दुदुहे नाहुषाय ॥ - ऋ. ७.९५.२

 सरस्वती सप्तविध सिन्धु माता है, वह चेतना है जो आनन्दमय कोश रूपी समुद्र से भी निकलती है और विज्ञानमय कोश रूपी गिरि से भी। विज्ञानमय कोश की शक्ति की अभिव्यक्ति जिन माध्यमों से होती है, उसे गिरा/वाणी कहते हैं। चूंकि सरस्वती को वाक् की अधिष्ठात्री माना जाता है, अतः वह गिरि से भी निकलती है फतहसिंह

सरस्वती

पुराणों में सरस्वती अदृश्य नदी है जो बडवानल को कलश में रखकर पश्चिम् समुद्र (प्रभास) की ओर यात्रा करती है जिससे बडवानल को समुद्र में रख सके(स्कन्द पुराण  ७.१.३४)। अपने यात्राकाल में उसको पश्चिमवाहिनी नदी कहा जाता है। जब वह बडवानल की अग्नि से त्रस्त होने लगती है तो वह पृथिवी पर प्रकट हो जाती है। उस समय वह प्राची सरस्वती कहलाती है। कथा है कि सरस्वती को शोक हुआ कि पश्चिम् की यात्रा करने पर उसका गंगा से वियोग हो जाएगा। तब गंगा ने कहा कि वह जब भी मिलना चाहे, वह प्राचीवहा बनकर मिल सकती है। जब वह प्राचीवहा बनती है तो गंगा भी उत्तरवहा बन जाती है और जहां दोनों का मिलन होता है, वहां एक सरोवर बन जाता है जिसे तीर्थ की संज्ञा दी गई है। उदाहरण के लिए पुष्कर सरोवर, कुरुक्षेत्र में सरोवर आदि। सरस्वती के बहने की केवल यह दो ही दिशाएं नहीं हैं। वामन पुराण ४२ में सरस्वती की ४ दिशाओं का निर्धारण किया गया है। जब वह प्राची सरस्वती होती है तो वह गंगा का रूप होती है। जब दक्षिणवाही होती है तो नर्मदा का, पश्चिमवाही यमुना का और उत्तरवाही सिन्धु का। दिशाओं को सरस्वती पर आरोपित करने से क्या तात्पर्य हो सकता है, इसकी व्याख्या परोक्ष रूप से वामन पुराण २२.१९ के आधार पर की जा सकती है। कहा गया है कि ब्रह्मा की चार अथवा पांच वेदियां हैं। पूर्व में गया वेदी है, पश्चिम में पुष्कर, दक्षिण में विरज(जगन्नाथपुरी), उत्तर में कुरुक्षेत्र या समन्तपञ्चक और मध्य में प्रयाग। दिशाओं का क्या अर्थ हो सकता है, यह सोमयाग में उत्तरवेदी के आधार पर समझा जा सकता है। उत्तरवेदी में पूर्व दिशा में यूप की स्थिति होती है। लेकिन यूप से भी पूर्व अग्निचयन करके श्येन बनाया जाता है जो आकाश में उडने में समर्थ हो जाता है। कहा गया है कि यह इस प्रकार है जैसे सूर्योदय से पहले अरुणोदय की स्थिति। सूर्योदय भी तो पूर्व दिशा में ही होता है। अतः पूर्व दिशा की साधना यह है कि यहां चयन किया जाता है। चयन अर्थात् ईंटों या इष्टकाओं के एक के ऊपर एक विशिष्ट रूप में चिनना। इस चयन का वास्तविक रूप आधुनिक भौतिक विज्ञान में अव्यवस्था की माप या एण्ट्रांपी के आधार पर समझा जा सकता है। किसी भी तन्त्र से उपयोगी कार्य लेने के लिए उसकी अव्यवस्था न्यूनतम होनी चाहिए। प्रकृति की अव्यवस्था में निरन्तर वृद्धि हो रही है। यह अवांछनीय है। अग्निचयन में ईंटों की एक परत के ऊपर दूसरी परत इस प्रकार स्थापित की जाती है कि दूसरी परत की अव्यवस्था पहली से कम हो। इस प्रकार पांच परतें बनाई जाती हैं। कर्मकाण्ड की दृष्टि से तो इतना पर्याप्त है, लेकिन वास्तविक जीवन में इसे किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है, यह अन्वेषणीय है। वामन पुराण में पूर्व दिशा में ब्रह्मा की वेदी के रूप में गया का उल्लेख है। गया की विशेषता यह है कि देवता लोग गयासुर की देह पर यज्ञ करना चाहते थे, उसे यज्ञ की वेदी बनाना चाहते थे। लेकिन वह हिलता ही रहा। सारे देवता आकर उस पर स्थित हो गए, लेकिन वह तब भी हिलता रहा। अन्त में जब गदाधर विष्णु उस पर स्थित हुए, तब वह स्थिर हुआ। यहां हिलना चंचलता का प्रतीक है और स्थिर होना अव्यवस्था के कम होने का प्रतीक है। गया में १५ दिनों में जो भी पितृ कर्म किया जाता है, उसे सूर्य को उदित करने का एक प्रक्रम माना जा सकता है जिसमें अचेतन मन के प्रक्षालन की क्रिया भी सम्मिलित है। वामन पुराण में उल्लेख है कि जब सरस्वती प्राचीवहा होती है, तो उसका स्वरूप गंगा जैसा होता है।

     पश्चिम दिशा में ब्रह्मा की पुष्कर वेदी का उल्लेख है। पश्चिम दिशा के विषय में कहा जाता है कि यह श्मशान बनाने, अपने सारे पापों को जला देने और फिर उससे भी ऊपर एक रसमय स्थिति को प्रकट करने की दिशा है। ब्रह्मा की पुष्कर वेदी से संकेत मिलता है कि यह प्रकृति को अपनी पत्नी बना लेने, अपने अनुकूल बना लेने की दिशा है। सोमयाग में पश्चिम दिशा में गार्हपत्य वेदी होती है जहां यजमान और यजमान पत्नी विराजमान होते हैं। अथवा उत्तरवेदी में ऋत्विजों के विराजमान होने के लिए सदोमण्डप होता है। सरस्वती के विषय में कहा गया है कि जब वह पश्चिमवाहा होती है तो उसका स्वरूप यमुना जैसा होता है। यमुना का कार्य है अपने भ्राता यम को सर्वोत्तम प्रकार के अन्न द्वारा पुष्ट करना, यम को पृथिवी पर प्रतिष्ठित होने के लिए आमन्त्रित करना। पुष्कर के तीन विभाग ज्येष्ठ, मध्यम व कनिष्ठ करने से पश्चिम दिशा का क्या सम्बन्ध हो सकता है, यह अन्वेषणीय है।

     जब सरस्वती दक्षिणवाहा होती है, तब उसका स्वरूप नर्मदा समान कहा गया है। दक्षिण में ब्रह्मा की वेदी के रूप में विरज क्षेत्र (जगन्नाथ पुरी) का उल्लेख किया गया है। दक्षिण दिशा इस संसार में घट रही प्रत्येक घटना को आकस्मिक रूप में देखने की अपेक्षा उसके भूत और भविष्य के आधार पर देखने की दिशा है, अक्ष प्रकृति से ऊपर उठ कर अश्व प्रकृति बनने की, दक्षता प्राप्त करने की दिशा है। जहां भी दक्षता में वृद्धि करनी हो, अथवा द्यूत रूपी प्रकृति से ऊपर उठना हो, वहां यह आवश्यक होता है कि अपनी इन्द्रियों की सीमित क्षमता को असीमित बनाया जाए। विरज क्षेत्र को विराज, वैराज भी कहा जा सकता है। वैराज से पहली स्थिति विरूप की होती है सब घटनाओं को विकृत रूप में देखना। दक्षिण दिशा का एक कार्य और भी होता है अपनी इन्द्रियों को अन्तर्मुखी करना सीखना। इसके लिए नल दमयन्ती की कथा का उदाहरण दिया जाता है।

     उत्तरवाहिनी सरस्वती के रूप को सिन्धु के समान कहा गया है। ब्रह्मा की उत्तरवेदी के रूप में समन्तपञ्चक या कुरुक्षेत्र का उल्लेख किया गया है। कुरुक्षेत्र में राजा कुरु धर्म की खेती करते हैं। जब तक पापों का नाश नहीं हुआ है, तब तक खेती करना निषिद्ध है। जब सारे पाप जल जाएं, तभी बीज डालकर उन्हें अंकुरित करना उचित है। उत्तर दिशा धनात्मक बनने की, कुबेर की दिशा है। जो प्रकृति अभी तक ऋणात्मकता की ओर अग्रसर हो रही थी, उसकी अव्यवस्था में वृद्धि हो रही थी, अब वह धनात्मकता की ओर जाने लगती है, कुबेर बन जाती है। जैसे सरस्वती का प्राची बनना अपेक्षित है, वैसे ही गंगा का उत्तरवाहिनी बनना अपेक्षित है(वाराणसी में ही गङ्गा उत्तरवाहिनी कही जाती है)। 

     महाभारत शल्यपर्व ५१.१३ में आख्यान है कि दधीचि ऋषि ने सारे देवों के अस्त्रों के तेज को अपनी अस्थियों में समाहित कर लिया। किसी कारण से उनका वीर्य स्खलित हुआ तो सरस्वती ने उसे अपने अन्दर धारण कर लिया जिससे सारस्वत नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। जब अन्यत्र सर्वत्र अकाल पड जाता है, तब भी सारस्वत वेदाध्यापन करने में समर्थ होते हैं क्योंकि सरस्वती उन्हें भोजन के रूप में मत्स्य लाकर देती रहती है। पुराण में एक स्थान पर कहा गया है कि इसी कारण  सरस्वती तट पर बसने वाले ब्राह्मण मत्स्यभोजी होते हैं। यहां मत्स्य से तात्पर्य डा. फतहसिंह के अनुसार विज्ञानमय कोश की शक्ति है जिससे भूत भविष्य का ज्ञान हो जाता है। दधीचि की कथा संकेत करती है कि व्यावहारिक जीवन में जिस तेज को हमने आत्मसात् कर लिया है, सरस्वती उसी तेज से हमारे लिए प्रज्ञा रूपी पुत्र उत्पन्न करेगी। भागवत पुराण १०.२.१९ में तो उल्लेख है कि अज्ञानी की सरस्वती इसी प्रकार प्रकाशित नहीं होती जैसे कारागार में बन्द वसुदेव पत्नी देवकी।

     यह कहा जा सकता है कि सरस्वती परोक्ष रूप में सारस्वती है, सार ग्रहण करने की विद्या है। पुराणों के अनुसार भी सरस्वती नदी के रूप में प्रकट नहीं होती, अपितु सर के, सार के रूप में प्रकट होती है। वेद की भाषा में अग्नि को सार कहा जाता है। स्थूल तत्त्वों से अग्नि को प्रकट करना कठोर साधना का रूप है। जब अग्नि सोम बन जाए, रसयुक्त साधना बन जाए, वह स्थिति अपेक्षित है।

     स्कन्द पुराण ७.३.१ में कथा आती है कि वसिष्ठ की नन्दिनी धेनु उस खड्ड में गिर पडी जो उत्तंक ऋषि की कठोर साधना के फलस्वरूप बना था। जब सरस्वती ने अपने जल से उस गर्त का पूरण किया, तभी वह धेनु बाहर निकल सकी। इस कथा में सरस्वती को रसस्वती, रस वाली कहा जा सकता है। पृथिवी के गड्ढों के विषय में अन्यत्र कहा गया है कि ब्रह्महत्या को स्वीकार कर लेने पर पृथिवी को यह वरदान मिला था कि उसके गर्तों का पूरण संवत्सर से पूर्व ही हो जाया करेगा। संवत्सर अर्थात् मन प्राण वाक् का सम्मिलित रूप। पृथिवी के गर्त्तों को भरने का एक उपाय यह है कि संवत्सर बनाया जाए। आधुनिक द्रव्य विज्ञान में बहुक्रिस्टली व एक क्रिस्टली पदार्थों का उल्लेख आता है। यह अन्वेषणीय है कि पृथिवी के गर्तों को इस विज्ञान से जोडा जा सकता है या नहीं। जब तक संवत्सर नहीं बनेगा, तब तक चाहे जीव हो या जड पदार्थ, वह एक क्रिस्टली, एक इकाई नहीं बनेगा। पुराणों में सरस्वती का उद्भव द्वैत वन में कहा गया है जिसका अर्थ अन्वेषणीय है।

लेखन ६ -१२ -२०१५ई.( मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी, विक्रम संवत् २०७२)

टिप्पणी - सरस्वती को दिव्य वाक्, आकाशवाणी कहा जा सकता है। सरस्वती के विषय में पूरे पौराणिक साहित्य का आधार एक ही है प्राची सरस्वती और पश्चिम वाहिनी सरस्वती। पुराणों की इस कल्पना का वैदिक आधार क्या है, यह अभी तक ज्ञात नहीं हो सका है। पूर्व वाहिनी स्थिति पुण्या स्थिति है जबकि पश्चिम वाहिनी स्थिति अपने पापों का नाश करने से सम्बन्धित है। पश्चिम का अर्थ है जहां सूर्य अस्त होता है, आध्यात्मिक रूप में जब हमारे कर्मफलों के बीज भुन जाते हैं, वह बीज अंकुरित नहीं होते। पूर्व का अर्थ है जहां हमारे पुण्यों का उदय होता है। कुरुक्षेत्र वह स्थिति है जहां सरस्वती प्राची वाहिनी है। इसी प्रकार अन्य तीर्थ भी हैं। लोक में यह प्रसिद्ध है कि गंगा, यमुना नदियां तो प्रकट रहती हैं, लेकिन सरस्वती अदृश्य रहती है। यह स्थिति प्रयाग में संगम क्षेत्र में भी है। स्कन्द पुराण प्रभास खण्ड आदि में वर्णन आता है कि ब्रह्मा की आज्ञा से सरस्वती वडवाग्नि को लेकर पश्चिम समुद्र की ओर जा रही है। वह अदृश्य है। लेकिन जब वह वडवाग्नि के तेज से बहुत उद्विग्न हो जाती है, तब वह प्रकट होकर प्राची सरस्वती बन जाती है और उसी समय उसका गंगा आदि से मिलन होता है। ब्रह्म पुराण २. ६५ की कथा में स्पष्ट किया गया है कि जो सरस्वती अनृत रूपा थी, जो अनृत वचन बोलती थी, वह ब्रह्मा के शाप से अदृश्य नदी बन गई। फिर गंगा के वरदान से वह पुनः प्रकट हो गई।

ब्राह्मण ग्रन्थों में सरस्वती को अमावास्या कहा गया है और मन को सरस्वान्। अमावास्या तब प्रकट होती है जब चन्द्रमा का भौतिक जगत में दिखाई देने वाला भाग अदृश्य हो जाता है। चन्द्रमा का केवल वही भाग शेष रह जाता है जो पृथिवी से दिखाई नहीं देता। इसका अर्थ होगा कि हमारा मन का जो चेतन भाग है, उसको हमने अपने प्रयत्नों से पूरी तरह अन्तर्मुखी कर लिया है, बाहरी जगत में उसका कोई अंश शेष नहीं रह गया है। तभी सरस्वती रूपी सत्य वाक् प्रकट हो सकती है। चन्द्रमा का जो भाग पृथिवी से दिखाई नहीं देता, उसे हमारा अचेतन मन कहा जा सकता है। चन्द्रमा के उस भाग के विषय में कोई प्रत्यक्ष कथन उपलब्ध नहीं होता, जबकि हम जानते हैं कि हमारे सारे पापों की जड तो वहीं पर है। कहा गया है कि अमावास्या को चन्द्रमा पृथिवी पर ओषधियों में विलीन हो जाता है। इस कथन को और अच्छी प्रकार समझने की आवश्यकता है क्योंकि ब्राह्मण ग्रन्थों में कहा गया है कि अश्विनौ भिषक्, वैद्य हैं जबकि सरस्वती भेषज, ओषधि है।

अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति । अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि ॥

त्वे विश्वा सरस्वति श्रितायूंषि देव्याम् । शुनहोत्रेषु मत्स्व प्रजां देवि दिदिड्ढि नः ॥

इमा ब्रह्म सरस्वति जुषस्व वाजिनीवति । या ते मन्म गृत्समदा ऋतावरि प्रिया देवेषु जुह्वति ॥ - ऋ. २.४१.१६-१८

उपरोक्त तृच सरस्वती के विषय में बहुत कुछ रहस्योद्घाटन करने का अवसर प्रदान करती है। सबसे पहले सरस्वती के तीन रूपों का उल्लेख है अम्बितम, नदीतम और देवितम। अम्बितम, अर्थात् अम्ब का सर्वोत्कृष्ट रूप क्या होता है, यह दो प्रकार से समझा जा सकता है अश्वमेध के एक कृत्य के आधार पर तथा महाभारत की कथा के आधार पर । अश्वमेध में जब अश्व पृथिवी की परिक्रमा पूरी कर लेता है तो उसका वध कर दिया जाता है जिसे संज्ञपन कहते हैं। संज्ञपन का अर्थ है संज्ञान की, विशेष प्रकार के ज्ञान की स्थिति। इस समय जिन मन्त्रों का पाठ किया जाता है, उनमें से एक है अम्बे अम्बाल्य् अम्बिके न मा यभति कश् चन । ससस्त्य् अश्वकः । इत्यादि (तैत्तिरीय ब्राह्मण)। यहां अम्बा इत्यादि अश्वमेध के यजमान की तीन रानियों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन तीनो का कार्य यहां यह है कि जिस अश्व को मारकर उसके पूर्व प्राणों का हरण कर लिया गया है, उसमें प्राणों का नए रूप में संचार करना है, प्राणों को ऊर्ध्वमुखी, उदान का रूप बनाना है। महाभारत व पुराणों में इस सूत्र को एक बडी कथा के रूप में रूपान्तरित कर दिया गया है। काशिराज की तीन कन्याएं थी अम्बा, अम्बिका व अम्बालिका। भीष्म ने चित्रांगद व विचित्रवीर्य के लिए स्वयंवर से इनका हरण कर लिया। इनमें से अम्बा ने कहा कि उसने तो पहले ही मन से शाल्वराज का वरण कर लिया है। अतः भीष्म ने उसे वापस भेज दिया। लेकिन अब शाल्वराज ने अम्बा को अपनी भार्या बनाने से अस्वीकार कर दिया। तब अम्बा ने भीष्म से कहा कि वह उसे अपनी पत्नी रूप में स्वीकार कर ले। लेकिन भीष्म ने यह अस्वीकार कर दिया। तब अम्बा ने तप करके द्रुपद पुत्र शिखण्डी के रूप में जन्म लिया। शिखण्डी नपुंसक था, अतः युद्ध में भीष्म ने उस पर बाण नहीं चलाए और वह शिखण्डी के बाणों से विद्ध होकर शरशय्या पर लेटे रहे। अम्बा की भगिनियां अम्बिका व अम्बालिका चित्रागंद व विचित्रवीर्य की पत्नियां बनी लेकिन अपने पतियों की मृत्यु के पश्चात् पुत्र प्राप्ति हेतु व्यास ने उनसे समागम द्वारा तीन पुत्र उत्पन्न किए। पहला पुत्र अम्बिका से धृतराष्ट्र उत्पन्न हुआ जो अन्धा था। अन्धा होने का कारण यह था कि व्यास की भयानकता को देखकर अम्बिका ने अपनी आंखे बंद कर ली थी, अतः अन्धा पुत्र उत्पन्न हुआ। दूसरा पुत्र पाण्डु था। उसके पाण्डु नाम का कारण यह था कि उसकी माता अम्बालिका  व्यास के रूप की भयानकता को देखकर पीली पड गई थी। तीसरा पुत्र विदुर था जो एक दासी से उत्पन्न हुआ था, क्योंकि अम्बिका ने अपने स्थान पर दासी को व्यास के पास भेज दिया था। ब्राह्मण ग्रन्थों के सूत्र तथा महाभारत की इस कथा के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अम्बितम का अर्थ है व्यास, विस्तृत स्थिति का सामना करना। अभी हमारी बुद्धि बहुत सीमित है। वह न भूत में देखती है, न भविष्य में। लेकिन यदि भूत और भविष्य दिखाई पडने लगें तो उनकी भयानकता को देखकर बहुत डर लगेगा, जो अम्बिका व अम्बालिका के साथ हुआ। महाभारत युद्ध की परिणति इसमें होती है कि कौरवों और पाण्डवों का कुरुक्षेत्र में युद्ध होता है और अधिकांश योद्धा मारे जाते हैं। यह कुरुक्षेत्र भूत और भविष्य से परे वर्तमान की स्थिति है। वर्तमान में रहकर हमें अपने भूत और भविष्य पर निर्भर नहीं रहना है, अपितु पुरुषार्थ करना है जिससे भूत और भविष्य की भयानकताएं समाप्त हो जाएंगी। जब पुराणों में कहा जाता है कि सरस्वती कुरुक्षेत्र में पुण्यस्वरूपा है तो इसका अर्थ होगा कि सरस्वती के, विस्तृत, व्यास बुद्धि के आविर्भाव पर भूत और भविष्य की विषमताएं दिखाई पडेंगी, लेकिन उस समय हमें कुरुक्षेत्र रूपी पुरुषार्थ पर बल देना है, दैव पर निर्भर नहीं करना है।

          उपरोक्त तृच का विनियोग कर्मकाण्ड में दो अवसरों पर किया गया है दशरात्र के प्रथम दिन प्रउग शस्त्र में और चतुर्थ दिन के प्रउग शस्त्र में (दशरात्रे प्रथमेऽहनि प्रउगशस्त्रे अम्बितमे नदीतमे इति सारस्वतः सप्तमस्तृचः। चतुर्थे ऽहनि इति खण्डे सूत्रितम् अम्बितमे नदीतम इत्यानुष्टुभं प्रउगम् (आश्व.श्रौ.सू. ७.११.२२)- सायण भाष्य)। यहां यह समझना होगा कि दशरात्र में चतुर्थ अह क्या होता है। ऐतरेय ब्राह्मण ५.४.२२ में तो चतुर्थ अह में विनियोग का कारण यह बताया गया है कि प्रथम ऋचा के तृतीय व चतुर्थ पदों में प्र वर्ण प्रकट हुआ है(अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि) जो चतुर्थ अह का लक्षण है। चतुर्थ अह के लक्षणों में से एक है एति और प्रेति। अर्थात् स्वर्ग लोक से नीचे भूमि पर आना और भूमि से स्वर्गलोक में जाना। प्रेति का अर्थ होगा कि हम पृथिवी के अपने किसी पुण्य कर्म को उठाकर स्वर्ग लोक में स्थापित कर दें। अतः ऋचा में सरस्वती से प्रार्थना की जा रही है कि हम अपने किसी पुण्य को स्वर्गलोक में स्थापित करने में समर्थ नहीं हुए हैं, कृपा करके हमें ऐसा करने में समर्थ बनाओ। चतुर्थ अह को और अच्छी प्रकार से भागवत पुराण के चतुर्थ स्कन्ध के आधार पर समझा जा सकता है। भागवत पुराण के चतुर्थ स्कन्ध में मुख्य रूप से वेन का नाश करके उसकी देह का मन्थन करके  निषाद और पृथु को प्रकट करने तथा पृथु द्वारा भूमि रूपी गौ को समतल बनाना व गौ का पूरे ब्रह्माण्ड के स्थावर जंगम प्राणियों के लिए दोहन करना है। ऊपर जो व्यास की, विस्तृत चेतना की स्थिति कही गई है, वही पृथु के रूप में समझी जा सकती है। महाभारत आदि में कुरुक्षेत्र के संग्राम को प्राथमिकता दी गई है जबकि भागवत में पृथिवी रूपी चेतना को संवार कर उसे गौ रूप देने में तथा उसका दोहन करने को प्राथमिकता दी गई है। पुराणों में सरस्वती को चतुष्पदा, चतुःस्तना गौ का रूप दिया गया है।

          उपरोक्त तृचा का विनियोग प्रथम व चतुर्थ दिवसों के होता के प्रउग शस्त्रों हेतु कहा गया है। प्रउग शब्द का क्या अर्थ हो सकता है, इसके लिए प्रउग शब्द के संदर्भ पठनीय हैं। एक व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है कि  प्रउग का पूर्व रूप प्रउग्र है। उग्र की उग्रता समाप्त होने पर वह उग रह जाएगा। प्रउग शस्त्र द्वारा प्राणों का उत्थान किया जाता है, सोते प्राणों को जगाया जाता है। पवमान शस्त्र के पश्चात् आज्य शस्त्र का और आज्य शस्त्र के पश्चात् प्रउग शस्त्र का अनुशंसन किया जाता है( ऐतरेय ब्राह्मण २.३७)। सरस्वती के संदर्भ में कहा गया है कि मन सरस्वान् है तथा बुद्धि या वाक् सरस्वती है। जो कुछ मन सोचता है, वही बुद्धि व्यक्त करती है। फिर कहा गया है कि सरस्वान् मन की पराकाष्ठा श्रद्धा में रूपान्तरित होने में है। इस प्रकार सरस्वती रूपी वाक् के संदर्भ में मन और प्राण का युग्म प्रत्यक्ष रूप से साहित्य में प्राप्त हो रहा है। लेकिन संवत्सर बनाने के लिए मन, प्राण और वाक् का या भौतिक रूप में चन्द्रमा, सूर्य व पृथिवी का युग्मन होना आवश्यक है। अतः यह अन्वेषणीय है कि सरस्वती के साथ प्राणों का युग्मन वैदिक व पौराणिक साहित्य में किस प्रकार किया गया है। पुराणों में उल्लेख आता है कि जब दधीचि ऋषि सरस्वती में स्नान कर रहे थे, तब किसी कारण से उनका वीर्य स्खलित हो गया जो सरस्वती नदी ने गर्भ रूप में धारण कर लिया और उससे सारस्वत नामक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसे सरस्वती ने दधीचि को सौंप दिया। यह उल्लेखनीय है कि दधीचि ऋषि की अस्थियों में सारे देवों के अस्त्रों शस्त्रों का तेज विद्यमान है। अतः जब सरस्वती दधीचि के वीर्य से गर्भ धारण करती है तो उसका तात्पर्य यही हो सकता है कि सरस्वती सूर्य रूपी दधीचि के तेज को धारण करने में समर्थ है। इसी प्रकार जब अश्वमेध याग के संदर्भ में अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका पत्नियां संज्ञप्त अश्व के समीप खडी होती हैं, उस समय भी उनका उद्देश्य अश्व की चेतना को स्वयं में धारण करना होता होगा। महाभारत की कथा में अम्बालिका व अम्बिका द्वारा व्यास से गर्भ धारण करने की जो कथा है, उसमें व्यास भी सूर्य का प्रतीक हो सकता है। सूर्य को देखकर भी तो उसकी भार्या संज्ञा ने अपनी आंखें बंद करने का प्रयत्न किया था।

          पुराणों में सरस्वती के प्लक्ष वृक्ष के मूल के प्रकट होने के उल्लेख आते हैं। प्लक्ष/ प्रक्ष का अर्थ प्रक्षालन, अपने पापों का प्रक्षालन किया गया है।

          पुराणकार पुराण वाचन आरम्भ करने से पहले यह श्लोक कहना नहीं भूलते

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् |

देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥

यहां सरस्वती के देवी विशेषण को ऋग्वेद की उपरोक्त तृचा के संदर्भ में समझा जा  सकता है।

          एक पुराण में उल्लेख आता है कि सरस्वती के अंशावतार नहीं होते। दूसरी ओर ब्रह्मवैवर्त्त पुराण में कृष्ण पत्नी शैब्या को सरस्वती का अवतार कहा गया है। शैब्या अस्थिर  श्रद्धा का रूप है जिसके लिए अष्टसखी शब्द पर टिप्पणी पठनीय है।

 

         

प्रथम लेखन 20-12-2014ई.(पौष कृष्ण त्रयोदशी, विक्रम संवत् 2071)

 

Vipin ji,

Namaskar. There is difficulty with Aryasamaj that they fit all context in a single meaning and fight for that single meaning in name of Shastrartha. There is difference between Vyakarana & Nirukta also-being separate Vedangas. All possible combinations of Varna, Akshara, Pada as per Vyakarana are not used in language and Nirukta is scientific definition due to which meaning changes as per scientific process. In any normal language meaning of word changes with context. In Vedas, in addition to Physical (Adhibhautika) contexts, there are 2 other-Adhidaivika (or related Adhijyotisha) and inner (Adhyatmika or related Adhividya). Dr. Fatah Singh ji tried to extend the meanings, but did not classify as per world systems.

I will send a detailed note on Sarasvati. In cosmic system, creation starts with Prakriti whose form is Niyati- which means 2 opposite forms of transformation process called Sanchara-Pratisanchara, or Sambhuti-Vinasha-similar to Chemical kinetics in which chemcal reaction can proceed i either way depending on system parameters. Individuality starts with creation of galactic clouds called Garbha, Svadha etc. When heat radiation starts it is Goloka in which Galactic stars are born. Remaining part is visible as Galactic corona. From individual differences, classification & Buddhi (Intellect) is created. So the spread matter of galaxy is called Sarasvati.

On earth, there are several Sarasvatis. In particular, all 7 major rivers in Krauncha Dvipa (north America) were called Sarasvati as per Puranas. In Kusha Dvipa also Nile river was Sarasvati-including Nila-Sarasvati. These are now called White & Blue Nile. Nile = Nila = Blue, so it is erroneous to term one part as white Nile, it is simply Sarasvati. Within India also, there were many Sarasvatis some of which still exist. One Sarasvati merged with Ganga-Yamuna at Prayaga. One merged in Arab sea near Kacchha.

There are at least 2 forms of Adhyatmika Sarasvati-Abstract intellect which is 2nd of 4 Antahkarana-Mana, Buddhi, Ahankara, Chitta. Cerebral fluid is physical form of inner Sarasvati-called Mana-sarovara. 2 Hamsas are left & right parts of brain. 4th stage of Vak is spoken or written word called Matangi-one of 10 Mahavidyas. This is a branch of 3 parts of Mula-prakriti called Maha-kali, Maha--lakshmi, Maha-Sarasvati.

 

Arun Kumar Upadhyay, IPS (Retd)

C/47, (near airport), Palaspalli,

Bhubaneswar-751020

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संदर्भ

*पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । यज्ञं वष्टु धियावसुः ॥10।। चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम् । यज्ञं दधे सरस्वती ॥।।11।। महो अर्णः सरस्वती प्र चेतयति केतुना । धियो विश्वा वि राजति ॥ १,००३.१२

तृचे या प्रथमा सा दर्शपूर्णमासे अन्वारम्भणीयेष्टौ सरस्वत्या- पुरोनुवाक्या सायण भाष्य (आश्व.श्रौ.सू. 2.8)

*पा॒व॒का नः॒ सर॑स्वती॒ वाजे॑भिर्वा॒जिनी॑वती। य॒ज्ञं व॑ष्टु धि॒याव॑सुः॥ चो॒द॒यि॒त्री सू॒नृता॑नां॒ चेत॑न्ती सु॒मती॒नाम्। य॒ज्ञं द॑धे॒ सर॑स्वती॥ म॒हो अर्णः॒ सर॑स्वती॒ प्र चे॑तयति के॒तुना॑। धियो॒ विश्वा॒ वि रा॑जति॥ - ऋ. १.३.१०-१२

*इळा सरस्वती मही तिस्रो देवीर्मयोभुवः । बर्हिः सीदन्त्वस्रिधः ॥ १,०१३.०९

*इळा॒ सर॑स्वती म॒ही ति॒स्रो दे॒वीर्म॑यो॒भुवः॑। ब॒र्हिः सी॑दन्त्व॒स्रिधः॑॥ - ऋ. १.१३.९, ५.५.८

*तान् पूर्व॑या नि॒विदा॑ हूमहे व॒यं भगं॑ मि॒त्रमदि॑तिं॒ दक्ष॑म॒स्रिध॑म्। अ॒र्य॒मणं॒ वरु॑णं॒ सोम॑म॒श्विना॒ सर॑स्वती नः सु॒भगा॒ मय॑स्करत्॥ - ऋ. १.८९.३

*शुचिर्देवेष्वर्पिता होत्रा मरुत्सु भारती । इळा सरस्वती मही बर्हिः सीदन्तु यज्ञियाः ॥ - ऋ. १,१४२.०९

*शुचि॑र्दे॒वेष्वर्पि॑ता॒ होत्रा॑ म॒रुत्सु॒ भार॑ती। इळा॒ सर॑स्वती म॒ही ब॒र्हिः सी॑द॒न्तु य॒ज्ञियाः॑॥ - ऋ. १.१४२.९

*यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि ।

यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः सरस्वति तमिह धातवे कः ॥ १,१६४.४९

*भारतीळे सरस्वति या वः सर्वा उपब्रुवे । ता नश्चोदयत श्रिये ॥ १,१८८.०८

*त्वम॑ग्ने॒ अदि॑तिर्देव दा॒शुषे॒ त्वं होत्रा॒ भार॑ती वर्धसे गि॒रा। त्वमिळा॑ श॒तहि॑मासि॒ दक्ष॑से॒ त्वं वृ॑त्र॒हा व॑सुपते॒ सर॑स्वती॥ - ऋ. २.१.११

*सरस्वती साधयन्ती धियं न इळा देवी भारती विश्वतूर्तिः ।

तिस्रो देवीः स्वधया बर्हिरेदमच्छिद्रं पान्तु शरणं निषद्य ॥ २,००३.०८

*सर॑स्वती सा॒धय॑न्ती॒ धियं॑ न॒ इळा॑ दे॒वी भार॑ती वि॒श्वतू॑र्तिः। ति॒स्रो दे॒वीः स्व॒धया॑ ब॒र्हिरेदमच्छि॑द्रं पान्तु शर॒णं नि॒षद्य॑॥ - ऋ. २.३.८

*सरस्वति त्वमस्मां अविड्ढि मरुत्वती धृषती जेषि शत्रून् ।

त्यं चिच्छर्धन्तं तविषीयमाणमिन्द्रो हन्ति वृषभं शण्डिकानाम् ॥ २,०३०.०८

*या गुङ्गूर्या सिनीवाली या राका या सरस्वती ।

इन्द्राणीमह्व ऊतये वरुणानीं स्वस्तये ॥ २,०३२.०८

*या गु॒ङ्गूर्या सि॑नीवा॒ली या रा॒का या सर॑स्वती। इ॒न्द्रा॒णीम॑ह्व ऊ॒तये॑ वरुणा॒नीं स्व॒स्तये॑॥ - ऋ. २.३२.८

*अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति । अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि ॥16।। त्वे विश्वा सरस्वति श्रितायूंषि देव्याम् । शुनहोत्रेषु मत्स्व प्रजां देवि दिदिड्ढि नः ॥17।। इमा ब्रह्म सरस्वति जुषस्व वाजिनीवति । या ते मन्म गृत्समदा ऋतावरि प्रिया देवेषु जुह्वति ॥ ,०४१.१८

*आ भारती भारतीभिः सजोषा इळा देवैर्मनुष्येभिरग्निः ।

सरस्वती सारस्वतेभिरर्वाक्तिस्रो देवीर्बर्हिरेदं सदन्तु ॥ ,००४.०८

*आ भार॑ती॒ भार॑तीभिः स॒जोषा॒ इळा॑ दे॒वैर्म॑नु॒ष्ये॑भिर॒ग्निः। स॑रस्वती सारस्व॒तेभि॑र॒र्वाक् ति॒स्रो दे॒वीर्ब॒र्हिरेदं स॑दन्तु॥ - ऋ. ३.४.८

*विद्युद्रथा मरुत ऋष्टिमन्तो दिवो मर्या ऋतजाता अयासः ।

सर॑स्वती शृणवन् य॒ज्ञिया॑सो॒ धाता॑ र॒यिं स॒हवी॑रं तुरासः॥ - ऋ. ३.५४.१३

*इळा सरस्वती मही तिस्रो देवीर्मयोभुवः ।

बर्हिः सीदन्त्वस्रिधः ॥ ५,००५.०८

*दमूनसो अपसो ये सुहस्ता वृष्णः पत्नीर्नद्यो विभ्वतष्टाः।

सर॑स्वती बृहद्दि॒वोत रा॒का द॑श॒स्यन्ती॑र्वरिवस्यन्तु शु॒भ्राः॥ - ऋ. ५.४२.१२

*आ नो॑ दि॒वो बृ॑हतः पर्व॑ता॒दा सर॑स्वती यज॒ता ग॑न्तु य॒ज्ञम्। हवं॑ दे॒वी जु॑जुषा॒णा घृ॒ताची॑ श॒ग्मां नो॒ वाच॑मुश॒ती शृ॑णोतु॥ - ऋ. ५.४३.११

आ नो दिव इत्येकादशी व्यूढे दशरात्रे नवमेहनि प्रउगशस्त्रे सारस्वततृचे द्वितीया आश्व.श्रौ.सू. 8.11

*अग्न इन्द्र वरुण मित्र देवाः शर्धः प्र यन्त मारुतोत विष्णो ।

उ॒भा नास॑त्या रु॒द्रो अध॒ ग्नाः पू॒षा भगः॒ सर॑स्वती जुषन्त॥ - ऋ. ५.४६.२

*पावी॑रवी क॒न्या॑ चि॒त्रायुः॒ सर॑स्वती वी॒रप॑त्नी॒ धियं॑ धात्। ग्नाभि॒रच्छि॑द्रं शर॒णं स॒जोषा॑ दुरा॒धर्षं॑ गृण॒ते शर्म॑ यंसत्॥ - ऋ. ६.४९.७

,०६१.०१  इयमददाद्रभसमृणच्युतं दिवोदासं वध्र्यश्वाय दाशुषे ।

,०६१.०१ या शश्वन्तमाचखादावसं पणिं ता ते दात्राणि तविषा सरस्वति ॥

,०६१.०२  इयं शुष्मेभिर्बिसखा इवारुजत्सानु गिरीणां तविषेभिरूर्मिभिः ।

,०६१.०२ पारावतघ्नीमवसे सुवृक्तिभिः सरस्वतीमा विवासेम धीतिभिः ॥

,०६१.०३  सरस्वति देवनिदो नि बर्हय प्रजां विश्वस्य बृसयस्य मायिनः ।

,०६१.०३ उत क्षितिभ्योऽवनीरविन्दो विषमेभ्यो अस्रवो वाजिनीवति ॥

,०६१.०४  प्र णो देवी सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती ।

,०६१.०४ धीनामवित्र्यवतु ॥

,०६१.०५  यस्त्वा देवि सरस्वत्युपब्रूते धने हिते ।

,०६१.०५ इन्द्रं न वृत्रतूर्ये ॥

,०६१.०६  त्वं देवि सरस्वत्यवा वाजेषु वाजिनि ।

,०६१.०६ रदा पूषेव नः सनिम् ॥

,०६१.०७  उत स्या नः सरस्वती घोरा हिरण्यवर्तनिः ।

,०६१.०७ वृत्रघ्नी वष्टि सुष्टुतिम् ॥

,०६१.०८  यस्या अनन्तो अह्रुतस्त्वेषश्चरिष्णुरर्णवः ।

,०६१.०८ अमश्चरति रोरुवत् ॥

,०६१.०९  सा नो विश्वा अति द्विषः स्वसॄरन्या ऋतावरी ।

,०६१.०९ अतन्नहेव सूर्यः ॥

,०६१.१०  उत नः प्रिया प्रियासु सप्तस्वसा सुजुष्टा ।

,०६१.१० सरस्वती स्तोम्या भूत् ॥

,०६१.११  आपप्रुषी पार्थिवान्युरु रजो अन्तरिक्षम् ।

,०६१.११ सरस्वती निदस्पातु ॥

,०६१.१२  त्रिषधस्था सप्तधातुः पञ्च जाता वर्धयन्ती ।

,०६१.१२ वाजेवाजे हव्या भूत् ॥

,०६१.१३  प्र या महिम्ना महिनासु चेकिते द्युम्नेभिरन्या अपसामपस्तमा ।

,०६१.१३ रथ इव बृहती विभ्वने कृतोपस्तुत्या चिकितुषा सरस्वती ॥

,०६१.१४  सरस्वत्यभि नो नेषि वस्यो माप स्फरीः पयसा मा न आ धक् ।

,०६१.१४ जुषस्व नः सख्या वेश्या च मा त्वत्क्षेत्राण्यरणानि गन्म ॥

पार्ष्ठिके षष्ठेहनि प्रउगे इयमददात् इति सारस्वतस्तृचः आश्व.श्रौ.सू. 8.1

*आ भारती भारतीभिः सजोषा इळा देवैर्मनुष्येभिरग्निः ।

सरस्वती सारस्वतेभिरर्वाक्तिस्रो देवीर्बर्हिरेदं सदन्तु ॥ ,००२.०८

*प्र क्षोदसा धायसा सस्र एषा सरस्वती धरुणमायसी पूः ।

प्रबाबधाना रथ्येव याति विश्वा अपो महिना सिन्धुरन्याः ॥ ७,०९५.०१

प्रथमे छन्दोमे प्रउगशस्त्रे विनियोगः (आश्व.श्रौ.सू. 3.7)। सारस्वते पशौ वपाया याज्या सायण भाष्य

*एकाचेतत्सरस्वती नदीनां शुचिर्यती गिरिभ्य आ समुद्रात् ।

रायश्चेतन्ती भुवनस्य भूरेर्घृतं पयो दुदुहे नाहुषाय ॥ ७,०९५.०२

प्रथमे छन्दोमे प्रउगशस्त्रे विनियोगः (आश्व.श्रौ.सू. 3.7)। सारस्वते पशौ वपाया अनुवाक्या सायण भाष्य

*स वावृधे नर्यो योषणासु वृषा शिशुर्वृषभो यज्ञियासु ।

स वाजिनं मघवद्भ्यो दधाति वि सातये तन्वं मामृजीत ॥ ७,०९५.०३

प्रथमे छन्दोमे प्रउगशस्त्रे विनियोगः (आश्व.श्रौ.सू. 3.7)। सारस्वते पशौ पुरोडाशस्य याज्या सायण भाष्य

*उत स्या नः सरस्वती जुषाणोप श्रवत्सुभगा यज्ञे अस्मिन् ।

मितज्ञुभिर्नमस्यैरियाना राया युजा चिदुत्तरा सखिभ्यः ॥ ७,०९५.०४

द्वितीये छन्दोमे प्रउगशस्त्रे विनियोगः (आश्व.श्रौ.सू. 3.7)। सारस्वते पशौ पुरोडाशस्य अनुवाक्या सायण भाष्य

*इमा जुह्वाना युष्मदा नमोभिः प्रति स्तोमं सरस्वति जुषस्व ।

तव शर्मन्प्रियतमे दधाना उप स्थेयाम शरणं न वृक्षम् ॥ ७,०९५.०५

पवित्र्येष्ट्यां सारस्वतस्य हविषः याज्या सायण भाष्य

*अयमु ते सरस्वति वसिष्ठो द्वारावृतस्य सुभगे व्यावः ।

वर्ध शुभ्रे स्तुवते रासि वाजान्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥ ७,०९५.०६

*बृहदु गायिषे वचोऽसुर्या नदीनाम् । सरस्वतीमिन्महया सुवृक्तिभि स्तोमैर्वसिष्ठ रोदसी ॥1॥ उभे यत्ते महिना शुभ्रे अन्धसी अधिक्षियन्ति पूरवः । सा नो बोध्यवित्री मरुत्सखा चोद राधो मघोनाम् ॥2॥ भद्रमिद्भद्रा कृणवत्सरस्वत्यकवारी चेतति वाजिनीवती । गृणाना जमदग्निवत्स्तुवाना च वसिष्ठवत् ॥3॥ 7.96.1-3

पञ्चमेऽहनि प्रउगशस्त्र विनियोगः  सायण भाष्य

 

*जनीयन्तो न्वग्रवः पुत्रीयन्तः सुदानवः । सरस्वन्तं हवामहे ॥4॥ ये ते सरस्व ऊर्मयो मधुमन्तो घृतश्चुतः । तेभिर्नोऽविता भव ॥5॥ पीपिवांसं सरस्वतः स्तनं यो विश्वदर्शतः । भक्षीमहि प्रजामिषम् ॥6॥(दे. सरस्वान्) 7.96.4-6

,००५.०८  भारती पवमानस्य सरस्वतीळा मही ।

,००५.०८ इमं नो यज्ञमा गमन्तिस्रो देवीः सुपेशसः ॥

*सरस्वतीं देवयन्तो हवन्ते सरस्वतीमध्वरे तायमाने ।

सरस्वतीं सुकृतो अह्वयन्त सरस्वती दाशुषे वार्यं दात् ॥7।।

सरस्वति या सरथं ययाथ स्वधाभिर्देवि पितृभिर्मदन्ती ।

आसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयस्वानमीवा इष आ धेह्यस्मे ॥8।।

सरस्वतीं यां पितरो हवन्ते दक्षिणा यज्ञमभिनक्षमाणाः ।

सहस्रार्घमिळो अत्र भागं रायस्पोषं यजमानेषु धेहि ॥9।। १०,०१७.०९

व्यूळ्हस्य दशरात्रस्य तृतीये छन्दोमे प्रउगशस्त्रे तृचस्य विनियोगः सायण भाष्य

 

*तिस्रो देवीर्बर्हिरिदं वरीय आ सीदत चकृमा वः स्योनम् ।

मनुष्वद्यज्ञं सुधिता हवींषीळा देवी घृतपदी जुषन्त ॥ १०,०७०.०८

*आ नो यज्ञं भारती तूयमेत्विळा मनुष्वदिह चेतयन्ती ।

तिस्रो देवीर्बर्हिरेदं स्योनं सरस्वती स्वपसः सदन्तु ॥ १०,११०.०८

(.२०.७ ) अर्यमणं बृहस्पतिमिन्द्रं दानाय चोदय ।

(.२०.७ ) वातं विष्णुं सरस्वतीं सवितारं च वाजिनम् ॥७॥

(.४.६ ) अद्याग्ने अद्य सवितरद्य देवि सरस्वति ।

(.४.६ ) अद्यास्य ब्रह्मणस्पते धनुरिवा तानया पसः ॥६॥

(.७.४ ) सरस्वतीमनुमतिं भगं यन्तो हवामहे ।

(.७.४ ) वाचं जुष्टां मधुमतीमवादिषं देवानां देवहूतिषु ॥४॥

 

(.७.५ ) यं याचाम्यहं वाचा सरस्वत्या मनोयुजा ।

(.७.५ ) श्रद्धा तमद्य विन्दतु दत्ता सोमेन बभ्रुणा ॥५॥

(.३.२ ) पातां नो द्यावापृथिवी अभिष्टये पातु ग्रावा पातु सोमो नो अंहसः ।

(.३.२ ) पातु नो देवी सुभगा सरस्वती पात्वग्निः शिवा ये अस्य पायवः ॥२॥

(.४१.२ ) अपानाय व्यानाय प्राणाय भूरिधायसे ।

(.४१.२ ) सरस्वत्या उरुव्यचे विधेम हविषा वयम् ॥२॥

(.८९.३ ) मह्यं त्वा मित्रावरुणौ मह्यं देवी सरस्वती ।

(.८९.३ ) मह्यं त्वा मध्यं भूम्या उभावन्तौ समस्यताम् ॥३॥

(.९४.१ ) सं वो मनांसि सं व्रता समाकूतीर्नमामसि ।

(.९४.१ ) अमी ये विव्रता स्थन तान् वः सं नमयामसि ॥१॥

(.९४.२ ) अहं गृभ्णामि मनसा मनांसि मम चित्तमनु चित्तेभिरेत ।

(.९४.२ ) मम वशेषु हृदयानि वः कृणोमि मम यातमनुवर्त्मान एत ॥२॥

(.९४.३ ) ओते मे द्यावापृथिवी ओता देवी सरस्वती ।

(.९४.३ ) ओतौ म इन्द्रश्चाग्निश्च र्ध्यास्मेदं सरस्वति ॥३॥

(.१०.१ ) यस्ते स्तनः शशयुर्यो मयोभूर्यः सुम्नयुः सुहवो यः सुदत्रः ।

(.१०.१ ) येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवे कः ॥१॥

(.११.१ ) यस्ते पृथु स्तनयित्नुर्य ऋष्वो दैवः केतुर्विश्वमाभूषतीदम् ।

(.११.१ ) मा नो वधीर्विद्युता देव सस्यं मोत वधी रश्मिभिः सूर्यस्य ॥१॥

 (.५७.१ ) यदाशसा वदतो मे विचुक्षुभे यद्याचमानस्य चरतो जनामनु ।

(.५७.१ ) यदात्मनि तन्वो मे विरिष्टं सरस्वती तदा पृणद्घृतेन ॥१॥

(.५७.२ ) सप्त क्षरन्ति शिशवे मरुत्वते पित्रे पुत्रासो अप्यवीवृतन्न् ऋतानि ।

(.५७.२ ) उभे इदस्योभे अस्य राजत उभे यतेते उभे अस्य पुष्यतः ॥२॥

 

 (.६८.१ ) सरस्वति व्रतेषु ते दिव्येषु देवि धामसु ।

(.६८.१ ) जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि ररास्व नः ॥१॥

 

(.६८.२ ) इदं ते हव्यं घृतवत्सरस्वतीदं पितॄणां हविरास्यं यत्।

(.६८.२ ) इमानि त उदिता शंतमानि तेभिर्वयं मधुमन्तः स्याम ॥२॥

 

(.६८.३ ) शिवा नः शंतमा भव सुमृडीका सरस्वति ।

(.६८.३ ) मा ते युयोम संदृशः ॥१॥

 

*सूर्यो॒ माह्नः॑ पात्व॒ग्निः पृ॑थि॒व्या वा॒युर॒न्तरि॑क्षाद् य॒मो म॑नु॒ष्येभ्यः॒ सर॑स्वती॒ पार्थि॑वेभ्यः। - शौ.अ. १६.४.४

(१८.१.४१ ) सरस्वतीं देवयन्तो हवन्ते सरस्वतीमध्वरे तायमाने ।

(१८.१.४१ ) सरस्वतीं सुकृतो हवन्ते सरस्वती दाशुषे वार्यं दात्॥४१॥

 

(१८.१.४२ ) सरस्वतीं पितरो हवन्ते दक्षिणा यज्ञमभिनक्षमाणाः ।

(१८.१.४२ ) आसद्यास्मिन् बर्हिषि मादयध्वमनमीवा इष आ धेह्यस्मे ॥४२॥

 

(१८.१.४३ ) सरस्वति या सरथं ययाथोक्थैः स्वधाभिर्देवि पितृभिर्मदन्ती ।

(१८.१.४३ ) सहस्रार्घमिडो अत्र भागं रायस्पोषं यजमानाय धेहि ॥४३॥

 

*चातुर्मास्ययागः : अथ सारस्वतश्चरुर्भवति। पौष्णश्चरुः। योषा वै सरस्वती वृषा पूषा। तत्पुनर्मिथुनं प्रजननम्। मा.श. २.५.१.११

३.१.४.[९]

सरस्वत्यै पूष्णेऽग्नये स्वाहेति । वाग्वै सरस्वती वाग्यज्ञः पशवो वै पूषा पुष्टिर्वै पूषा पुष्टिः पशवः पशवो हि यज्ञस्तद्यदेवात्र यज्ञस्य तदेवैतत्सम्भृत्यात्मन्कुरुते

३.९.१.[७]

अथ सारस्वतम् । वाग्वै सरस्वती वाचैव तत्प्रजापतिः पुनरात्मानमाप्याययत वागेनमुपसमावर्तत वाचमनुकामात्मनोऽकुरुत वाचो एवैष एतदाप्यायते वागेनमुपसमावर्तते वाचमनुकामात्मनः कुरुते

३.९.१.[९]

तद्यत्सारस्वतमनु भवति । वाग्वै सरस्वत्यन्नं सोमस्तस्माद्यो वाचा प्रसाम्यन्नादो हैव भवति

४.२.५.[१४]

यद्यतीरात्रः स्यात्सारस्वतं चतुर्थमालभेत वाग्वै सरस्वती योषा वै वाग्योषा रात्रिस्तद्यथायथं यज्ञक्रतून्व्यावर्तयति

 

*हविष्पंक्तिः : इन्द्रस्य पुरोडाशः, हर्योर्धानाः, पूष्णः करम्भः, सरस्वत्यै दधि, मित्रावरुणयोः पयस्या। मा.श. ४.२.५.२२

५.३.४.[२५]

अथ यत्सारस्वतीषु न जुहोति । वाग्वै सरस्वती वज्र आज्यं नेद्वज्रेणाज्येन वाचं हिनसानीति तस्मात्सारस्वतीषु न जुहोति

 

*युवँँ सुराममश्विना नमुचावासुरे सचा विपिपाना शुभस्पती इन्द्रं कर्मस्वावतम् इत्याश्राव्याहाश्विनौ सरस्वतीमिन्द्रँँ सुत्रामाणं यजेति मा.श. ५.५.४.२५

*स यजति पुत्रमिव पितरावश्विनोभेन्द्रावथुः काव्यैर्दंसनाभिः। यत् सुरामं व्यपिबः शचीभिः सरस्वती त्वा मघवन् अभिष्णक् इति। - मा.श. ५.५.४.२६

अभिष्णक् भेषजसन्धानं कृतवती सायण भाष्य

११.२.४.[९]

तद्धैके  चरू निर्वपन्ति पौर्णमास्यां सरस्वतेऽमावास्यायां सरस्वत्या एतत्प्रत्यक्षं दर्शपूर्णमासौ यजामह इति वदन्तस्तदु तथा न कुर्यान्मनो वै सरस्वान्वाक्सरस्वती स यदेवैतावाघारावाघारयति तदेवास्य दर्शपूर्णमासाविष्टौ भवतस्तस्मादेतौ चरू न निर्वपेत्

११.४.३.[३]

तस्या(श्रियाः) अग्निरन्नाद्यमादत्त  सोमो राज्यं वरुणः साम्राज्यं मित्रः क्षत्रमिन्द्रो बलं बृहस्पतिर्ब्रह्मवर्चसं सविता राष्ट्रं पूषा भगं सरस्वती पुष्टिं त्वष्टा रूपाणि

 

*मित्रविन्देष्टिः प्रजापतिर्वै प्रजाः सृजमानोऽतप्यत। तस्माच्छ्रांतात्तेपानाच्छ्रीरुदक्रामत्। - - -- -सरस्वती (श्रियः) पुष्टिम् (आदत्त) मा.श. ११.४.३.३

११.४.३.[६]

तानेतयानुवाक्ययान्ववदत्  अग्निः सोमो वरुणो मित्र इन्द्रो बृहस्पतिः सविता यः

सहस्री पूषा नो गोभिरवसा सरस्वती त्वष्टा रूपाणि समनक्तु यज्ञैरिति ते प्रत्युपातिष्ठन्त

 

*सरस्वती पुष्टिं पुष्टिपतिः पुष्टिमस्मिन्यज्ञे मयि दधातु स्वाहा इति। आहुतिमेवादाय सरस्वत्युदक्रामत्। पुनरस्यै पुष्टिमददात्। मा.श. ११.४.३.१६

ते सरस्वतीमब्रुवन्। त्वं वै भैषज्यमसि। त्वमिमं भिषज्येति। साऽब्रवीत्। अस्तु मे भाग इति। तेऽब्रुवन्। य एषोऽविः, स ते भाग इति। तथेति। तस्मात्सारस्वतो मेषो भवति॥12.7.1.१२॥

तावश्विनौ च सरस्वती च इंद्रियं वीर्यं नमुचेराहृत्य तदस्मिन्पुनरदधुः। तं पाप्मनोऽत्रायंत। सुत्रातं बतैनं पाप्मनोऽत्रास्महीति। तद्वाव सौत्रामण्यभवत्। - 12.7.1.14

 

*अश्विनौ वै देवानां भिषजौ। ताभ्यामेवैनं भिषज्यति। सरस्वती भेषजम्। तयैवास्मिन् भेषजं करोति। मा.श. १२.७.२.३

*प्राणः सरस्वती वीर्यम्। यत्सारस्वतो भवति। प्राणमेवास्मिंस्तद्वीर्यं दधाति। अथो अपानम्। समानं हि प्राणश्चापानश्च। - मा.श. १२.७.२.५

तावश्विनौ च सरस्वती च अपां फेनं वज्रमसिञ्चन्। न शुष्को नार्द्र इति। तेनेंद्रो नमुचेरासुरस्य व्युष्टायां रात्रौ, अनुदित आदित्ये, न दिवा न नक्तमिति शिर उदवासयत्॥12.7.3.३॥

तावश्विनौ च सरस्वती च अपां फेनं वज्रमसिञ्चन्। न शुष्को नार्द्र इति। तेनेंद्रो नमुचेरासुरस्य व्युष्टायां रात्रौ, अनुदित आदित्ये, न दिवा न नक्तमिति शिर उदवासयत्॥12.8.1.३॥

*तद्यौ ह वा इमौ पुरुषाविवाक्ष्योः। एतावेवाश्विनौ। अथ यत् कृष्णम्। तत्सारस्वतम्। यच्छुक्लम्। तदैन्द्रम्। - मा.श. १२.९.१.१२

*मन एवेन्द्रः। वाक् सरस्वती। श्रोत्रे अश्विनौ। यद् वै मनसा ध्यायति। तद्वाचा वदति। यद्वाचा वदति। तत् कर्णाभ्यां शृणोति। - मा.श. १२.९.१.१३

*सौत्रामणीयज्ञात् पुरुषोत्पत्तिः प्राण एवेन्द्रः। जिह्वा सरस्वती। नासिके अश्विनौ। यद्वै प्राणेनान्नमात्मन् प्रणयते। तत् प्राणस्य प्राणत्वम्। जिह्वया वा अन्नस्य रसं विजानाति। नासिके उ वै प्राणस्य पंथाः। मा.श. १२.९.१.१४

१३.१.८.[५]

सरस्वत्यै स्वाहा  सरस्वत्यै पावकायै स्वाहा सरस्वत्यै बृहत्यै स्वाहेति वाग्वै सरस्वती वाचैवैनमुद्यच्छति

 

*प्रवर्ग्ये गवाजपयोऽवसेचनं ब्राह्मणम् : अथ गामाह्वयति जघनेन गार्हपत्यं यन् इड एहि, अदित एहि, सरस्वत्येहि इति। इडा हि गौः। अदितिर्हि गौः। सरस्वती हि गौः। - मा.श. १४.२.१.७

१४.९.४.[२८]

अथैनं मात्रे प्रदाय स्तनं प्रयच्छति  यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः  येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवे करिति

 

*सरस्वत्यै पूष्णे अग्नये स्वाहा तै.सं. १.२.२.१, मै.सं. १.२.२, काठ.सं. २.२

*सरस्वत्यै चरुं, सरस्वते चरुं, मिथुनौ गावौ दक्षिणा तै.सं. १.८.१.२

*प्र णो देवी सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती। धीनामवित्र्यवतु तै.सं. १.८.२२.१

*हवं देवी जुजुषाणा घृताची(सरस्वती) शग्मां नो वाचमुशती शृणोतु तै.सं. १.८.२२.२

*वाग्वै सरस्वती तै.सं. २.१.२.६, २.२.९.१, मै.सं. १.१०.५, १.११.९, २.३.९, २.४.१, २.५.२, ३.६.४, ३.९.५, ३.१०.६, ४.४.७, काठ.सं. २३.२, २९.१, कपि.क.सं. ४५.२, ४८.१८, कौ.ब्रा. ५.२, १२.८, १४.४, गो.ब्रा. २.१.२०, जै.ब्रा. १.७०, २.२९८, तां.ब्रा. ६.७.७, १६.५.१६, तै.ब्रा. १.३.४.५, १.८.११.२, मा.श. २.५.४.६, ३.९.१.७

*सरस्वत्याज्यभागा स्यात् तै.सं. २.२.९.१

*सरस्वतीं वाक् गच्छति तै.सं. २.३.११.१

*सरस्वती मनुष्येभ्यः (पातु) तै.सं. ३.२.४.४

*अमावास्या सरस्वती, पूर्णमासः सरस्वान् तै.सं. ३.५.१.५, मै.सं. १.४.१५, तु. गो.ब्रा. २.१.१२

*सरस्वती सह रुद्रैर्न आवीत् तै.सं. ५.१.११.३, मै.सं. ३.१६.२, काठ.सं. ४६.२

*सरस्वत्यै श्येता पुरुषवाक् तै.सं. ५.५.१२.१

*सरस्वतीं जिह्वाग्रेण (प्रीणामि) तै.सं. ५.७.११.१, काठ.सं. ५३.१

*या सरस्वती वेशभगीना तस्यास्ते भक्तिवानो भूयास्म मै.सं. १.४.३

*वाक् सरस्वती मै.सं. २.१.७, २.३.५, ४.३.९, ४.७.८, काठ.सं. ११.८, मा.श. ७.५.१.३१, ११.२.४.९, १२.९.१.१३ (तु. ऐ.ब्रा. २.२४, ३.१, ३.२, ६.७)

*सारस्वतीं मेषीम् (आलभेत यो वाचो गृहीतः) मै.सं. २.५.२

*सरस्वत्यै सत्यवाचे चरुर्दण्ड उपानहौ शुष्कदृतिः सा दक्षिणा मै.सं. २.६.१३

*सरस्वतीवान् भारतीवान् परिवापः मै.सं. ३.१०.६, काठ.सं. २९.१, कपि.क.सं. ४५.२, ऐ.ब्रा. २.२४

*मेषँँ सरस्वत्यै स्वाहा मै.सं. ३.११.२

*पातं नो अश्विना दिवा, पाहि नक्तँँ सरस्वति मै.सं. ३.११.३, काठ.सं. ३८.८

*सरस्वत्यास्त्वा वीर्येण यशसेऽन्नाद्यायाभिषिञ्चामि मै.सं. ३.११.८

*सारस्वती मेष्यधस्ताद्धन्वोः मै.सं. ३.१३.२

*सरस्वत्यै शारिः पुरुषवाक् मै.सं. ३.१४.१४, काठ.सं. ४७.२

*सरस्वत्या अग्रजिह्वम् मै.सं. ३.१५.१

*सरस्वत्या निपक्षतिः मै.सं. ३.१५.५, काठ.सं. ५३.११

*वरुणस्य वा अभिषिच्यमानस्येन्द्रियँँ वीर्यमपाक्रामत् तत् त्रेधाभवद्, भृगुस्तृतीयमभवत्, श्रायन्तीयं तृतीयँँ सरस्वतीं तृतीयं प्राविशत् मै.सं. ४.३.९

*मेषी सारस्वती मै.सं. ४.७.८( तु. काठ.सं. ८.१)

*सरस्वतीमँँ रुद्रैर्यज्ञमावीत् मै.सं. ४.१३.८

*एका चेतत् सरस्वती नदीनां शुचिर्यती गिरिभ्या आ समुद्रात्। रायश्चेतन्ती भुवनस्य भूरेर्घृतं पयो दुदुहे नाहुषाय मै.सं. ४.१४.७

*सरस्वत्या अहं देवयज्यया वाचमन्नाद्यं पुषेयम् काठ.सं. ५.१

*सरस्वत्यै वेशभगिन्यै स्वाहा काठ.सं. ५.४

*यत्र सरस्वत्या मेष्या हविषः प्रिया धामानि काठ.सं. १८.२१

*सरस्वत्या मनुष्याः(अन्वाभूयन्त) काठ.सं. ३५.१५

*दुहे कामान् सरस्वती काठ.सं. ३८.८

*सरस्वत्यै पावकायै स्वाहा, सरस्वत्यै बृहत्यै स्वाहा काठ.सं. ४३.५

*सरस्वत्येहि तै.आ. ५.७.१

*पातं नो अश्विना दिवा पाहि नक्तं सरस्वती  वा.सं. २०.६२

*प्राणेन सरस्वती वीर्यं वा.सं. २०.८०

*सरस्वत्या सुपिप्पल (वनस्पति) वा.सं. २१.५६

*वाचं सरस्वतीं स्वाहाकारेण परिगृह्णीयात् जै.ब्रा. १.८२

*वरुणस्य ह वै सुष्वाणस्य षडशतयैरापो भर्गं निरघ्नन्। तदिमां दशमपतत्। तच्चतुर्धाभवद् भृगुस्तुरीयं सरस्वती तुरीयं दशपेयस्तुरीयं श्रायन्तीयं तुरीयम् जै.ब्रा. २.२०१

*सरस्वतीरापो ऽभिषेचनीयाः जै.ब्रा. २.२०१

*एतद् वै दैव्यं मिथुनं प्रजननं यत् सरस्वांश्च सरस्वती च जै.ब्रा. २.१८५

*सरस्वत्यै त्वा वाचो यन्तुर्यन्त्रेण बृहस्पतेस्त्वा साम्राज्येन ब्रह्मणाभिषिञ्चामीति जै.ब्रा. २.१३०

*वागेव सरस्वती ऐ.ब्रा. २.२४, ६.७

*वाचे सरस्वत्यै स्वाहा तै.आ. ४.५.१, ४.१५.१

*सरस्वतीं (आमयाविनः) वाक् (गच्छति) तै.ब्रा. १.६.२.२

*सरस्वती वाचमदधात् तै.ब्रा. १.६.२.२

*एषा वा अपां पृष्ठं यत्सरस्वती तै.ब्रा. १.७.५.५

*सरस्वती पुष्टिः पुष्टिपत्नी। - तै.ब्रा. २.५.७.४

*सरस्वतीति तद् द्वितीयम् वज्ररूपम् कौ.ब्रा. १२.२

*सरस्वत्या वै देवा आदित्यमस्तभ्नवन् सा नायछत् साभ्यव्लीयत तस्मात् सा नुब्जिमतीव तं वृहत्यास्तभ्नुवन् सायछत्तस्माद् बृहती छन्दसां वीर्य्यवत्तमादित्यं हि तयास्तभ्नुवन्। तां.ब्रा. २५.१०.११

नायछत् नियन्तुं नाशक्नोत्; व्यलीयत् शिथिलाभूत्; नुब्जिका - वक्रोपेता सायण भाष्य

*चतुश्चत्वारिंशदाश्वीनानि सरस्वत्या विनशनात् प्लक्षः प्रास्रवणस्तावदितः स्वर्गोलोकः सरस्वती सम्मितेनाध्वना स्वर्गलोकं यन्ति तां.ब्रा. २५.१०.१६

आश्वीनानि एकोप्यश्व एकेनाहोरात्रेण यावन्तमध्वानं गच्छति तावानेकाश्वीनः सायण भाष्य

 

॥2.4॥

पूर्वा दर्शपूर्णमासाभ्यामन्वारम्भणीयेष्टिः  १

आग्नावैष्णवः सरस्वत्यै सरस्वते

च  २

॥3.9॥

इलादधस्य  १

आग्नेयः सरस्वत्यै च  २

 

6.10॥ ज्योतिष्टोमे सवनीयपशुप्रकरणम्

अग्ने नयेति तिस्रो भुवो यज्ञस्य प्र वः शुक्राय प्र कारव इत्याग्नेयस्य  १

आ नो दिवो बृहतः पर्वतादा सरस्वतीं देवयन्तः सरस्वत्यभि नः पावीरवी कन्या प्र क्षोदसेमा जुह्वाना इति सारस्वतस्य  २

 

9.24॥ ज्योतिष्टोमे अग्निचयनप्रकरणम्

त्रिहविश्च दीक्षणीया  १

आग्नावैष्णवो वैश्वानरीय आदित्येभ्यश्च  २

त्यान्नु क्षत्रियान्धारयन्तः  ३

पञ्चहविर्वा  ४

अदितये चतुर्थः पञ्चमः सरस्वत्यै  ५

 

दशममहः - प्रायणीयोदयनीययोः सारस्वतः  10.1.१८

 

13.29॥ सारस्वतसत्रप्रकरणम्

सरस्वत्या विनशने दीक्षा सारस्वतानाम्  १

क्रीत्वा राजानमुपनह्योपसद उपेत्य  ।  प्रायणीयमतिरात्रमुपेत्य  ।  इष्ट्वा सांनाय्येनाध्वर्युः शम्यां परास्य  ।  तत्र गार्हपत्यं निधाय षट्त्रिंशत्प्रक्रमेष्वाहवनीयमभ्यादधाति  २

 

14.13॥ हविर्यज्ञसोमप्रकरणम्

तस्याश्विनो लोहोऽजः सारस्वती मेषीति पशू उपालम्भ्यौ सवनीयस्य  १

इन्द्राय सुत्राम्णे वशानूबन्ध्याया उपालम्भ्यैवंविधा  २

 

-    ॥शां.श्रौ.सू.15.15

अथ सौत्रामणी  १

आश्विनो लोहोऽजः  २

सारस्वती मेषी  ३

इन्द्राय सुत्राम्ण

ऋषभः  ४

 

महाव्रतप्रकरणम् - उत स्या नः सरस्वती जुषाणेति सारस्वतम्  17.8.१०

 

त्यत्रो ह स्माहौपमन्यव औषधस्यैवोपाँशुयाजं कुर्यात्सरस्वतः पौर्णमास्याँ  सरस्वत्या अमावास्यायामित्युभयत्रैवाज्यस्य बौ.श्रौ.सू. 20.13

सवितुरहं देवयज्यया स्वस्तिमान्पशुमान्भूयासं सरस्वत्या अहं देवयज्यया वाचमन्नाद्यं पुषेयं सरस्वतोऽहं देवयज्यया श्रद्धामना भूयासम्पूष्णोऽहं देवयज्यया पुष्टिमान्पशुमान्भूयासम्मरुतामहं देवयज्यया प्राणैरृध्यासम्विश्वेषां देवानामहं देवयज्यया प्राणैः सायुज्यं गमेयं द्यावापृथिव्योरहं देवयज्ययोभयोर्लोकयोरृध्यासम्भूमानं प्रतिष्ठां गमेयमिति वा वाजिनामहं देवयज्यया रेतस्वी भूयासम्वरुणस्याहं देवयज्यया धर्मभाग्भूयासं कस्याहं देवयज्यया शविष्ठो भूयासम्विश्वकर्मणोऽहं देवयज्यया विश्वानि कर्माण्यवरुन्धीयादित्या अहं देवयज्ययाँहसो मुच्येय वायोरहं देवयज्यया रत्नभाग्भूयासं सूर्यस्याहं देवयज्यया सुदृशीको भूयासम् अग्नाविष्णवोरहं देवयज्यया वीर्यवान्भूयासम्विष्णोरहं देवयज्यया शिपिविष्टो भूयासम् अर्यम्णोऽहं देवयज्यया स्वर्गं लोकं गमेयमिति बौ.श्रौ.सू. 27.14

त्यथ पृष्ठ्याँ  स्तीर्त्वापः प्रणीयाग्नये पवमानाय पुरोडाशमष्टाकपालं निर्वपति सरस्वत्यै प्रियाया उपाँश्वाज्यमग्नये पावकाय पुरोडाशमष्टाकपालं निर्वपति सरस्वत्यै प्रियाया उपाँ  श्वाज्यमग्नये पावकाय पुरोडाशमष्टाकपालं निर्वपति सवित्रे सत्यप्रसवायोपाँ  श्वाज्यमग्नये शुचये पुरोडाशमष्टाकपालं निर्वपति वायवे नियुत्वत उपाँश्वाज्यमग्नये व्रतपतये पुरोडाशमष्टाकपालं निर्वपति विष्णवे शिपिविष्टायोपाँश्वाज्यमग्नये वैश्वानराय पुरोडाशमष्टाकपालं निर्वपति दधिक्राव्ण उपाँश्वाज्यमिति

 

श्रपयित्वासादयति बौ.श्रौ.सू. 28.2

 

दर्शपूर्णमासौ फलीकरणहोमं यज्ञे या विप्रुषः सन्ति बह्वीरग्नौ ताः सर्वाः स्विष्टाः सुहुता जुहोमि स्वाहेति। या सरस्वती विशोभगीना तस्यै स्वाहा या सरस्वती वेशभगीना तस्यै स्वाहेन्द्रोपानस्यकेहमनसो वेशान्कुरु सुमनसः सजातान्स्वाहेति दक्षिणाग्नौ प्रतिमन्त्रं जुहोति  आप.श्रौ.सू. 3.10.२

या सरस्वती विशोभगीना तस्यां मे रास्व तस्यास्ते भक्तिवानो भूयास्मेति फलीकरणहोमे हुते मुखं विमृष्टे 4.13. ७

दर्शपूर्णमासौ याजमानः -- अच्छिद्रः प्रजया भूयासं मा परासेचि मत्पय इत्यन्तर्वेदि शेषं निनीय यदप्सु ते सरस्वति गोष्ठश्वेषु यन्मधु  ।  तेन मे वाजिनीवति मुखमङ्ग्धि सरस्वति  ।  या सरस्वती वैशम्बल्या तस्यां मे रास्व तस्यास्ते भक्षीय तस्यास्ते भूयिष्ठभाजो भूयास्मेति मुखं विमृष्टे  4.14.४

अग्न्याधेयः पूर्णा पश्चाद्यत्ते देवा अदधुरिति सारस्वतौ होमौ हुत्वान्वारम्भणीयामिष्टिं निर्वपति।4। आग्नावैष्णवमेकादशकपालं सरस्वत्यै चरुं सरस्वते द्वादशकपालम्  5.23.५

अग्निहोत्रे अग्न्युपस्थानम् -- य ऊर्ध्वमेकाष्टकाया वत्सा जायन्ते तेषां प्रथमजं ददाति  ।  एतमु त्यं मधुना संयुतं यवं सरस्वत्या अधि मनावचर्कृषुः  ।  इन्द्र आसीत्सीरपतिः शतक्रतुः कीनाशा आसन्मरुतः सुदानव इति यजमानभागं प्राश्नाति  ।  सर्वेषां वा भक्षाणां मन्त्रवतां प्र-त्याम्नायः स्यात्  6.30.२०

 

 

इन्द्राय हरिवते धाना इन्द्राय पूषण्वते करम्भं सरस्वत्यै भारत्यै परिवापमिन्द्राय पुरोडाशं मित्रावरुणाभ्यां पयस्यामिति 12.4.६

सावित्रेण रशनामादायादित्यै रास्नासीत्यभिमन्त्र्य पूर्वया द्वारोपनिष्क्रम्य त्रिरुपांशु घर्मदुघमाह्वयतीड एह्यदित एहि सरस्वत्येहीति  15.9.३

प्रत्येत्य दोग्ध्रे निदाने इत्यादाय दक्षिणया द्वारोपनिष्क्रम्य त्रिरुच्चैरसावेह्यसावेहीति यथानामा भवति  15.9.४

 

उपयामगृहीतोऽस्यच्छिद्रं त्वाच्छिद्रेणाश्विभ्यां जुष्टं गृह्णा-

मीत्याश्विनमध्वर्युर्गृह्णाति  ।  एतेनैव सरस्वत्या इति सारस्वतं प्रतिप्रस्थाताग्नीध्रो वा  ।  इन्द्राय त्वेत्यैन्द्रं ब्रह्मा यजमानो वा  19.2.९

अश्विभ्यां सरस्वत्या इन्द्राय सुत्राम्णे सोमानां सुराम्णामनुब्रूहि  ।  अश्विभ्यां सरस्वत्या इन्द्राय सुत्राम्णे सोमानां सुराम्णां प्रेष्येति संप्रैषौ  ।  सोमान्सुराम्णः प्रस्थितान्प्रेष्येति वा  19.2.१८