पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(From Bhakta  to Maghaa )

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

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Bhakta - Bhagamaalaa ( words like Bhakta / devotee, Bhakti / devotion, Bhaga, Bhagamaalaa etc.)

Bhagavata - Bhadra ( Bhagini / Bhaginee / sister, Bhageeratha, Bhajamaana, Bhanda, Bhadra etc.)

Bhadraka - Bhadraa (  Bhadrakaali / Bhadrakaalee, Bhadrasena, Bhadraa etc.)

Bhadraayu - Bharata ( Bhadraayu, Bhadraashva, Bhaya / fear, Bharata etc. )

Bharata - Bhava ( Bharadvaaja, Bharga, Bhalandana, Bhava etc. )

Bhavamaalini - Bhaandira (  Bhavaani, Bhasma / ash, Bhaagavata, Bhaandira etc. )

Bhaata - Bhaaradwaaja ( Bhaadrapada, Bhaanu, Bhaanumati, Bhaarata, Bhaarati, Bhaaradwaaja etc.)

Bhaarabhuuti - Bhaashya (  Bhaarabhuuti, Bhaargava, Bhaaryaa, Bhaava etc.)

Bhaasa - Bheema  ( Bhaasa, Bhaaskara / sun, Bhikshaa / begging, Bhilla, Bheema etc.)

Bheemanaada - Bheeshmaka (  Bheemaratha, Bheemaa, Bheeshma, Bheeshmaka etc.)

Bhukti - Bhuuta (  Bhuja, Bhuva, Bhuu, Bhuugola / geology, Bhuuta / past / Bhoota / matter etc.)

Bhuutaketu - Bhuumi ( Bhuuti, Bhuumaa, Bhuumi / earth etc.)

Bhuumimitra - Bhrigu  (  Bhuuri, Bhrigu etc. )

Bhrigukachchha - Bhairava ( Bhringa, Bherunda, Bhairava etc.)

Bhairavi - Bhojana  ( Bhairavi, Bhoga, Bhogavati, Bhoja, Bhojana / food etc.)

Bhojaa - Bhruushunda ( Bhautya, Bhauma, Bharamara, Bhraataa / brother etc. )

Ma - Magha  ( Makara, Makaranda, Makha, Magadha, Maghaa etc.)

 

 

 

 

 

 

 

Puraanic contexts of words like  Bhuja, Bhuva, Bhuu, Bhuugola / geology, Bhuuta / past etc. are given here.

भुक्ति नारद .६६.९४(सत्य विष्णु की शक्ति भुक्ति का उल्लेख), लक्ष्मीनारायण .३०७.१५(धर्म भक्ति की कन्या द्वय प्रेयसी श्रेयसी का भुक्ति मुक्ति नामकरण, भुक्ति मुक्ति द्वारा कृष्ण की प्राप्ति का वृत्तान्त ) bhukti 

भुज गणेश ..१८(युगों के अनुसार गणेश की १०, , भुजाओं का कथन), गरुड .३०.५७/.४०.५७(मृतक की भुजाओं में ऋद्धि - वृद्धि देने का उल्लेख), पद्म .४७.९१(क्षुधार्त गरुड द्वारा श्रीहरि की बाहु पर स्थित होकर गज कच्छप का भक्षण, क्षुधा शान्ति हेतु भुजा के मांस का भक्षण), ब्रह्मवैवर्त्त ..८५(कृष्ण के वैकुण्ठ में चतुर्भुज गोलोक में द्विभुज होने का उल्लेख), भविष्य ..२५.२५(ब्रह्मा की पूर्व भुजा से अग्नि दक्षिण भुजा से धर्म की उत्पत्ति का उल्लेख, पश्चिम भुजा से यज्ञ, उत्तर भुजा से प्रचेताओं की उत्पत्ति), वामन ९०.३७(तल में विष्णु की सहस्रभुज आदि नाम से प्रतिष्ठा का उल्लेख), विष्णुधर्मोत्तर .४२.२१(भुजाओं में विजया की स्थिति का उल्लेख), स्कन्द ..९५.४४(व्यास द्वारा काशी में भुजा उठाकर हरि सेव्यता का कथन, शैलादि कृत व्यास की भुजा वाक् का स्तम्भन, विष्णु के उपदेश से स्तम्भन से निवृत्ति), योगवासिष्ठ ..८०.२२( मुख वाले रुद्र की १० भुजाएं कर्मेन्द्रिय विषय होने का उल्लेख), कथासरित् ..३९(वीरभुज : राजा, गुणवरा - पति, शृङ्गभुज - पिता), ..३९(निर्वासभुज : वीरभुज अयशोलेखा - पुत्र ), द्र. गोभुजा, निर्वासभुज, वीरभुज, शृङ्गभुज bhuja 

भुजङ्ग नारद .६६.११७(भुजङ्ग की शक्ति रेवती का उल्लेख), मत्स्य .१८(मनु की नौका के मत्स्य के शृङ्ग से बांधने के लिए शेषनाग/भुजङ्ग के रज्जु बनने का उल्लेख), .(भुजङ्गों द्वारा आकाश में विश्वपक्षियों के मार्ग को जानने का उल्लेख), १४६.६५(इन्द्र द्वारा भुजङ्ग रूप धारण कर वज्राङ्ग वराङ्गी के तप में विघ्न का कथन), लक्ष्मीनारायण .४५.८५(कृष्ण का कच्छ में राजा माधवराय की नगरी भुजङ्ग में आगमन ), द्र. नाग, सर्प bhujanga 

भुव ब्रह्म .८५(अङ्गिरसों द्वारा आदित्यों से दक्षिणा रूप में भुव: की प्राप्ति, भुव: के सिंहिका रूप होने पर कपिला गौ प्राप्त कर दुष्ट भूमि का विनिमय करना), ब्रह्मवैवर्त्त .८५(भुव: : स्थान का नाम, अङ्गिरसों द्वारा आदित्यों से कपिला गौ प्राप्त कर दुष्ट भूमि का विनिमय करना), ब्रह्माण्ड ..१९.१५५(अण्ड के अन्त में भू, भुव: आदि लोकों का उल्लेख), ..२१.२१(वही), ..३८.१६ (भुव: की निरुक्ति भुव: लोक), ...१५६(कालाग्नि द्वारा दहनीय लोकों में से एक), ...२७(भुव लोक के निवासियों के रूप में मरुत, मातरिश्वा आदि के नाम), मत्स्य .(हर्यश्वों द्वारा भुव के प्रमाण को जानने के प्रयास का कथन), १७१.१४(ब्रह्मा के मानसिक संकल्प से सृष्ट द्वितीय पुत्र, परम पद प्राप्ति), वामन ९०.३९(भुवर्लोक में विष्णु का गरुड नाम), वायु २१.२९/ .२१.२७(द्वितीय कल्प का नाम), २१.३१(११वें कल्प का नाम), २९.२८(अवक्षु अच्छावाक् अग्नि के भुव स्थान का उल्लेख), ३३.५६(उन्नेता - पुत्र, उद्गीथ - पिता), ६४.१४/..१४ (भू, भुव आदि की निरुक्ति), ९६.१८१/.३४.१८१(देवकी के ७वें पुत्र के रूप में भुव का उल्लेख, गवेषण संज्ञा?), ९९.३०३/.३७.२९७(भुवत : भविष्य के राजाओं में से एक, ६४ वर्ष राज्य करने का उल्लेख), १००.१६०/.३८.१६० (कालाग्नि द्वारा दहनीय लोकों में से एक), १०१.११/.३९.११(भू आदि कृत लोकों में से एक, अन्तरिक्ष के भुव: रूप होने का कथन), १०१.२८/.३९.२८ (भुव: लोक के निवासियों गन्धर्वों, यक्षों आदि के नाम), १०१.४३/.३९.४३ (भुव: स्व: लोक के निवासियों के सोमपा और आज्यपा होने का उल्लेख), शिव .१७.(भुव विस्तार के अन्तर्गत जम्बू द्वीप वर्ष का निरूपण), लक्ष्मीनारायण .९६.११६(श्रीहरि के भुवर्लोक में भ्रमण के वृत्तान्त का कथन, आवह आदि वायुओं द्वारा श्रीहरि का स्वागत ) bhuva  

भुवन अग्नि ८४.२५(१०८ भुवनों का ११ दिशाओं के सापेक्ष विन्यास, १०८ रुद्रों से साम्य), ८५.(प्रतिष्ठा कला में ५६ भुवनों के नाम), ८६.(विद्या कला/सुषुप्ति में २५ भुवनों के नाम), ८७.(शान्ति कला में १४ रुद्रों/भुवनों के नाम), ब्रह्माण्ड ...८९(भृगु दिव्या के १२ भृगु देव पुत्रों में से एक), ...२८(बृहस्पति - भगिनी भुवना के प्रभास वसु की भार्या होने का उल्लेख), ...७१(सुरभि कश्यप के ११ रुद्र संज्ञक पुत्रों में से एक), भविष्य .१९१(रजि - पुलस्त्य संवाद में भुवन प्रतिष्ठा विधि माहात्म्य), मत्स्य १९५.१२(भृगु दिव्या के भृगु देव संज्ञक १२ पुत्रों में से एक), वामन ११.३४(भुवन के द्वीपादि का वर्णन, ऋषि - सुकेशि संवाद), वायु ३६+ (भुवन विन्यास), ६५.८७/..८७(भृगु के भृगु देव संज्ञक १२ पुत्रों में से एक), ६६.७०/..७०(सुरभि कश्यप के रुद्र संज्ञक ११ पुत्रों में से एक ), द्र. भौवन bhuvana 

भुवनकोश अग्नि १०८+ (भुवनकोश वर्णन का आरम्भ), गरुड १५४, लिङ्ग .४६+ (भुवनकोश का वर्णन), वायु ३६, विष्णु .१+ (भुवनकोश का वर्णन ) bhuvanakosha 

भुवनेश लिङ्ग ., ..२४(राजा भुवनेश द्वारा हरिमित्र ब्राह्मण के धन का हरण करने से स्वर्ग में क्षुधाग्रस्त होना), लक्ष्मीनारायण .५९.२१(स्व कीर्ति श्रवण प्रिय राजा भुवनेश द्वारा हरिमित्र ब्राह्मण को दुःख देने से कर्दमी कीट बनना ) bhuvanesha 

भुवनेशी देवीभागवत ..४४(ब्रह्मा आदि द्वारा भुवनेशी देवी का दर्शन), ..१४(ब्रह्मा, विष्णु, महेश द्वारा जगदम्बा के चरण नख में ब्रह्माण्ड का दर्शन ) bhuvaneshee 

भुवनेश्वरी देवीभागवत ..६५(व्यास द्वारा भुवनेश्वरी की स्तुति पर देवी द्वारा पाण्डवों को युद्ध में मृत परिजनों के दर्शन कराना), .१९.३९(भुवनेश्वरी से सर्वदेशों में रक्षा की प्रार्थना), .१५.१२(देवों द्वारा दैत्यों पर विजय हेतु भुवनेश्वरी की स्तुति), .३८.१४(भुवनेश्वरी देवी की मणि द्वीप में स्थिति का उल्लेख), नारद .८४.(भुवनेश्वरी का योगनिद्रा उपमा, भुवनेश्वरी मन्त्र विधान का कथन ) bhuvaneshvaree/ bhuvaneshvari

भुवमन्यु मत्स्य ४९.३५(वितथ/भरद्वाज - पुत्र, पुत्रों के नाम), वायु ९९.१५४/.३७.१५४(वितथ/भरद्वाज - पुत्र, पुत्रों के नाम ) bhuvamanyu 

भुशुण्ड योगवासिष्ठ ..१४(भुशुण्ड उपाख्यान के अन्तर्गत भुशुण्ड का स्वरूप, चिरजीविता हेतु आदि का वर्णन ) bhushunda

भुशुण्डी गणेश .४३.(त्रिपुर शिव के युद्ध में भुशुण्डी का कालकूट से युद्ध), .५६.३१(गणेश की आराधना में रत भुशुण्डि मुनि के समक्ष इन्द्र का आगमन, भुशुण्डि द्वारा गणेश का स्वरूप प्राप्त करना), मत्स्य १५०.१०६(कुजम्भ द्वारा धनद/कुबेर के सैनिकों पर भुशुण्डी के प्रयोग का कथन), १५३.२०४(तारक द्वारा यम को भुशुण्डि से परास्त करने का उल्लेख), १७९.१६(अन्धकासुर के रक्तपानार्थ शिव द्वारा सृष्ट मातृकाओं में से एक), स्कन्द ..८९.१९, ..८९.७७ (वीरभद्र का अस्त्र ), द्र. काकभुशुण्डि, भ्रूशुण्डि bhushundee/ bhushundi 

भू ब्रह्माण्ड ..३८.११(भू की निरुक्ति भू लोक), भागवत .१५.१८(भू द्वारा पृथु को योगमयी पादुका प्रदान करने का उल्लेख), मत्स्य १७१.१७(भू, भुव: आदि की ब्रह्मा से उत्पत्ति, ब्रह्मत्व प्राप्ति), वायु .३३(भू की निरुक्ति, मन का नाम), ६४.१०/..१०(भू, भव, भव्य व्याहृतियों का निरूपण), १०१.४२/ .३९.४२ (भूलोक वासियों के अन्न भक्षक रसात्मक होने का  उल्लेख), शिव .१९.(भूलोक/पृथिवी लोक में सूर्यादि ग्रहों की स्थिति का निरूपण), स्कन्द ..६९.१४७(भूर्भुव: स्व: लिङ्ग का संक्षिप्त माहात्म्य ), द्र. हविर्भू bhoo/bhuu/ bhu 

भूगोल अग्नि १०७+ (भुवनकोश द्वीपादि का वर्णन), ११८+ (भुवनकोश के अन्तर्गत द्वीपादि का वर्णन), देवीभागवत .(द्वीप, वर्ष भेद से भूमण्डल का विस्तार), नारद .(भूगोल के वर्णनान्तर्गत भरत ण्डोत्पत्ति), पद्म .४०.(पद्म के पृथिवीत्व वर्णन पूर्वक केसरों पत्रों के पर्वत - देशादि होने का वर्णन), .३+ (द्वीप भू विभा वर्णन), ब्रह्म .१६.११(जम्बू, प्लक्ष आदि सप्त द्वीपों में जम्बू द्वीप के मध्य में स्थित मेरु के परित: पर्वतों आदि का वर्णन), .१७(जम्बू द्वीप के अन्तर्गत भारत का वर्णन), .१८(अन्य द्वीपों का वर्णन), ब्रह्माण्ड ..१५(पृथिवी पर द्वीप, समुद्र, पर्वतादि का विस्तार से वर्णन), भविष्य .१२५+ (भुवनकोश का वर्णन), ..(भूर्लोक के विस्तार का वर्णन), भागवत .१६(भुवनकोश का वर्णन), .१६.(भूगोलक के नाम रूप लक्षणों का वर्णन), मत्स्य ११३(द्वीप, वर्ष, पर्वतादि का वर्णन), १२१+ (जम्बू, शाक, कुश, क्रौञ्च, शाल्मल, गोमेदक, पुष्करादि द्वीपों का वर्णन),  लिङ्ग .४६(भुवनकोश के अन्तर्गत द्वीपद्वीपेश्वर का कथन), वराह ७४+ (भुवनकोश का वर्णन), विष्णु .(पराशर कृत सप्त द्वीप, सागर, पर्वत, सरिताओं का वर्णन), शिव .१७(भूगोल वर्णनान्तर्गत जम्बू द्वीप के वर्षों का निरूपण), स्कन्द ..३८+ (गोल संस्थिति के वर्णन पूर्वक ऊर्ध्व - अधोलोक व्यवस्थिति), योगवासिष्ठ ..१२७(भूगोल निर्णय ) bhoogola/bhuugola 

भूत अग्नि ३३(भूत शुद्धि विधि), ७४.१६(भूत शुद्धि विधि व पञ्च महाभूतों का स्वरूप), गणेश २.११४.१५(गणेश व सिन्धु के युद्ध में भूतराज का महाकाय से युद्ध) देवीभागवत ११.८(भूतशुद्धि के प्रकार), नारद १.४४.२४(पञ्च महाभूतों से भूत सृष्टि का निरूपण, मन व बुद्धि का भूतों को योगदान), १.६६.११२(एकनेत्र की शक्ति भूतमात्रा का उल्लेख), पद्म ६.१६५.१(भूतालय तीर्थ का माहात्म्य), ब्रह्माण्ड १.१.५.५३( भूतों, तन्मात्राओं आदि के सर्गों का कथन), १.१.५.६०(सब भूतों में सब प्रकार के सर्ग विद्यमान होने का कथन, भूतों में विपर्यय, शक्ति आदि ४ का समावेश), १.२.२१.१५६(४ लोकपालों के आभूतसंप्लवन तक स्थित रहने का कथन),   १.२.२५.३९(भूतों के स्वरूप का वर्णन), १.२.३२.७६(अहंकार से भूतों व इन्द्रियों की सृष्टि का कथन), २.३.३.१२५(भूतवादियों व भूतानुवादियों सम्बन्धी कथन), २.३.७.३५९(भूता से रुद्र के अनुचर भूतों की उत्पत्ति, स्वरूप वर्णन), २.३.७.४४०(भूतों के योनिज व औत्पत्तिक प्रकारों का उल्लेख), २.३.८.७१(पुलह की प्रजाओं में से एक), २.३.७२.५४(गर्भ में प्राणवायुओं के प्रवेश पर देह में भूतावाप्ति के इन्द्रियगोचर होने का कथन), ३.४.१.१२८(सब भूतों की नैमित्तिक, प्राकृतिक व आत्यन्तिक प्रलय/प्रतिसंचर का कथन), ३.४.४४.५८(भूतमता : वर्णशक्तियों में से एक), भविष्य १.५७.८(भूतों के लिए उल्लेपिका बलि का उल्लेख), १.५७.१९(भूतों के लिए बिभीतक बलि का उल्लेख), ३.४.२३.१००(भूत प्रेत आदि की कायस्थ  वर्ण द्वारा तृप्ति का उल्लेख), ४.१३६.१(पार्वती के मूत्र जल से भूतमाता की उत्पत्ति, भूतमात्रा उत्सव का वर्णन), भागवत १.२.२६(मुमुक्षुओं द्वारा भूतपतियों की अपेक्षा नारायण की शान्त कलाओं को भजने तथा श्री, ऐश्वर्य की इच्छा करने वालों द्वारा पितृ, भूत आदि की उपासना का कथन), २.६.१३(राक्षस, भूत आदि के पुरुष रूप होने का उल्लेख), २.६.१५(भूत व भव्य के पुरुष रूप होने का उल्लेख), ३.२.४०(ब्रह्मा की तन्द्रा से भूतपिशाचों की उत्पत्ति), ६.६.२(भूत द्वारा दक्ष की २ कन्याओं को भार्या रूप में प्राप्त करने का उल्लेख), ६.६.१७(भूत - पत्नी सरूपा से रुद्रों की उत्पत्ति का कथन), ६.८.२४(विष्णु की गदा से भूतग्रहों को चूर्ण करने की प्रार्थना), ८.५.३(भूतरय : रैवत मन्वन्तर में देवों के प्रधान गणों में से एक), ९.२४.४७(पौरवी व वसुदेव के १२ पुत्रों में से एक), ११.१०.२८(पशुओं की अविधिपूर्वक बलि देकर भूत - प्रेतों का यजन करने से नरक प्राप्ति का कथन), ११.१६.३५(विभूति वर्णनान्तर्गत श्रीहरि के भूतों की उत्पत्ति , स्थिति, प्रलय होने का उल्लेख), मत्स्य ८.५(शूलपाणि के भूतों आदि के पति होने का उल्लेख), १२३.५०(वायु, आकाश, महत् आदि द्वारा भूतों को धारण करने का कथन, भूमि, आपः, अग्नि आदि के आपेक्षिक परिमाणों का कथन), १२३.५६(पृथिवी आदि के परिच्छिन्न होने का कथन, भूतों से परे अलोक होने का उल्लेख), १६६.६(शरीर में ५ भूतों के आश्रित गुणों का कथन), १७९.३१(भूतडामरी : अन्धकासुर के रक्त पानार्थ शिव द्वारा सृष्ट मातृकाओं में से एक), २५२.६(वास्तु भूत के उद्भव का वृत्तान्त), वायु ४.४६(तामस भूतादि के भूत तन्मात्र सर्ग होने का कथन), १२.१८(पृथिवी आदि भूतों की धारणा के परिणाम), ४९.१७३(सात भूतों में से पृथिवी आदि ३ भूतों के परिछिन्न होने आदि का कथन), ५४.४२(भूतों के स्वरूप का कथन), ६९.३९ (भूतगण के चरित्र का कथन), ६९.२४२/२.८.२३६(भूति - पुत्र, रुद्र - अनुचर, भूतों के विभिन्न गण व भूतों का चरित्र), ९७.५५/२.३५.५५(शरीर में प्राणवायुओं के प्रवेश पर देह में पृथिवी आदि भूतावाप्ति के इन्द्रियगोचर होने का कथन), १००.२३८/२.३८.२३८(आभूत संप्लव के संदर्भ में प्रजापति की भूत संज्ञा का कथन), १०१.२१/२.३९.२१(अग्नि के भूतपति होने का उल्लेख), १०१.२९३/२.३९.२९३(सिंहों के महाभूत होने का उल्लेख), १०१.३३३/ २.३९.३३३ (प्रलय काल में आदित्यों के सिंह व वैश्वानरों के व्याघ्र रूप भूतगण होने का कथन), विष्णु १.२२.७२(विष्णु द्वारा धारित पञ्चरूपा वैजयन्ती माला पञ्चभूत संघात का प्रतीक), ४.१५.२२(रोहिणी कुल में उत्पन्न सन्तानों में से एक), स्कन्द २.७.१९.१८(भूत, मनुष्य, देव, सप्तर्षि, अग्नि, सूर्य तथा प्राण की उत्तरोत्तर श्रेष्ठता का प्रतिपादन ; भूत के नरोत्तम से श्रेष्ठ व मनुष्य आदि से अवर होने का उल्लेख), ४.१.२०(भूतालि द्वारा ध्रुव के तप में विघ्न, भूतों के प्रकार व स्वरूप का वर्णन, सुदर्शन चक्र द्वारा रक्षा), ५.३.१७७(भूतीश्वर तीर्थ का माहात्म्य), ६.३६.२१(भूतपीडा नाश के लिए बृहत् साम जप का निर्देश), ७.१.२३.३९(१४ भूतग्रामों के नाम),  ७.१.८७.८(भूतेश : कलियुग के ११ रुद्रों में से प्रथम, माहात्म्य का वर्णन), ७.१.१६७(भूतमातृका का माहात्म्य, पार्वती से भूतमातृकाओं की उत्पत्ति, वासस्थान, पूजा विधि), हरिवंश ३.११.७(जल के स्वयं मथन से पञ्चभूतों की उत्पत्ति का कथन), महाभारत शान्ति २१४.२४(शुक्र गति के भूतसंकरकारिका होने का उल्लेख), २४७(आकाश आदि ५ महाभूत और उनके शब्दादि गुणों का वर्णन, बुद्धि द्वारा गुणों को इन्द्रियों से जोडने की कथा), २५२(देह में ५ भूतों के विशिष्ट कार्य), २५५.५(५ भूतों के गुण), ३११.१०(परमेष्ठी अहंकार से ५ भूतों की उत्पत्ति का कथन, भूतों के गुणों से भूतों में अन्योन्यक्रिया होने का कथन), ३३९.३०(मन के परम भूत होने तथा वासुदेव के सर्वभूतात्मभूत होने का कथन), ३४७(५ भूतों की आत्यन्तिक प्रलय व सृष्टि का वर्णन), अनुशासन ९८.३१(भूतों हेतु उपयुक्त पुष्प), आश्वमेधिक ११.७(वृत्र द्वारा ५ भूतों के गन्ध आदि विषयों को हरने का कथन), सौप्तिक .१५(अश्वत्थामा के समक्ष प्रकट हुए शिव के भूतगणों का स्वरूप), योगवासिष्ठ ६.१.८१.१०१(अग्नीषोम प्रकरण में चैतन्य व जड के मिश्रण से भूतों की उत्पत्ति का कथन), लक्ष्मीनारायण १.५३९.५१(भूतमातृ तीर्थ की उत्पत्ति का वर्णन, शिव व पार्वती के स्नान से उत्पन्न जलकर्दम से भूतों व भूतिकाओं का आविर्भाव, भूतों व पिशाचों के निवास योग्य स्थान), २.११५.६(शिव द्वारा भैरव को भूतों का अधिपति बनाने का कथन), २.२२५.९५ (भूत प्रेत आदि के लिए कञ्चुक दान का उल्लेख), २.२५५.४१(आश्रय, बन्धन आदि चतुर्भाव भूततत्त्व का उल्लेख),२.२९३.१०९(भूतप्रेतों द्वारा बालकृष्ण व लक्ष्मी के विवाह में अम्बर भूषा देना), ३.४५.१८(भूतयज्ञ कर्ताओं के विविध भूतों को प्राप्त होने का उल्लेख), ३.१३२.५१(महाभूत कलश दान विधि व माहात्म्य ), द्र. महाभूत bhoota/bhuta

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