पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(From Bhakta  to Maghaa )

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

HOME PAGE

Bhakta - Bhagamaalaa ( words like Bhakta / devotee, Bhakti / devotion, Bhaga, Bhagamaalaa etc.)

Bhagavata - Bhadra ( Bhagini / Bhaginee / sister, Bhageeratha, Bhajamaana, Bhanda, Bhadra etc.)

Bhadraka - Bhadraa (  Bhadrakaali / Bhadrakaalee, Bhadrasena, Bhadraa etc.)

Bhadraayu - Bharata ( Bhadraayu, Bhadraashva, Bhaya / fear, Bharata etc. )

Bharata - Bhava ( Bharadvaaja, Bharga, Bhalandana, Bhava etc. )

Bhavamaalini - Bhaandira (  Bhavaani, Bhasma / ash, Bhaagavata, Bhaandira etc. )

Bhaata - Bhaaradwaaja ( Bhaadrapada, Bhaanu, Bhaanumati, Bhaarata, Bhaarati, Bhaaradwaaja etc.)

Bhaarabhuuti - Bhaashya (  Bhaarabhuuti, Bhaargava, Bhaaryaa, Bhaava etc.)

Bhaasa - Bheema  ( Bhaasa, Bhaaskara / sun, Bhikshaa / begging, Bhilla, Bheema etc.)

Bheemanaada - Bheeshmaka (  Bheemaratha, Bheemaa, Bheeshma, Bheeshmaka etc.)

Bhukti - Bhuuta (  Bhuja, Bhuva, Bhuu, Bhuugola / geology, Bhuuta / past / Bhoota / matter etc.)

Bhuutaketu - Bhuumi ( Bhuuti, Bhuumaa, Bhuumi / earth etc.)

Bhuumimitra - Bhrigu  (  Bhuuri, Bhrigu etc. )

Bhrigukachchha - Bhairava ( Bhringa, Bherunda, Bhairava etc.)

Bhairavi - Bhojana  ( Bhairavi, Bhoga, Bhogavati, Bhoja, Bhojana / food etc.)

Bhojaa - Bhruushunda ( Bhautya, Bhauma, Bharamara, Bhraataa / brother etc. )

Ma - Magha  ( Makara, Makaranda, Makha, Magadha, Maghaa etc.)

 

 

 

 

 

 

 

Puraanic contexts of words like Bhaasa, Bhaaskara / sun, Bhikshaa / begging, Bhilla, Bheema etc. are given here.

Comment on Bheema

भास ब्रह्माण्ड ...२४२(वाली के सेनानायक प्रधान वानरों में से एक), ...४५५(भासी गरुड के पुत्रों की भास संज्ञा), वायु १००.१५/.३८.१५ (भासकृत् : सुतपा गण के २० देवों में से एक), विष्णु .२१.१६(भासी के भास पुत्रों का उल्लेख), योगवासिष्ठ .६५+ (विलास से संवाद), ..१३१(भास संसार का वर्णन), ..१३२(भास वर्णित स्वजन्म परम्परा), कथासरित् ..३७९ (सूर्यप्रभ - मन्त्री, पूर्व जन्म में वृषपर्वा नामक दानव), ..३३(भास का मर्दन से युद्ध), ..४७(प्रभास - पिता, भास का पूर्व जन्मों में कालनेमि, हिरण्यकशिपु तथा कपिञ्जल नाम से अवतीर्ण होना ), द्र. गतिभास, नेत्रभास bhaasa/ bhasa 

भासकर्ण वा.रामायण .४६.३५(रावण - सेनानी, प्रमदावन में हनुमान से युद्ध में मृत्यु), ..४१(सुमाली केतुमती - पुत्र ) bhaasakarna 

भासी ब्रह्माण्ड ...१३(रिष्टा की पुत्रियों में से एक), ...४४६(ताम्रा की कन्याओं में  एक), ...४४८(गरुत्मान् की पत्नियों में से एक), ...४५५(भासी - पुत्रों की भास संज्ञा), मत्स्य .३०(मारीच ताम्रा की कन्याओं में से एक, कुररों की माता), वायु ६९.४८/..४८(अरिष्टा की अप्सरा पुत्रियों में से एक), ६९.३२५/..३१७(ताम्रा की पुत्रियों में से एक, गरुत्मान् की भार्याओं में से एक, भासों, उलूकों, काक, कुक्कुटों, मयूरों आदि की माता), विष्णु .२१.१५(ताम्रा की सुताओं में से एक, भासों की माता ), द्र वंश ताम्रा bhaasee/ bhasi 

भासुर ब्रह्माण्ड ..३६.१०(तुषित संज्ञक १२ देवों में से एक, तुषिता क्रतु - पुत्र )

भास्कर कूर्म .४३.२१(कार्तिक मास में भास्कर सूर्य की रश्मियों की संख्या), देवीभागवत .२२.(शङ्खचूड - सेनानी विप्रचित्ति से युद्ध), पद्म .४०.९४(विश्वेदेवों  में से एक, धर्म विश्वा - पुत्र), ब्रह्मवैवर्त्त .१९.२५ (भास्कर से अधर की रक्षा की प्रार्थना), ब्रह्माण्ड ..१३.१२६(भास्कर की निरुक्ति, भास्कर के दिवसों के प्रविभागों की योनि होने का कथन), ..२१.(भास्कर के मण्डल के आपेक्षिक विस्तार का कथन), ...७९(मरुतों के द्वितीय स्कन्ध की भास्कर में स्थिति का उल्लेख), भविष्य .५७.१२(भास्कर हेतु कोविदार बलि का उल्लेख), .६१.२६(सोते समय भास्कर सूर्य के स्मरण का निर्देश), वायु ३१.३७(भास्कर शब्द की निरुक्ति), ५३.४१(भास्कर का वारितस्कर विशेषण), शिव ..३६.(भास्कर का शंखचूड - सेनानी विप्रचित्ति से युद्ध), स्कन्द ..४९+ (भास्कर का कमठ नामक बालक से जीवगत्यादि, शरीर लक्षण तथा कर्मफल विषयक प्रश्न पूछना, कमठ द्वारा सम्यक् उत्तर प्रदान से भास्कर की प्रसन्नता, जयादित्य नाम से अवस्थिति, कमठ को वर प्रदान, जयादित्य माहात्म्य का वर्णन), ..८२.३९(दक्ष यज्ञ विध्वंस के समय क्रुद्ध भद्रकाली द्वारा भास्कर के चरणों का ताडन), ..१२५.(रवि के अपर नाम भास्कर के कारण का प्रश्न, भास्कर तीर्थ का माहात्म्य), .७६(मुण्डीर, कालप्रिय तथा मूलस्थान नामक भास्करत्रितय तीर्थ का माहात्म्य, तीर्थ स्नान से कुष्ठ रोग से मुक्ति ), .२१२.१०(विश्वामित्र द्वारा स्वनिर्मित कुण्ड में भास्कर की स्थापना, भास्कर से वर प्राप्ति), ..१३.(द्वापर में सूर्य का नाम), लक्ष्मीनारायण .३३७.३९ (भास्कर का शङ्खचूड - सेनानी विप्रचित्ति से युद्ध), ..१०(राजा बदर के भास्कर नामक विमान का कथन ) bhaaskara/ bhaskara 

भिक्षा कूर्म १..२५(व्यास द्वारा वाराणसी में भिक्षा की अप्राप्ति पर वाराणसी को शाप देने की कथा), २.२९(भिक्षा की विधि), भागवत ११.१८.१८(संन्यासी को भिक्षा विषयक निर्देश), ११.१८.२४(संन्यासी को भिक्षा विषयक निर्देश), वायु १६.१४(योगी हेतु भिक्षा का नियम), स्कन्द ४.१.३१.१०२(विष्णु द्वारा शिव को मनोरथवती नामक भिक्षा देना, वाराणसी में भिक्षादान का महत्त्व), ५.१.३.११(शिव का विष्णु के समीप गमन, भिक्षा याचना, विष्णु द्वारा दक्षिण भुजा का समर्पण), ५.१.५१.३(शिव का भिक्षार्थ नागलोक में गमन, भिक्षा अप्राप्ति पर सर्वामृत प्राशन, नागों की स्तुति से प्रसन्न होकर अमृतकुण्ड की स्थापना), ५.३.१२६.१५(अयोनिप्रभव तीर्थ में जल रूप भिक्षा दान का महत्त्व), महाभारत आदि १५६.६(भीम द्वारा भिक्षा के आधे भाग का उपभोग आदि का कथन), लक्ष्मीनारायण ३.१७८(भिक्षायन भिक्षु द्वारा स्वपत्नी को कामना त्याग का उपदेश, कृष्ण द्वारा भिक्षा के विविध प्रकारों का वर्णन), कथासरित् १०.५.३१३(अजगर द्वारा ब्राह्मणी को दिव्य भिक्षा पात्र देने का वृत्तान्त ) bhikshaa

 

भिक्षु अग्नि १६१(भिक्षु/यति/संन्यासी के धर्म का निरूपण), गरुड १.१०३(भिक्षु के कर्तव्य / धर्म), पद्म ६.१०६.१४(कलहा - पति, कलहा के जन्मान्तरों का कथन), भागवत ६.५.३६(नारद द्वारा स्वभ्राताओं को भिक्षु मार्ग का प्रदर्शन करने के कारण दक्ष द्वारा नारद को शापन भवेद् भ्रमतः पदम्), ११.१८.४२(शान्ति और अहिंसा का भिक्षु के मुख्य धर्म के रूप में उल्लेख), वामन ५१.५१(शिव का भिक्षु रूप में पार्वती के समीप आगमन, वार्तालाप), वायु १६.१७(भिक्षु के अस्तेय, ब्रह्मचर्य आदि धर्मों का कथन), १०५.२५/२.४३.२३(भिक्षु द्वारा गया में पिण्ड दान के बदले दण्ड प्रदर्शन का विधान), विष्णु ३.९.२४(भिक्षु के चतुर्थ/वानप्रस्थ आश्रम के स्वरूप का वर्णन), शिव ३.३१.२४(शिव - अवतार भिक्षु द्वारा अनाथ बालक की रक्षा हेतु विप्र स्त्री को प्रेरणा, बालक की उत्पत्ति के वृत्तान्त का कथन), स्कन्द २.४.२४.११(भिक्षु - भार्या कलहा को राक्षसी योनि प्राप्ति, धर्मदत्त द्वारा कार्तिक पुण्य दान से मुक्ति), ५.२.३७.११(शिव - प्रेषित गणेश नामक शिव गण का भिक्षु रूप धारण कर महाकालवन में आगमन, लोक कष्ट निवारण के पश्चात् लिङ्ग रूप होकर शिवेश्वर नाम धारण), ५.३.२१२.२(शिव द्वारा भिक्षु रूप धारण कर एकशाल ग्राम में गमन, डिण्डिम रूप धारण), योगवासिष्ठ ६.१.६२(भिक्षु संसार का उदाहरण), ६.१.६६(भिक्षु संसृति का कथन), कथासरित् ७.४.३९(प्रपञ्चबुद्धि नामक भिक्षुक का वृत्तान्त), १२.८.४०(शान्तिशील नामक भिक्षु द्वारा राजा त्रिविक्रमसेन को प्रतिदिन एक फल प्रदान, राजा से सहायतार्थ याचना), १२.३२.१(त्रिविक्रमसेन द्वारा भिक्षु के वध का वृत्तान्त ) bhikshu

References on Bhikshaa

भिल्ल गणेश .८३.३७(शिव से पुत्र प्राप्ति हेतु पार्वती द्वारा कामुक भिल्ली का वेश धारण), नारद .५६.७४२(भिल्ल देश के कूर्म का पार्श्वमण्डल होने का उल्लेख), पद्म .१८.(नील पर्वतस्थ चतुर्भुज रूप भिल्लों द्वारा ब्राह्मण को चतुर्भुजत्व प्राप्ति का कथन), .२००.८७(निगमोद्बोधक तीर्थ में स्नान से भिल्ल सिंह की मुक्ति की कथा), .२२२.२८(कर्कट भिल्ल की भार्या जरा के चरित्र का कथन), ब्रह्म .९९.( भिल्ल तीर्थ का माहात्म्य : आदिकेश शिव द्वारा वेद ब्राह्मण की पूजा की अपेक्षा व्याध की भक्ति पर प्रसन्न होना), भविष्य ..२७(काष्ठ विक्रेता, सत्यनारायण व्रत कथा का प्रसंग), वामन ९०.२४(भिल्ली वन में विष्णु का महायोग नाम), शिव .२८(शिव द्वारा यति रूप धारण कर आहुक भिल्ल की आतिथ्य सेवा की परीक्षा, जन्मान्तर में भिल्ल भिल्ली का नल दमयन्ती बनना), .३९.२६(मूक दैत्य वधार्थ तथा अर्जुन की परीक्षा हेतु शिव अवतार), लक्ष्मीनारायण .८१.८+ (नन्दिभिल्ल नृप का सर्वमेध यज्ञ में दीक्षित नागविक्रम भूपति से युद्ध का वृत्तान्त, नन्दिभिल्ल की सेना का नाश), .८५.४७(नन्दिभिल्ल द्वारा युद्ध में मृत्यु से पूर्व कृष्ण की स्तुति, नन्दिभिल्ल की सती भार्या द्वारा सतीत्व आदि), कथासरित् ..१६८(राजा पृथ्वीरूप द्वारा भिल्ल सेनापति का वध), १०..१५१(ईर्ष्यालु व्यक्ति की दुष्टा स्त्री का भिल्ल के साथ पलायन, वास एवं व्यभिचार, ईर्ष्यालु द्वारा भिल्ल का वध), १८..(राजा, विन्ध्यदेश निवासी), १८..३८(विक्रमादित्य के कार्पटिक का अजगर होना, राजा द्वारा भिल्ल सेनापति एकाकिकेसरी से सहायतार्थ याचना, भिल्ल द्वारा बूटियों का रस नाक में डालने पर पुन: मनुष्य रूप की प्राप्ति ), द्र. गोभिल, भील bhilla 

भिषक् ब्रह्मवैवर्त्त .१६.१०(भास्कर से आरम्भ करके चिकित्सा/आयुर्वेद शास्त्र के रचयिताओं के नाम चिकित्सा शास्त्र का वर्णन), ब्रह्माण्ड ..७१.१४१(हृदिक के १० पुत्रों में से एक), वायु ९६.१३९/.३४.१३९(हृदिक के १० पुत्रों में से एक), कथासरित् १०..१४(मूर्ख रोगी भिषक् की कथा ), द्र. महाभिष, शतभिषक bhishak 

भीति द्र. कालभीति 

भीम अग्नि ९६.११(हेतुक, त्रिपुरघ्न आदि ८ क्षेत्रपालों में से एक), गणेश १.१९.५(चारुहासिनी - पति, पुत्र प्राप्ति हेतु तप, विश्वामित्र द्वारा पूर्व जन्म के वृत्तान्त का वर्णन), १.२७.१(राजा भीम द्वारा विश्वामित्र से गणेश के एकाक्षर महामन्त्र की प्राप्ति), १.४३.२(त्रिपुर व शिव के युद्ध में भीमकाय का पुष्पदन्त से युद्ध), २.२६.३(भीम व्याध द्वारा राक्षस के भय से वामन गणेश की शमी पत्रों द्वारा अनायास पूजा, मुक्त होना), २.२७.१(भीम के पूर्व जन्मों का वृत्तान्त : दुष्ट राजा साम्ब द्वारा गणेश पूजा का फल प्राप्त करना आदि), गरुड १.१२७(भीम द्वादशी व्रत की विधि, माघ शुक्ल एकादशी व्रत, वराह का शरीर में न्यास), ३.१६.६८(विरोचन वायु का अवतार), देवीभागवत २.७.७(भीम द्वारा वाग्बाणों से धृतराष्ट} का पीडन), पद्म १.६(महाभीम : हिरण्याक्ष - पुत्र), १.१३.११५(भीम/वृकोदर : वायु का अंश), १.२०.१००(भीम व्रत का माहात्म्य व संक्षिप्त विधि), १.२३.२१(भीम द्वादशी व्रत : भीम व कृष्ण का संवाद, कृष्ण का देह में न्यास), २.९७.११२(राजा सुबाहु के संदर्भ में क्षुधा व तृष्णा के भीम रूप भयानक होने का उल्लेख), ४.१४.१५(दुष्ट शूद्र भीम की ब्राह्मण सेवा से मुक्ति), ६.५१.१०(भीम द्वारा निर्जला एकादशी का चीर्णन, निर्जला एकादशी अनुष्ठान की विधि), ६.२२२.८३(भीम द्वारा निर्मित भीम कुण्ड का माहात्म्य), ६.२५२.२ (भीम का जरासंध से द्वन्द्व युद्ध, जरासंध का वध), ७.४.८७(भीमकेश नृप की भार्या केशिनी व बृहद्ध्वज राक्षस की मुक्ति की कथा), ब्रह्म १.११.११३(भीमसेन : द्वितीय ऋक्ष - पुत्र, प्रतीप - पिता), २.१०३.३४(भीमेश्वर शिव की उत्पत्ति के वर्णन के संदर्भ में विश्वरूप द्वारा भीम तनु का ध्यान करके अग्नि में आहुति, वृत्र की उत्पत्ति), ब्रह्माण्ड १.२.१०.१४(कुमार नीललोहित द्वारा ब्रह्मा से प्राप्त ८ नामों में षष्ठम्), १.२.१०.५०(रुद्र का नाम, शरीर में आकाश का रूप, भीम स्थिति के कर्तव्य), १.२.१०.८१(दिशा - पति, स्वर्ग - पिता), १.२.२३.३(कंस व भीम की सूर्य रथ में मधु - माधव मास में स्थिति का उल्लेख), १.२.३६.५७(वैकुण्ठ संज्ञक देवों में से एक), २.३.५.९४(मरुतों के तृतीय गण में से एक), २.३.७.३( मौनेय संज्ञक १६ देवगन्धर्वों में से एक), २.३.७.१३३(खशा व कश्यप के प्रधान राक्षस पुत्रों में से एक), २.३.७.२३५(वाली के सामन्त प्रधान वानरों में से एक), २.३.६६.२३ (अमावसु - पुत्र, काञ्चनप्रभ - पिता, पुरूरवा वंश), २.३.६८.२८(जरासन्ध के वध के पश्चात् भीम द्वारा जरासन्ध के दिव्य रथ को कृष्ण को देने का उल्लेख), ३.४.१२.५६(भीमकर्मा : भण्डासुर का मन्त्री), ३.४.३४.४१(१३वें आवरण में स्थित रुद्रों में से एक), भविष्य ३.३.१.२४(भीम का वीरण म्लेच्छ रूप में अवतरण), ३.३.१७.४२(षष्ठावर्त में बली का भीम से युद्ध), ३.३.२६.२० (कलियुग में भीम का तालन रूप में अवतरण), ३.३.३२.५३(भीम के तालन रूप में जन्म का उल्लेख), ४.७४(भीम द्वादशी व्रत की विधि व माहात्म्य : दमयन्ती - पिता भीम द्वारा पुलस्त्य से संसार से मुक्ति विषयक प्रश्न), भागवत ६.६.१७(भूत व सरूपा के ११ प्रधान रुद्र संज्ञक पुत्रों में से एक), ९.१५.३(विजय - पुत्र, काञ्चन - पिता, पुरूरवा वंश), ९.२२.२९(वृकोदर/भीम के श्रुतसेन - पिता होने का उल्लेख), १०.७९.२३(महाभारत युद्ध में बलराम द्वारा भीम व दुर्योधन के गदा युद्ध को रोकने का प्रयास, भीम में प्राणाधिक्य होने का उल्लेख), मत्स्य ६९.१२(भीम द्वादशी व्रत विधि, विष्णु व लक्ष्मी का न्यास, भीम  द्वारा व्रत का चीर्णन), १०१.५१(भीम व्रत), लिङ्ग २.२७.१७९(भीम व्यूह का वर्णन), वामन ५७.७०(अंशुमान द्वारा कुमार को प्रदत्त गण का नाम), ५८.५८(कार्तिकेय - गण भीम द्वारा शिला से असुर संहार), ६४.७८(भीमरथी नदी द्वारा कुमार को प्रदत्त गण), ९०.३२(शालवन में विष्णु का भीम नाम), वायु २७.१४(ब्रह्मा द्वारा कुमार नीललोहित को प्रदत्त नामों में से एक, आकाश स्थान), २७.४५(शरीर में वायु संचरणार्थ सुषिर स्थानों के रुद्र के भीम तनु होने का उल्लेख), २७.५४(भीम रुद्र के आकाश तनु, दिशा पत्नियां व स्वर्ग सुत होने का उल्लेख), ६७.१२६/२.६.१२६ (तृतीय गण? के मरुतों में से एक), ६९.१६५/२.८.१५९(खशा व कश्यप के प्रधान पुत्रों में से एक), ९९.१६२/२.३७.१५८(महावीर्य - पुत्र, उभक्षय - पिता, भरत/वितथ वंश), १०८.९१/२.४६.९४(भीम द्वारा वाम जानु का नमन कर गया में श्राद्ध करने का कथन), विष्णु ४.७.२(अमावसु - पुत्र, काञ्चन - पिता, पुरूरवा वंश), ४.१४.३५(पाण्डु - पत्नी कुन्ती का अनिल देवता से उत्पन्न पुत्र), ४.२०.४०(वही), ४.२०.४२(श्रुतसेन - पिता), शिव ३.५.३१(लाङ्गली भीम : २२वें द्वापर में शिव का अवतार), ३.४२.२७(डाकिनी क्षेत्र में भीमशंकर नामक ज्योतिर्लिङ्ग स्वरूप से शिवावतार), ४.२०(भीमेश्वर नामक षष्ठ ज्योतिर्लिङ्ग के माहात्म्य का निरूपण, भीमासुर को भस्मसात् करने से भीमेश्वर नाम धारण), ४.२०+ (कुम्भकर्ण व कर्कटी - पुत्र, ब्रह्मा से वर प्राप्ति, शिव द्वारा भस्म करना), स्कन्द १.२.२.१२(भीम द्वारा कुरूतापक राजा वीरवर्मा का वध), १.२.६४.७(भीम का स्वपौत्र सिद्धसेन या बर्बरीक से जल पान के संदर्भ में विवाद व युद्ध ; रुद्र द्वारा भीम की रक्षा), १.२.६६.९९(लङ्का के समीप के सर से मृदा आनयन उद्योग में भीम की असफलता की कथा, भीम के गर्व का खण्डन), २.१.१०.९०(भीम कुलाल या कुम्भकार द्वारा मृन्मय तुलसी पुष्प से शिव की पूजा, तोण्डमान नृप का आगमन, मुक्ति), ४.२.६९.११९(भीमेश्वर लिङ्ग का संक्षिप्त माहात्म्य), ४.२.७०.७२ (भीमचण्डी देवी का संक्षिप्त माहात्म्य), ५.१.२५.२(भीमेश्वर लिङ्ग का संक्षिप्त माहात्म्य), ५.३.७७(भीमेश्वर तीर्थ के माहात्म्य का कथन), ५.३.१९८.८५ (हिमाद्रि पर देवी की भीमादेवी नाम से स्थिति), ५.३.२३१.१९(भीमेश्वर नाम से तीन तीर्थों का उल्लेख), ६.१०९.२०(बदरी तीर्थ में शिव की भीमेश्वर नाम से स्थिति का उल्लेख), ६.१०९.१८(सप्तगोदावर तीर्थ में शिव की भीम नाम से स्थिति का उल्लेख), ७.१.१०.१०(भीम तीर्थ का वर्गीकरण वायु), ७.१.४०(श्वेतकेतु द्वारा स्थापित भीमेश्वर लिङ्ग का माहात्म्य ; भीम द्वारा लिङ्ग की पूजा), ७.३.३९.५७(दमयन्ती - पिता, पूर्व जन्म में सारमेय, सक्तु भक्षण से राजा), हरिवंश ३.५३.३०(धनेश्वर, केशी से युद्ध), लक्ष्मीनारायण १.४०१.१२८(भीम नामक कुलाल द्वारा मृदा से निर्मित तुलसी पुष्प श्रीहरि को अर्पित करने का कथन), १.५५०.५१(भीमनाथ तीर्थ के भीति निवारक होने का उल्लेख), कथासरित् ९.६.३३८(दमयन्ती - पिता, नल - श्वसुर भीम द्वारा नल के अन्वेषण का वृत्तान्त), १२.२.१९(भीमपराक्रम : मृगाङ्कदत्त के १० मन्त्रियों में से एक), १२.७.३०(भीमभट : शीलधर द्वारा शिवाराधन, वर प्राप्ति, अगले जन्म में भीमभट रूप में जन्म, मुनि से शाप प्राप्ति, शाप मुक्ति हेतु उपाय का कथन ) bheema/bhima

भीम-(१) कश्यप द्वारा मुनि के गर्भ से उत्पन्न एक देवगन्धर्व (आदि०६५ । ४३)।(२) धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों में से एक ( आदि० ६७ । ९८ )। यह भीमसेन द्वारा मारा गया (भीष्म० ६४ । ३६-३७) । (३) ये महाराज ईलिन के द्वारा रथन्तरी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। इनके चार भाई और थे---दुष्यन्त, शूर, प्रवसु और वसु(आदि० ९४ । १७-१८) (४) ये विदर्भदेश के राजा थे ( वन० ५३ । ५)। दशार्णनरेश सुदामा की पुत्री इनकी पत्नी थी (वन० ६९ । १४-१५)। महर्षि दमन की कृपा से इन्हें दम, दान्त और दमन नामक तीन पुत्र तथा दमयन्ती नाम्नी कन्या की प्राप्ति (वन० ५३ । ६-९)। इनके द्वारा दमयन्ती के स्वयंवर का आयोजन (वन० ५४ । ८-९)। इनके द्वारा नल के साथ दमयन्ती का विवाह किया जाना (वन० ५७ । ४०-४१)। सारथि वार्ष्णेय के द्वारा लाये गये राजा नल के बच्चों को अपने आश्रय में रखना (वन० ६० । २३-२४ )। दमयन्ती द्वारा इनके गुणों का वर्णन (वन० ६४ । ४४-४७)। इनका नल-दमयन्ती की खोज के लिये ब्राह्मणों को पुरस्कार की घोषणा करके चारों ओर भेजना (वन० ६८ । २-५) । महारानीकी प्रेरणा से राजा नल की खोज के लिये ब्राह्मणों को आज्ञा देकर भेजना (वन० ६९ । ३४)। इनके द्वारा अपने यहाँ आये हुए अयोध्यानरेश ऋतुपर्ण का स्वागत (वन० ७३ । २०)। प्रकट हुए राजा नल को पुत्र की भाँति अपनाना और आदर-सत्कार के साथ आश्वासन देना (वन० ७७ । ३-५)। एक महीने के पश्चात् सेना, रथ आदि के साथ राजा नल को विदा करना (वन० ७८ । १-२)। इनके द्वारा आदर-सत्कार के साथ राजा नलसहित दमयन्ती की विदाई (वन० ७९ । १-२)। (५) ये देवताओं के यज्ञ का विनाश करनेवाले पाञ्चजन्य द्वारा उत्पन्न पाँच विनायकों में हैं (वन. २२१ । ११)। (६) अंश द्वारा स्कन्द को दिये गये पाँच अनुचरों में से एक । शेष चारों के नाम-परिघ, वट, दहति और दहन (शल्य० ४५ । ३४-३५)। (७) एक प्राचीन नरेश । ये यम की सभा में रहकर सूर्यपुत्र यम की उपासना करते हैं, इस सभा में भीम नाम के सौ राजा हैं (सभा० ८ । २४)। इन्होंने तपस्या द्वारा प्रजाओं का कष्ट से उद्धार किया था (वन०३।११)। ये प्राचीनकाल में पृथ्वी के शासक थे; किंतु काल से पीड़ित

हो इसे छोड़कर चले गये (शान्ति० २२७ । ४९)।

भीमजानु-एक प्राचीन नरेश, जो यमसभा में रहकर सूर्यपुत्र यम की उपासना करते हैं (सभा० ८।२१)।

भीमबल (भूरिबल)-(१) धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों में से एक

(आदि० ६७ । ९८; आदि. ११६ । ७)। भीमसेन द्वारा इसका वध (शल्य० २६ । १४-१५) । (२) ये देवताओं के यज्ञ का विनाश करने वाले पाञ्चजन्य द्वारा

उत्पन्न पाँच विनायकों में हैं ( वन० २२१ । ११)।

भीमरथ-(१) धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों में से एक (आदि. ६७। १०३, आदि० ११६ । १२) । भीमसेन द्वारा इसका वध (भीष्म० ६४ । ३६-३७ ) । (२) कौरवपक्षीय योद्धा, जो द्रोणनिर्मित गरुडव्यूह के हृदयस्थान में खड़ा हुआ था (द्रोण० २० । १२)। इसने पाण्डवपक्षीय म्लेच्छराज शाल्व का वध किया था (द्रोण. २५। २६)। पहले जब युधिष्ठिर राजा थे, उस समय यह उनके सभाभवन में बैठा करता था ( सभा० ४ । २६)।

भीमरथी (भीमा)-दक्षिणभारत में स्थित एक नदी, जो समस्त पापभय का नाश करनेवाली है (वन०८८ । ३)। ( इसी के तट पर सुप्रसिद्ध तीर्थ पण्ढरपुर है।) यह भारतवर्ष की मुख्य नदियों में है। इसके जल को यहाँ के निवासी पीते हैं (भीष्म० ९ । २०)। इसी को भीमा' भी कहते हैं (भीष्म० ९ । २२)।

भीमवेग-धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों में से एक ( आदि० ६७ । ९८; आदि० ११६ । ७)। भीमशर-धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों से एक (आदि० ६७ ।९९)।

भीमसेन-(१) ये महाराज परीक्षित् के पुत्र तथा जनमेजय के भाई थे । इन्होंने कुरुक्षेत्र के यज्ञ में देवताओं की कुतिया सरमा के बेटे को पीटा था (आदि० ३ । १-२)। (२) कश्यपपत्नी मुनि के गर्भ से उत्पन्न एक देवगन्धर्व (आदि. ६५ । ४२ ) । ये अर्जुन के जन्मोत्सव में पधारे थे (आदि० १२२ । ५५)। (३) ये सोमवंशीय महाराज अविक्षित् के पौत्र तथा परीक्षित् के पुत्र थे । इनकी माता का नाम सुयशा था। इनके द्वारा केकय देश की राजकुमारी 'कुमारी' के गर्भ से प्रतिश्रवा का जन्म हुआ (आदि० ९४ । ५२-५५; आदि० ९५ । ४२-४३)। (४) ये महाराज पाण्डु के क्षेत्रज पुत्र हैं । वायुदेवके द्वारा कुन्ती के गर्भ से इनका जन्म हुआ था। इनके जन्मकाल में आकाशवाणी हुई कि यह कुमार समस्त बलवानों में श्रेष्ठ है (आदि० १२२ । १४-१५)। जन्म के दसवें दिन ये माता की गोद से एक शिलाखण्ड पर गिर पड़े और इनके शरीर की चोट से वह शिला चूर-चूर हो गयी (आदि० १२२ । १५ के बाद दाक्षिणात्य पाठ से १८ तक)। इनके जन्मकालीन ग्रहों की स्थिति (आदि. १२२ । १८ के बाद दाक्षिणात्य पाठ)। शतशृङ्गनिवासी ऋषियों द्वारा इनका नामकरण-संस्कार ( आदि० १२३ । १९-२०)। वसुदेव के पुरोहित काश्यप के द्वारा इनके उपनयनादि-संस्कार सम्पन्न हुए तथा इन्होंने राजर्षि शुक से गदायुद्ध की शिक्षा प्राप्त की (आदि० १२३।३१ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ३६९)। कृपाचार्य का इन (पाण्डवों) को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देना (आदि० १२९ । २३)। द्रोणाचार्य ने इन (पाण्डवों)को नाना प्रकार की मानव एवं दिव्य अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा दी (आदि० १३१ । ४, ९)। इनके द्वारा द्रौपदी के गर्भ से सुतसोम का जन्म ( आदि० ९५ । ७५ ) । इनके द्वारा काशिराज की पुत्री बलन्धरा के गर्भसे सर्वग' की उत्पत्ति ( आदि० ९५ । ७७ )। इनके द्वारा बालक्रीडाओं में धृतराष्ट्रपुत्रों की पराजय (आदि० १२७ । १६-२४)। दुर्योधन का इन्हें विष मिला हुआ भोजन कराना और मूर्च्छित होने पर लताओं से बाँधकर गङ्गाजल में फेंकना (आदि० १२७ । ४५--५४)। मूर्च्छितावस्था में इनका नागलोक में पहुँचना और वहाँ सर्पों के डंसने से खाये हुए विष के दूर होने पर अपना पराक्रम प्रकट करना (आदि. १२७ । ५५-५९)। नागलोक में इनका आर्यक नाग द्वारा आलिङ्गन और आर्यक की प्रेरणा से प्रसन्न हुए नागराज वासुकि की आज्ञा से इनके द्वारा आठ कुण्डों का दिव्य रसपान, जिससे इन्हें एक हजार हाथियों के बल की प्राप्ति हुई ( आदि. १२७ । ६३-७१)। आठवें दिन रस के पच जाने पर इनका जागना और नागों द्वारा इनका मङ्गलाचारपूर्वक स्वागत-सत्कार तथा दस हजार हाथियों के समान बलशाली होने का वरदान देकर इन्हें पुनः ऊपर पहुँचा देना ( आदि० १२८ । २०-२८)। इनका नागलोक से लौटकर माता को प्रणाम करना तथा भाइयों से मिलना (आदि० १२८ । २९-३०)। गदायुद्ध में इनका प्रवीण होना ( आदि० १३१ । ६१)। हस्तिनापुर की रङ्गभूमि में परीक्षा के समय दुर्योधन के साथ गदायुद्ध एवं अश्वत्थामा द्वारा उस युद्ध का निवारण ( आदि० १३४ । १-५)। इनके द्वारा कर्ण का तिरस्कार ( आदि० १३६ । ६-७)। कर्ण का पक्ष लेकर दुर्योधन का इन पर आक्षेप करना ( आदि० १३६ । १०-१६) । इनके द्वारा द्रुपद की गजसेना का संहार ( आदि० १३७ । ३१-३५ )। बलरामजी से इनकी गदायुद्धविषयक शिक्षा ( आदि. १३८ । ४)। इनके द्वारा लाक्षागृह का जलाया जाना (आदि० १४७ । १०)। सुरंग से निकल भागते समय इनके द्वारा मार्ग में थके हुए भाइयों एवं माता का परिवहन (आदि. १४७ । २०-२१)। धरती पर सोये हुए भाइयों एवं माता को देखकर इनका विषाद करना (आदि. १५० । २१-४१)। हिडिम्बवन में इनका जागरण करना (आदि० १५० । ४४-४५)। हिडिम्बा के साथ वार्तालाप करना ( आदि० १५१ । २३-३६)। हिडिम्बासुर के साथ इनका युद्ध ( आदि० १५२ । ३८-४५)। इनके द्वारा हिडिम्ब का वध ( आदि० १५३ । ३२)। हिडिम्बा को मारने के लिये इनका उद्यत होना तथा युधिष्ठिर का इन्हें रोकना (आदि० १५४ । १-२ )। हिडिम्बा को पुत्र दान करने के लिये इन्हें माता का आदेश प्राप्त होना (आदि० १५४ । १८ के बाद दाक्षिणात्य पाठ ) । हिडिम्बा के साथ इनकी शर्त ( आदि० १५४ । २० )। हिडिम्बा के साथ इनका विहार ( आदि० १५४ । २१-३०)। इनके द्वारा हिडिम्बा के गर्भ से घटोत्कच का जन्म (आदि. १५४।३१)। एकचक्रा में निवास करते समय पूरी भिक्षा का आधा भाग इनके उपभोग में आता था ( आदि० १५६ । ६) । ब्राह्मण का उपकार करनेके लिये इन्हें माता कुन्ती की आज्ञा (आदि० १६० । २०)। इनका भोजन-सामग्री लेकर बकासुर के पास जाना और स्वयं ही भोजन करते हुए उसे पुकारना (आदि० १६२ । ४-५) । बकासुर का आना और कुपित होकर इनके साथ युद्ध छेड़ना ( आदि० १६२ । ६-२८)। इनके द्वारा बकासुर का वध ( आदि० १६३ । १ )। इनके द्वारा मनुष्यों की हिंसा न करने की शर्तपर वक के परिवार को जीवनदान देना (आदि० १६३ । २-४ )। द्रौपदी के स्वयंवर में आये हुए राजाओं के साथ ब्राह्मणवेश में युद्ध करते समय इनका श्रीकृष्ण द्वारा बलरामजी को परिचय देना (आदि. १८८ । १४-२१) । स्वयंवर के अवसर पर शल्य के साथ इनका युद्ध और इनके द्वारा शल्य की पराजय (आदि. १८९ । २३-२९) । द्रौपदी के साथ इनका विधिपूर्वक विवाह (आदि० १९७ । १३)। मयासुर द्वारा इनको गदा की भेंट (सभा० ३ । १८२१)। जरासंधवध के विषय में इनकी युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण के साथ बातचीत ( सभा० १५ । ११-१३ के बाद दाक्षिणात्य पाठ)। जरासंधवध के लिये युधिष्ठिर और अर्जुन के साथ इनकी मगधयात्रा ( सभा० २० अध्याय)। जरासंध के साथ इनका मल्लयुद्ध एवं श्रीकृष्ण का जरासंध को चीरने के लिये इन्हें संकेत करना (सभा० २३ । १० से २४ । ६ तक) । इनका जरासंध को चीर डालना ( सभा० २४ । ७)। जरासंध के पुनः जीवित हो जाने पर श्रीकृष्ण द्वारा इन्हें पुनः संकेत की प्राप्ति और उस संकेत के अनुसार इनका जरासंध को चीरकर दो दिशाओं में फेंक देना (सभा० २४। ७ के बाद दाक्षिणात्य पाठ)। इनका पूर्वदिशा के प्रदेशों को जीतने के लिये प्रस्थान और विभिन्न देशों पर विजय पाना ( सभा० २९ अध्याय )। भीम का पूर्व दिशा के अनेक देशों और राजाओं को जीतकर भारी धनसम्पत्ति के साथ इन्द्रप्रस्थ लौटना ( सभा० ३० अध्याय)। प्रथम पूजा के अवसर पर भीष्म तथा श्रीकृष्ण की निन्दा करने पर शिशुपाल को मारने के लिये इनका उद्यत होना और भीष्मजी का इन्हें शान्त करना (सभा० ४२ अध्याय)। राजसूय-यज्ञ की समाप्ति पर ये भीष्म तथा धृतराष्ट्र को पहुँचाने गये थे ( सभा० ४५ । ४८)। दुष्ट कौरवों द्वारा भरी सभा में द्रौपदी के अपमान किये जाने पर इनका कुपित होकर युधिष्ठिर की भुजाओं को जलाने के लिये कहना (आदि० ६८।६)। इनके द्वारा दुःशासन की छाती फाड़कर उसके रक्त पीने की भीषण प्रतिज्ञा ( सभा० ६८ । ५२-५३)। इनके रोषपूर्ण उद्गार (सभा० ७० । १२-१७)। दुर्योधनकी जाँघ तोड़ देने के लिये इनकी प्रतिज्ञा (सभा० ७१। १४ )। इनका द्यूतसभा में समस्त शत्रुओं को मारने के लिये उद्यत होना (सभा० ७२ । १०-११)। दुःशासन के उपहास करने पर उसे मारने के लिये इनकी प्रतिज्ञा (सभा० ७७ । १६-१८) । दुःशासन का रक्त पीने तथा धृतराष्ट्र के सभी पुत्रों का वध करने के लिये इनकी प्रतिज्ञा ( सभा० ७७ । २०-२२)। दुर्योधन को मारने के लिये प्रतिज्ञा करना ( सभा० ७७ । २६-२८)। इनका अपनी भुजाओं की ओर देखते हुए वन-गमन करना (सभा० ८० । ४ ) । किर्मीर के साथ इनका युद्ध तथा इनके द्वारा उसका वध (वन० ११ । २४-६७) । इनका पुरुषार्थ की प्रशंसा करते हुए युधिष्ठिर से युद्ध छेड़ने के लिये अनुरोध (वन० ३३ अध्याय)। इनका युधिष्ठिर को युद्ध करने के लिये उत्साहित करना (वन० ३५ अध्याय)। इनकी अर्जुन के लिये चिन्ता (वन० ८० । १७-२१)। इनका गन्धमादन पर्वत पर चढ़ने का उत्साह प्रकट करना ( वन० १४०। ९-१७) । गन्धमादन की यात्रा में इनके द्वारा घटोत्कच का स्मरण किया जाना (वन० १४४ । २५)। इनका सौगन्धिक पुष्प के लाने के लिये प्रस्थान करना ( वन० १४६ । ९)। कदलीवन में इनकी हनुमान् जी से भेंट ( वन० १४६ । ८६)। इनका हनुमान् जी के साथ संवाद (वन० अध्याय १४७ से १५० तक)। इन्हें हनुमान् जी का आश्वासन (वन० १५१ । १६-१९)। भीमसेन का सौगन्धिक वन में पहुँचना (वन० १५२ अध्याय)। इनका सौगन्धिक सरोवर के पास पहुँचना (वन० १५३ । १०)। इनका क्रोधवश नामक राक्षसों के साथ युद्ध और उन्हें पराजित करके सौगन्धिक पुष्प तोड़ना (वन० १५४ । १८-२३)। जटासुर के साथ इनका युद्ध तथा इनके द्वारा उसका वध (वन० १५७ । ५६-७०)। हिमालयके शिखर पर यक्षों और राक्षसों के साथ इनका युद्ध तथा इनके द्वारा राक्षसराज मणिमान् का वध (वन० १६० । ४९-७७ ) । इनका गन्धमादन से प्रस्थान करने के लिये युधिष्ठिर से वार्तालाप (वन० १७६ । ७१६)। अजगर द्वारा इनका पकड़ा जाना ( वन० १७८ । २८)। अजगर द्वारा पकड़े जाने पर उससे संवाद रूप में इनका विलाप करना (वन० १७९ । २५-- ३८ )। अजगररूपधारी नहुष के चंगुल से इनका छुटकारा पाना (वन० १८१ । ४३)। चित्रसेन द्वारा दुर्योधन के पकड़े जाने पर इनकी कटु-उक्ति (वन०२४२ । १५-२१)। इनके द्वारा कोटिकास्य का वध ( वन० २७१ । २६)। जयद्रथ को पकड़ उसके बाल काटकर पाँच चोटियाँ रखना और महाराज युधिष्ठिर का दास घोषित करना ( वन० २७२ । ३-११)। द्वैतवन में जल लाने के लिये जाना और सरोवर पर मूञ्छित होना (वन० ३१२ । ३३--४०)। अज्ञातवास के लिये चिन्तित हुए युधिष्ठिर को उत्साहित करना (वन० ३१५ । २४-२६)। विराटनगर में बल्लव नाम से रहने की बात बताना (विराट० २।)। राजा विराट से अपने यहाँ रखने के लिये प्रार्थना करना (विराट० ८ । ७)। जीमूत नामक मल्ल के साथ कुश्ती लड़ना और उसका वध करना (विराट० १३ । २४-३६ )। द्रौपदी से रात में पाकशाला में आने का कारण पूछना (विराट ० १७ । १७-२१) । प्राचीन पतिव्रताओं के उदाहरण द्वारा द्रौपदी को समझाना (विराट० २१ । --१७ के बाद तक)। कीचक को मारने के लिये द्रौपदी को विश्वास दिलाकर नृत्यशाला में प्रवेश करना (विराट० २२ । ३८)। कीचक के साथ इनका युद्ध और उसका वध करना (विराट ० २२ । ५२--८२)। इनके द्वारा एक सौ पाँच उपकीचकों का वध और द्रौपदी को बन्धनमुक्त करना (विराट० २३ । २७-२८) । युधिष्ठिर के आदेश से सुशर्मा को जीते-जी पकड़ लेना (विराट० ३३ । ४८) । युधिष्ठिरके आदेश से सुशर्मा को छोड़ना और उसे विराट का दास घोषित करना (विराट ० ३३ । ५९ )। संजय द्वारा इनकी वीरता का वर्णन ( उद्योग० ५० । १९-.-२५ )। श्रीकृष्ण से इनका शान्तिविषयक प्रस्ताव करना ( उद्योग० ७४ अध्याय)। अपने बल का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण को उत्तर देना (उद्योग० ७६ अध्याय)। शिखण्डी को प्रधान सेनापति बनाने का प्रस्ताव करना (उद्योग० १५१ । २९-३२)। उलूक से दुर्योधन के संदेश का उत्तर देना ( उद्योग० १६२ । २०-२९)। उलूक से दुर्योधन के संदेश का उत्तर देना ( उद्योग० १६३ । ३२--३६ )। कवच उतारकर पैदल ही कौरव-सेना की ओर जाते हुए युधिष्ठिर से उसका कारण पूछना (भीष्म० ४३ । १७)। इनकी विकट गर्जना का भयंकर रूप (भीष्म० ४४ । ८-१३)। प्रथम दिन के युद्धारम्भ में दुर्योधन के साथ इनका द्वन्द्व युद्ध (भीष्म० ४५ । १९-२०) । कलिंगों के साथ युद्ध करते समय इनके द्वारा शक्रदेव का वध (भीष्म० ५४ । २५) । इनके द्वारा भानुमान् का वध ( भीष्म० ५४ । ३९)। कलिंगराज श्रुतायु के चक्ररक्षक सत्यदेव और सत्य का इनके द्वारा वध ( भीष्म० ५४ । ७६ )। इनके द्वारा केतुमान् का वध (भीष्म० ५४ । ७७)। गजसेना का संहार करके रक्तनदी का निर्माण करना (भीष्म० ५४ । १०३ ) । इनके द्वारा दुर्योधन की पराजय (भीष्म० ५८ । १६---१९)। इनके द्वारा दुर्योधन की गजसेना का संहार ( भीष्म० ६२ । ४९-६५)। इनका अद्भुत पराक्रम और भीष्म के साथ युद्ध (भीष्म० ६३ । १-२६) । धृतराष्ट्रपुत्रों के साथ इनका युद्ध और इनके द्वारा सेनापति, जलसंध, सुषेण, उग्र, वीरबाहु, भीम, भीमरथ और सुलोचन-इन आठ धृतराष्ट्र पुत्रों का वध (भीष्म० ६४ । ३२-३८) । इनका घमासान युद्ध (भीष्म० ७० अध्याय) । भीष्म के साथ इनका घोर युद्ध ( भीष्म० ७२ । २१-२५) । दुर्योधन के साथ इनका युद्ध (भीष्म० ७३ । १७--२३)। धृतराष्ट्र-पुत्रों पर आक्रमण करके घोर पराक्रम प्रकट करना (भीष्म० ७७ । ६--३६)। इनका दुर्योधन को पराजित करना (भीष्म० ७९ । ११-१६)। इनके द्वारा कृतवर्मा की पराजय (भीष्म० ८२ । ६०-६१)। इनका अद्भुत पुरुषार्थ ( भीष्म० ८५। ३२--४० )। भीष्म के सारथि को मारकर उन्हें युद्ध-मैदान से विलग कर देना ( भीष्म० ८८ । १२ )। इनके द्वारा धृतराष्ट्र के आठ पुत्रों का वध ( भीष्म० ८८ । १३-२९ )। इनके द्वारा गजसेना का संहार (भीष्म० ८९ । २६--३१) । इनके प्रहार से द्रोणाचार्य का मूर्च्छित होना (भीष्म० ९४ । १८-१९)। इनके द्वारा धृतराष्ट्र के नौ पुत्रों का वध ( भीष्म० ९६ । २३-२७)। इनके द्वारा गजसेना का संहार (भीष्म. १०२ । ३१-३९) । इनके द्वारा बाह्लीक की पराजय ( भीष्म० १०४ । १८-२७)। भूरिश्रवा के साथ द्वन्द्व युद्ध करना (भीष्म० ११० । १०-११; भीष्म० १११ । ४४--४९) । इनका दस प्रमुख महारथियों के साथ युद्ध करना और अद्भुत पराक्रम दिखाना (भीष्म० अध्याय ११३ से ११४ तक)। इनके द्वारा गजसेना का संहार ( भीष्म० ११६ । ३७-३९ )। धृतराष्ट्र द्वारा इनकी वीरता का वर्णन (द्रोण० १० । १३-१४)। विविंशति के साथ इनका युद्ध (द्रोण० १४ । २७-३०)। शल्य के साथ गदायुद्ध में उनको पराजित करना ( द्रोण० १५ । ८-३२)। इनके रथ के घोड़ों का वर्णन (द्रोण० २३ । ३)। दुर्मर्षणके साथ इनका युद्ध (द्रोण० २५ । ५-७)। इनके द्वारा म्लेच्छजातीय राजा अङ्ग का वध (द्रोण० २६ । १७ ।। भगदत्त और उनके गजराज के साथ युद्ध में पराजित होकर भागना ( द्रोण० २६ । १९-२९ ) । इनके द्वारा कर्ण पर धावा करना और उसके पंद्रह योद्धाओं का एक साथ वध कर देना (द्रोण० ३२ । ६३-६४ )। चक्रव्यूह में साथ चलने के लिये अभिमन्यु को आश्वासन (द्रोण० ३५ । २२-२३) । अर्जुन द्वारा की गयी जयद्रथ-वध की प्रतिज्ञा का अनुमोदन करना (द्रोण० ७३ । ५३ के बाद दाक्षिणात्य पाठ)। चित्रसेन, विविंशति और विकर्ण के साथ इनका युद्ध ( द्रोण० ९६ । ३१ )। अलम्बुष के साय इनका युद्ध (द्रोण० १०६ । १६१७ ) । इनके द्वारा अलम्बुष की पराजय (द्रोण. १०८ । ४२ ) । सात्यकि के साथ अर्जुन का समाचार लाने के लिये जाते समय सात्यकि के कहने से युधिष्ठिर की रक्षा के लिये लौट आना (द्रोण० ११२ । ७०७६)। कृतवर्मा के साथ इनका युद्ध (द्रोण० ११४ । ६७-८०) । घबराये हुए युधिष्ठिर को सान्त्वना देना (द्रोण० १२६ । ३२-३४) । धृष्टद्युम्न को युधिष्ठिर की रक्षा का भार सौंपना (द्रोण० १२७ । ४-९ )। युधिष्ठिर की आज्ञा से अर्जुन के पास जाने के लिये प्रस्थान करना (द्रोण. १२७ । २९)। इनके द्वारा द्रोणाचार्य की पराजय (द्रोण० १२७ । ४२-५४)। इनके द्वारा कुण्डभेदी, सुषेण, दीर्घलोचन, बृन्दारक, अभय, रौद्रकर्मा, दुर्विमोचन, विन्द, अनुविन्द, सुवर्मा और सुदर्शन का वध (द्रोण० १२७ । ६०-६७ )। इनके द्वारा रथसहित द्रोणाचार्य का आठ बार फेंका जाना (द्रोण० १२८ । १८-२१ ) । श्रीकृष्ण और अर्जुन के पास पहुँचकर युधिष्ठिर को सूचना देने के लिये सिंहनाद करना (द्रोण० १२८ ।  ३२ )। कर्ण के साथ इनका युद्ध और उसे पराजित करना ( द्रोण० १२९ अध्याय )। इनके द्वारा दुःशला का वध (द्रोण. १२९ । ३९ के बाद)। कर्णके साथ युद्ध और उसे परास्त करना ( द्रोण० १३१ अध्याय )। कर्णके साथ घोर युद्ध (द्रोण० अध्याय १३२ से १३३ तक)। इनके द्वारा धृतराष्ट्रपुत्र दुर्जय का वध ( द्रोण० १३३ । ४१-४२ )। कर्ण के साथ युद्ध और इनको परास्त करना (द्रोण० १३४ अध्याय)। इनके द्वारा धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्मुख का वध (द्रोण० १३४ । २०-२९)। इनके द्वारा दुर्मर्षण, दुःसह, दुर्मद, दुर्धर ( दुराधार ) और जय का वध (द्रोण० १३५ । ३०-३६ )। इनके द्वारा कर्ण की पराजय (द्रोण० १३६ । १७) । इनके द्वारा चित्र, उपचित्र, चित्राक्ष, चारुचित्र, शरासन, चित्रायुध और चित्रवर्मा का वध ( द्रोण. १३६ । २०-२२) । कर्ण के साथ इनका घोर युद्ध (द्रोण० १३७ अध्याय) । इनके द्वारा शत्रुंजय, शत्रुसह, चित्र (चित्रबाण), चित्रायुध (अग्रायुध ), दृढ़ (दृढ़वर्मा ), चित्रसेन ( उग्रसेन ) और विकर्ण का वध ( द्रोण. । १३७ । २९-३०)। कर्ण के साथ इनका भयंकर युद्ध (द्रोण० १३८ अध्याय)। कर्णके साथ इनका भयंकर युद्ध और उसे परास्त करना (द्रोण० १३९ । ९)। इनके द्वारा कर्ण के बहुत-से धनुषों का काटा जाना (द्रोण. १३९ । १९-२२)। अस्त्रहीन होने पर कर्ण को पकड़ने के लिये इनका उसके रथ पर चढ़ जाना (द्रोण० १३९ । ७४-७५ )। कर्ण के प्रहार से इनका मूर्च्छित होना (द्रोण० १३९ । ९१)। अर्जुन से कर्ण को मारने के लिये कहना (द्रोण० १४८ ।३-६)। इनके द्वारा घूँसे और थप्पड़ से कलिंगराजकुमार का वध (द्रोण० १५५ । २४)। इनके द्वारा घूँसे और थप्पड़ से ध्रुव का वध (द्रोण० १५५ । २७)। इनके द्वारा घूँसे और थप्पड़ से जयरात का वध (द्रोण० १५५ । २८ )। इनके द्वारा घूँसे और थप्पड़ से दुर्मद (दुर्धर्ष) और दुष्कर्ण का वध ( द्रोण० १५५ । ४० )। इनके परिघ के प्रहार से सोमदत्त का मूर्च्छित होना ( द्रोण. १५७ । १०-११)। इनके द्वारा बाह्लीक का वध (द्रोण० १५७ । ११-१५)। इनके द्वारा नागदत्त, दृढरथ ( दृढाश्व ), महाबाहु, अयोभुज ( अयोबाहु), दृढ ( दृढक्षत्र ), सुहस्त, विरजा, प्रमाथी, उग्र (उग्रश्रवा ) और अनुयायी ( अग्रयायी ) का वध (द्रोण० १५७ । १६-१९)। इनके द्वारा शतचन्द्र का वध (द्रोण० १५७ । २३ )। इनके द्वारा शकुनि के भाई गवाक्ष, शरभ, विभु, सुभग और भानुदत्त का वध (द्रोण० १५७ । २३-२६) । इनका द्रोणाचार्य के साथ युद्ध करते समय कौरवसेना को खदेड़ना (द्रोण० १६१ अध्याय )। दुर्योधन के साथ इनका युद्ध और उसे पराजित करना (द्रोण १६६ । ४३-५८ )। अलायुधके साथ इनका घोर संग्राम ( द्रोण १७७ अध्याय )। इनके द्वारा अर्जुन को प्रोत्साहन-प्रदान (द्रोण० १८६ । ९-११)। धृष्टद्युम्न को उपालम्म देना (द्रोण. १८६ । ५१-५४)। कर्ण के साथ युद्ध में उससे पराजित होना (द्रोण० १८८ । १०-२२)। कर्ण के साथ इनका युद्ध (द्रोण. १८९। ५०-५५) । अश्वत्थामा नामक हाथी को मारकर द्रोणाचार्य को अश्वत्थामा के मारे जाने की झूठी खबर सुनाना (द्रोण. १९० । १५-१६)। द्रोणाचार्य को उपालम्भ देते हुए अश्वत्थामा की मृत्यु बताना (द्रोण० १९२ ॥३७-४२)। अर्जुन से अपना वीरोचित उद्गार प्रकट करना ( द्रोण० १९७ । ३-२२)। धृष्टद्युम्न से वाग्बाणों द्वारा लड़ते हुए सात्यकि को पकड़कर शान्त करना ( द्रोण० १९८ । ५०-५२ )। इनका वीरोचित उद्गार और नारायणास्त्र के विरुद्ध संग्राम करना ( द्रोण० १९९ । ४५-६३)। अश्वत्थामा के साथ इनका घोर युद्ध और सारथि के मारे जाने पर युद्ध से हट जाना (द्रोण० २००। ८७१२८)। इनके द्वारा कुलूतनरेश क्षेमधूर्ति का वध (कर्ण० १२ । २५-४४) । अश्वत्थामा के साथ इनका घोर युद्ध और उसके प्रहार से मूर्च्छित होना ( कर्ण० १५ अध्याय ) । इनके द्वारा कर्ण-पुत्र भानुसेन का वध ( कर्ण० ४८ । २७ ) । कर्ण को पराजित करके उसकी जीभ काटने को उद्यत होना  (कर्ण० ५० । ४७ के बाद तक)। कर्ण के साथ इनका घोर युद्ध और गजसेना, रथसेना तथा घुड़सवारों का वध ( कर्ण० ५१ अध्याय)। इनके द्वारा विवित्सु, विकट, सम, क्राथ (क्रथन), नन्द और उपनन्द का वध (कर्ण० ५१ । १२-१९)। इनके द्वारा कौरवसेना का महान् संहार (कर्ण० ५६ । ७०-८१)। इनके द्वारा दुर्योधन की पराजय और गजसेना का संहार ( कर्ण० ६१ । ५३, ६२-७४) । युद्ध का सारा भार अपने ऊपर लेकर अर्जुन को युधिष्ठिर के पास भेजना ( कर्ण. ६५ । १०)। अपने सारथि विशोक के साथ इनका वार्तालाप ( कर्ण० ७६ अध्याय)। इनके द्वारा कौरवसेना का भीषण संहार और शकुनि की पराजय ( कर्ण० ७७ । २४-७०; कर्ण० ८१।२४-३५)। दुःशासन के साथ इनका घोर युद्ध (कर्ण० ८२ । ३३ से कर्ण. ८३ । १० तक)। दुःशासन का वध करके उसका रक्त पान करना (कर्ण० ८३ । २८-२९) । इनके द्वारा धृतराष्ट्र के दस पुत्रों ( निषङ्गी, कवची, पाशी, दण्डधार, धनुर्ग्रह, अलोलुप, शल, संध ( सत्यसंध ), वातवेग और सुवर्चा ) का वध ( कर्ण० ८४ । २-६)। कर्णवध के लिये अर्जुन को प्रोत्साहन देना (कर्ण० ८९ । ३७-४२)। इनके द्वारा पचीस हजार पैदल सेना का वध(कर्ण० ९३।२८)। इनके द्वारा कृतवर्मा की पराजय ( शल्य० ११ । ४५-४७)। इनका शल्य को पराजित करना ( शल्य० ११। ६१-६२ ) । शल्यके साथ इनका गदायुद्ध (शल्य० १२ । १२-२७)। शल्यके साथ इनका घोर युद्ध (शल्य० १३ अध्याय, शल्य० १५ । १६-२७)। इनके द्वारा दुर्योधन की पराजय (शल्य० १६ । ४२-४४)। इनके द्वारा शल्य के सारथि और घोड़ों का वध (शल्य. १७ । २७)। इनके द्वारा इक्कीस हजार पैदल सेना का वध (शल्य. १९ । ४९-५०)। इनके द्वारा गजसेना का संहार ( शल्य० २५ । ३०-३६ )। इनके द्वारा धृतराष्ट्र के ग्यारह पुत्रों ( दुर्मर्षण, श्रुतान्त (चित्राङ्ग), जैत्र, भूरिबल ( भीमबल), रवि, जयत्सेन, सुजात, दुर्विषह (दुर्विषाह), दुर्विमोचन, दुष्प्रधर्ष (दुष्प्रधर्षण), श्रुतर्वा का वध(शल्य० २६ । ४-३२)। धृतराष्ट्रपुत्र सुदर्शन का इनके द्वारा वध (शल्य० २७ । ४९-५०)। गदायुद्ध के प्रारम्भ में दुर्योधन को चेतावनी देना (शल्य० ३३ । ४३-५१)। इनका युधिष्ठिर से अपना उत्साह प्रकट करना (शल्य० ५६ । १६-२७)। दुर्योधन को चेतावनी देना (शल्य० ५६ । २९-३६ ) । दुर्योधन के साथ भयंकर गदायुद्ध (शल्य० ५७ अध्याय)। गदाप्रहार से दुर्योधन की जाँघ तोड़ देना (शल्य० ५८ । ४७)। इनके द्वारा दुर्योधन का तिरस्कार करके उसके मस्तक को पैर से ठुकराना  (शल्य० ५९ । ४-१२) । युधिष्ठिर के साथ विजयसूचक वार्तालाप करना ( शल्य० ६०। ४३-४६)। दुर्योधन को गिराने के पश्चात् पाण्डवसैनिकों द्वारा इनकी प्रशंसा (शल्य० ६१ । ७--१६ ) । अश्वत्थामा को मारने के लिये इनका प्रस्थान करना (सौप्तिक० ११। २८-३८)। गङ्गातट पर व्यासजी के पास बैठे हुए अश्वत्थामा को ललकारना (सौप्तिक० १३ । १६-१७)। अश्वत्थामा की मणि द्रौपदी को देकर उसे शान्त करना ( सौप्तिक० १६ । २६-३३)। अपनी सफाई देते हुए गान्धारी से क्षमा माँगना (स्त्री० १५ । २-११, १५-२० ) । संन्यास का विरोध करके कर्तव्यपालन पर जोर देते हुए युधिष्ठिर को समझाना ( शान्ति० १० अध्याय)। भीमसेन का भुक्त दुःखों की स्मृति कराते हुए मोह छोड़कर मन को काबू में करके राज्यशासन और यज्ञ के लिये युधिष्ठिर को प्रेरित करना (शान्ति० १६ अध्याय)। युधिष्ठिर द्वारा युवराजपद पर इनकी नियुक्ति ( शान्ति० ४१ । ९)। युधिष्ठिर द्वारा इन्हें दुर्योधन का महल रहने के लिये दिया गया (शान्ति. ४४। ६-७)। युधिष्ठिर के पूछने पर भीमसेन का त्रिवर्ग में काम की प्रधानता बताना (शान्ति० १६७ । २९-४०)। युधिष्ठिर के पूछने पर शंकरजी की आराधना द्वारा मरुत्त के छोड़े हुए धन को लाने की ही सलाह देना ( आश्व० ६३ । ११-१५ के बाद दाक्षिणात्य पाठ) । व्यासजी की आज्ञा से राज्य और नगर की रक्षा के लिये नकुलसहित भीमसेन की नियुक्ति (आश्व० ७२ । १९) । युधिष्ठिर की आज्ञा से भीमसेन का ब्राह्मणों के साथ जाकर यज्ञभूमि को नपवाना और वहाँ यज्ञमण्डप, सैकड़ों निवासस्थान तथा ब्राह्मणों के ठहरने के लिये उत्तम भवनों का शिल्पशास्त्र के अनुसार निर्माण कराना, साथ ही राजाओं को निमन्त्रित करने के लिये दूत भेजना ( आश्व० ८५। ७-१७)। युधिष्ठिर का भीमसेन को समागत राजाओं की पूजा करने का आदेश (आश्व० ८६ । १-३)। बभ्रुवाहन का इनके चरणों में प्रणाम करना और भीमसेन का उसे सत्कारपूर्वक प्रचुर धन देना ( आश्व० ८८ । ६-११)। भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारका जाते समय भीमसेन का उनके रथ पर चढ़कर उनके ऊपर छत्र लगाना (आश्व० ९२ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ६३८२)। भीमसेन का राजा धृतराष्ट्र के प्रति अमर्ष और दुर्भाव, अपने कृतज्ञ पुरुषों द्वारा धृतराष्ट्र की आज्ञा को भंग कराना, उन्हें सुनाकर दुर्योधन और दुःशासन आदि का दमन करनेवाली अपनी चन्दनचर्चित भुजाओं के बल की प्रशंसा करना तथा धृतराष्ट्र और गान्धारी के मन में उद्वेग पैदा करना (आश्रम ३। ३-१३)। धृतराष्ट्र के द्वारा श्राद्ध के लिये धन माँगे जाने पर भीमसेन द्वारा विरोध (आश्रम० ११ । ७-२४)। अर्जुनका भीमसेन को समझाना ( आश्रम० १२ । १-२)। वन में जाते समय कुन्ती का युधिष्ठिर को भीमसेन आदि के साथ संतोषजनक बर्ताव करने का आदेश देना ( आश्रम १६ । १५)। भीमसेन का गजराजों की सेना के साथ गजारूढ़ हो धृतराष्ट्र और कुन्ती आदि से मिलने के लिये भाइयोंसहित वन को जाना ( आश्रम० २३ । ९)। भीमसेन आदि को आया देख कुन्ती का उतावली के साथ आगे बढ़ना ( आश्रम. २४ । ११)। संजय का ऋषियों से भीमसेन और उनकी पत्नी का परिचय देना (आश्रम० २५। ६,१२)। भीमसेन का अपने भाइयों से महाप्रस्थान का निश्चय करके जाने के लिये अपने आभूषण उतारना और उनके साथ महाप्रस्थान करना ( महाप्रस्थान० १ । २०-२५)। मार्ग में द्रौपदी, सहदेव, नकुल और अर्जुन के क्रमशः गिरने पर इनका युधिष्ठिर से कारण पूछनाः फिर इनका स्वयं भी गिरना और युधिष्ठिर से अपने पतन का कारण पूछना (महाप्रस्थान. २ अध्याय )। स्वर्ग में इनका मरुद्गणों से घिरकर वायुदेव के पास विराजमान दिखायी देना (स्वर्गा. ४ । ७-८)।

Comments on Bheema