पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(From Bhakta  to Maghaa )

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

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Bhakta - Bhagamaalaa ( words like Bhakta / devotee, Bhakti / devotion, Bhaga, Bhagamaalaa etc.)

Bhagavata - Bhadra ( Bhagini / Bhaginee / sister, Bhageeratha, Bhajamaana, Bhanda, Bhadra etc.)

Bhadraka - Bhadraa (  Bhadrakaali / Bhadrakaalee, Bhadrasena, Bhadraa etc.)

Bhadraayu - Bharata ( Bhadraayu, Bhadraashva, Bhaya / fear, Bharata etc. )

Bharata - Bhava ( Bharadvaaja, Bharga, Bhalandana, Bhava etc. )

Bhavamaalini - Bhaandira (  Bhavaani, Bhasma / ash, Bhaagavata, Bhaandira etc. )

Bhaata - Bhaaradwaaja ( Bhaadrapada, Bhaanu, Bhaanumati, Bhaarata, Bhaarati, Bhaaradwaaja etc.)

Bhaarabhuuti - Bhaashya (  Bhaarabhuuti, Bhaargava, Bhaaryaa, Bhaava etc.)

Bhaasa - Bheema  ( Bhaasa, Bhaaskara / sun, Bhikshaa / begging, Bhilla, Bheema etc.)

Bheemanaada - Bheeshmaka (  Bheemaratha, Bheemaa, Bheeshma, Bheeshmaka etc.)

Bhukti - Bhuuta (  Bhuja, Bhuva, Bhuu, Bhuugola / geology, Bhuuta / past / Bhoota / matter etc.)

Bhuutaketu - Bhuumi ( Bhuuti, Bhuumaa, Bhuumi / earth etc.)

Bhuumimitra - Bhrigu  (  Bhuuri, Bhrigu etc. )

Bhrigukachchha - Bhairava ( Bhringa, Bherunda, Bhairava etc.)

Bhairavi - Bhojana  ( Bhairavi, Bhoga, Bhogavati, Bhoja, Bhojana / food etc.)

Bhojaa - Bhruushunda ( Bhautya, Bhauma, Bharamara, Bhraataa / brother etc. )

Ma - Magha  ( Makara, Makaranda, Makha, Magadha, Maghaa etc.)

 

 

 

 

 

 

 

 

भरद्वाज मुनि की कथा के माध्यम से आचरणपरक मन का चित्रण

-     राधा गुप्ता

वाल्मीकि रामायण में भरद्वाज मुनि से सम्बन्धित कथा का वर्णन तीन स्थानों पर उपलब्ध होता है। कथा का संक्षिप्त स्वरूप इस प्रकार है

कथा का संक्षिप्त स्वरूप

     सर्वप्रथम अयोध्याकाण्ड (सर्ग 54) में वर्णन आता है कि राम जब लक्ष्मण और सीता के साथ वन की ओर जाने के लिए अयोध्या से निकले, तब सबसे पहले अपने मित्र निषादराज गुह से मिले और फिर प्रयाग में गंगा यमुना संगम पर स्थित भरद्वाज मुनि के आश्रम में पहुँचे। भरद्वाज मुनि मृगों, पक्षियों तथा ऋषि मुनियों के बीच में विराजमान थे। उन्होंने अन्न, रस आदि प्रदान करते हुए राम का आतिथ्य सत्कार किया और कहा कि वे दीर्घकाल से उन्हीं के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। भरद्वाज मुनि ने आश्रम में ही ठहरने के लिए राम से अनुरोध किया परन्तु राम ने वहाँ ठहरना स्वीकार नहीं किया और सबकी पहुँच से दूर किसी एकान्त स्थान को ही अपने रहने के लिए उचित समझा। अतः भरद्वाज मुनि ने राम को उस परम पवित्र चित्रकूट पर्वत पर ठहरने का आदेश दिया जो मधुर फल मूल से सम्पन्न था और जहाँ अनेक प्रकार के पशु पक्षी मृग, लंगूर, वानर, रीछ, गजराज, किन्नर, कोकिल, सर्प, मयूर आदि तथा ऋषि महर्षि निवास करते थे। मुनि ने कहा कि चित्रकूट के शिखरों का दर्शन करके मनुष्य पुण्य कर्मों का फल पाता है और पाप में कभी मन नहीं लगाता। चित्रकूट पर पहुँचने के मार्ग का निर्देश करते हुए भरद्वाज मुनि ने कहा कि उन्हें गंगा के जल के वेग से अपने प्रवाह के प्रतिकूल दिशा में मुडी हुई यमुना को भी पार करके चित्रकूट में पहुँचना होगा।

     दूसरी बार (अयोध्याकाण्ड, सर्ग 90, 91) भरद्वाज मुनि का दर्शन उस समय होता है जब भरत राम को लौटा लाने के लिए सेना आदि को साथ लेकर उनके आश्रम में पहुँचते हैं । राम के प्रति भरत के भाव को पहचान लेने के पश्चात् भरद्वाज मुनि ने ससैन्य भरत का आतिथ्य सत्कार करना चाहा और आश्रम में ही ठहरने के लिए भरत को निमन्त्रित किया। भरद्वाज मुनि ने आतिथ्य सत्कार हेतु विश्वकर्मा, त्वष्टा, इन्द्र, यम, कुबेर तथा सोम आदि देवताओं का और गन्धर्वों, अप्सराओं का आवाहन किया, जो स्मरण करते ही वहाँ उपस्थित हो गए। देवताओं द्वारा प्रस्तुत दिव्य सामग्रियों से भरद्वाज मुनि ने ससैन्य भरत का दिव्य सत्कार किया। मुनि से सत्कृत होकर और परस्पर अभिवादन करते हुए भरत भरद्वाज मुनि द्वारा बताए हुए मार्ग से चित्रकूट की ओर चले गए।

     तीसरी बार (युद्धकाण्ड, सर्ग 124) भरद्वाज मुनि का दर्शन उस समय होता है जब राम अयोध्या लौटते समय पुनः उनके आश्रम में पहुँचते हैं। राम के पूछने पर भरद्वाज मुनि ने अयोध्यावासियों के कुशल क्षेम का वर्णन किया और राम से कहा कि तप के प्रभाव से वे वन में घटित हुए प्रत्येक वृत्तान्त को जानते हैं। भरद्वाज मुनि ने आतिथ्य सत्कार के रूप में जब राम को एक वर देना चाहा, तब राम ने कहा कि वर के रूप में अयोध्या के मार्ग के सभी वृक्ष असमय में ही मीठे फलों से युक्त हो जाएँ। तदनुसार फलहीन वृक्ष मीठे फलों से युक्त गो गए, पुष्प रहित वृक्षों में पुष्प आ गए और सूखे वृक्ष हरे भरे हो गए।

कथा की प्रतीकात्मकता

कथा पूर्णरूपेण प्रतीकात्मक है। अतः कथा के अभिप्राय को समझने के लिए एक एक प्रतीक को समझ लेना आवश्यक है।

1-    भरद्वाज मुनि भरद्वाज शब्द भरत् और वाज नामक दो शब्दों के योग से बना है। भरत् का अर्थ है भरना और वाज का अर्थ है क्रिया शक्ति। वाज एक वैदिक शब्द है और वेदों में आए हुए ऋभु विभु और वाज नामक शब्द क्रमशः ज्ञानशक्ति, भावशक्ति और क्रियाशक्ति के वाचक हैं। मुनि शब्द मन को इंगित करता है। अतः वाज (क्रियाशक्ति) का भरण करने वाले मन को भरद्वाज मुनि कहा जा सकता है। सरल रूप में, ऐसा कह सकते हैं कि जो मन ज्ञान के भीतर क्रिया शक्ति को भरता है, अर्थात् ज्ञान को आचरण में उतारता है वह भरद्वाज मुनि है।

2-    भरद्वाज मुनि के आश्रम की गंगा यमुना संगम पर स्थिति-

गंगा नदी ज्ञान की और यमुना नदी कर्म (आचरण) की प्रतीक है। गंगा यमुना के संगम पर भरद्वाज मुनि का आश्रम कहकर वास्तव में भरद्वाज मुनि को ही प्रकारान्तर से समझाने का प्रयास किया गया है। भरद्वाज मुनि उस मन का वाचक है जो सदा ज्ञान और कर्म (आचरण) के संगम अर्थात् समन्वय में स्थित रहता है।

3-    भरद्वाज मुनि के आश्रम की प्रयाग में स्थिति प्रयाग शब्द प्र उपसर्गपूर्वक याग शब्द के योग से बना है। प्र उपसर्ग विशिष्टता का वाचक है और याग (यज् धातु से निष्पन्न) का अर्थ है यज्ञ अर्थात् ज्ञानपूर्वक किया हुआ कर्म। अतः ज्ञान से जुडकर विशिष्ट बने हुए कर्म (यज्ञ) को ही प्रयाग कहा जा सकता है। भरद्वाज मुनि को प्रयाग में स्थित कहकर भी वास्तव में ज्ञान और कर्म के समन्वय में स्थित आचरणपरक मन की ओर ही संकेत किया गया है।

4-    भरद्वाज मुनि के द्वारा दीर्घकाल से राम के आगमन की प्रतीक्षा करना और उन्हें अन्न, रस आदि प्रदान करना प्रस्तुत कथन के द्वारा यह महत्त्वपूर्ण संकेत किया गया है कि जब तक मनु,य अपने वास्तविक स्वरूप आत्मस्वरूप को पहचान नहीं लेता, तब तक जीवन व्यवहार में ज्ञान को भी उतार नहीं पाता। इसलिए आचरणपरक मन यह प्रतीक्षा करता है कि मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचाने। ज्ञान को आचरण में उतारना मनुष्य को तृप्ति प्रदान करता है जिसे कथा में भरद्वाज मुनि द्वारा राम को अन्न, रस आदि प्रदान करने के रूप में संकेतित किया गया है।

5-    भरद्वाज मुनि का आश्रम में मृगों, पक्षियों तथा ऋषियों के मध्य विराजमान होना मृग शब्द अन्वेषण अर्थ वाली मृग् धातु से बना है और अन्वेषणपरक मन अथवा विचारों को इंगित करता है।

पक्षी शब्द का प्रयोग पौराणिक साहित्य में मन रूपी आकाश में उडान भरने वाले उच्च विचारों के लिए किया गया है। ऋषि शब्द श्रेष्ठ मन अथवा विचारों का वाचक है। अतः भरद्वाज मुनि को मृगों, पक्षियों तथा ऋषियों के मध्य में विराजमान कहकर यह संकेत किया गया है कि जीवन व्यवहार में ज्ञान को उतारने वाला आचरणपरक मन सदा अन्वेषणपरक, उच्च, श्रेष्ठ विचारों से घिरा रहता है।

6-    चित्रकूट पर्वत चित्रकूट शब्द चित्र और कूट नामक दो शब्दों के मेल से बना है। चित्र शब्द वास्तव में चित्त शब्द का ही छिपा हुआ स्वरूप है और कूट का अर्थ है जटिल, पेचीदा, उलझन भरा। अतः चित्रकूट शब्द के द्वारा उस कूट चित्त की ओर संकेत किया गया है जिसको जानना, समझना सरल नहीं है और जन्मों जन्मों में संचित हुए संस्कारों के कारण जो जटिल भी हो गया है। कोई संस्कार किस कर्म कर्म का परिणाम होता है कहा नहीं जा सकता। इस कूट चित्त को पर्वत कहकर यह संकेत किया गया प्रतीत होता है कि चित्त के भीतर संचित हुए संस्कार कोई दो, चार, दस, बीस नहीं होते। उनका तो एक पर्वत ही बन जाता है।

7-    भरद्वाज मुनि द्वारा राम को चित्रकूट पर्वत पर रहने का आदेश देना रामकथा में राम नामक पात्र स्वस्वरूप में स्थिति अर्थात् आत्मज्ञान का वाचक है। आत्मज्ञान का प्रमुख उद्देश्य है चित्त पर चिन्तन करते हुए चित्तगत विकारों को देखना, समझना और उनका विनाश करना। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु आत्मज्ञान में स्थित मनुष्य का अपना ही आचरणपरक मन उसे प्रेरित करता है, जिसे कथा में भरद्वाज मुनि द्वारा राम को चित्रकूट पर रहने के आदेश के रूप में चित्रित किया गया है।

8-    चित्रकूट पर्वत का प्रचुर फल-मूल से सम्पन्न होना प्रस्तुत संदर्भ में फल शब्द कार्य अर्थात् परिणाम का और मूल शब्द कारण का वाचक है। चित्रकूट पर्वत पर फल मूल की प्रचुरता कहकर यह संकेत किया गया है कि मनुष्य के कूट चित्त में कार्य और कारण रूप दोनों ही प्रकार के संस्कार विद्यमान होते हैं। कुछ संस्कार ऐसे हैं जो पूर्व जन्मों में किए हुए कर्मों के आधार पर निर्मित हुए हैं और वर्तमान में फल (परिणाम) देने के लिए तत्पर हैं। कुछ संस्कार ऐसे हैं जो वर्तमान कर्मों के आधार पर निर्मित हुए हैं और भविष्य में प्राप्त होने वाले परिणामों के मूल अर्थात् कारण हैं।

9-    चित्रकूट पर्वत पर अनेक प्रकार के पशुओं, पक्षियों तथा ऋषियों का निवास प्रत्येक मनुष्य के चित्त में पाँच प्रकार के संस्कार विद्यमान होते हैं। पहली प्रकार के संस्कार वे हैं जिन्हें अनेक जन्मों की यात्रा में मनुष्य अर्जित कर लेता है। दूसरी प्रकार के संस्कार वे हैं जो माता पिता से प्राप्त होते हैं। तीसरी प्रकार के संस्कार वे हैं जिन्हें मनुष्य वातावरण से अर्जित कर लेता है। चौथी प्रकार के संस्कार मनुष्य की अपनी संकल्प शक्ति के संस्कार हैं और पाँचवीं प्रकार के संस्कार आत्मगुणों के हैं जो प्रत्येक मनुष्य में समान ही होते हैं। इन पाँच प्रकार के संस्कारों में से कुछ संस्कार बांधने वाले होते हैं तो कुछ मुक्त करने वाले। ऐसा प्रतीत होता है कि चित्रकूट पर्वत पर अनेक प्रकार के पशुओं, पक्षियों तथा ऋषियों का निवास कहकर उपर्युक्त प्रकार के संस्कारों की चित्त में विद्यमानता को ही इंगित किया गया है।

10-                       चित्रकूट के शिखरों का दर्शन करके पुण्य कर्मों का फल मिलना और पाप कर्म में मन न लगना मनुष्य जो भी कर्म (मानसिक वाचिक अथवा कायिक) बार बार करता है, उसकी एक छाप उसके ही चित्त में अंकित हो जाती है जिसे अध्यात्म की भाषा में संस्कार कहा जाता है। ये संस्कार जीवन में कभी न कभी फलीभूत अवश्य होते हैं, इनसे बचा नहीं जा सकता । चित्त से सम्बन्धित यही ज्ञान कूट चित्त का शिखर है जिसे सम्यक् रूपेण समझकर मनुष्य असद् कर्म करने से बचता है और सत्कर्म में प्रवृत्त होता है।

11-                       गंगा के जल के वेग से यमुना नदी का अपने प्रवाह के प्रतिकूल दिशा में मुडना प्रस्तुत कथन द्वारा इस महत्त्वपूर्ण तथ्य को इंगित किया गया है कि ज्ञान (गंगा) के संसर्ग में रहने पर कर्म (यमुना) की दिशा भी बदल जाती है। अब मनुष्य के कर्म श्रेष्ठ हो जाते हैं। वे स्वार्थपरक न होकर परमार्थपरक बन जाते हैं।

12-                       चित्रकट में पहुँचने के लिए भरद्वाज मुनि द्वारा यमुना को भी पार करने का निर्देश प्रस्तुत कथन से यह संकेत किया गया है कि श्रेष्ठ कर्मों को सम्पन्न करते हुए भी मनुष्य को चित्त पर ध्यान देना आवश्यक है क्योंकि श्रेष्ठ कर्मों को सम्पन्न करता हुआ भी मनुष्य काम क्रोध लोभ मोह अहंकारादि विकारों के वशीभूत होता ही है। अनेक बार तो अपन मन के विपरीत किसी परिस्थिति के उपस्थित होने मात्र से मन के भीतर प्रतिक्रिया स्वरूप ढेरों विचार उत्पन्न हो जाते हैं और मन को इतना वशीभूत कर लेते हैं कि स्वयं मनुष्य को ही आश्चर्य होता है। उदाहरण के लिए, सेवा जैसा श्रेष्ठ कार्य करते हुए भी किसी के व्यवहार से प्रतिक्रियास्वरूप क्रोधित हो जाना, जोर जोर से बोलना, दूसरे की बात को व्यर्थ काटना, सहन न करा अथवा स्वयं ही पीडित हो जाना आदि विकार ऐसे विकार हैं जो चित्त से सम्बन्ध रखते हैं और चित्त से निकलकर तुरन्त मन के स्तर पर पहुँच जाते हैं। अतः श्रेष्ठ कर्म करते हुए भी विकारमुक्त होने के लिए चित्त पर ध्यान देना आवश्यक है  और चित्त पर ध्यान देना तभी सम्भव है जब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानकर प्राप्त हुए ज्ञान को आचरण में उतारने लगे।

13-                       भरत भरत शब्द भर और त (तनोति इति) एकाक्षर के योग से बना है। भर का अर्थ है भार या संग्रह और त अर्थात् तनोति का अर्थ है फैलाव या प्रसार। अतः सुख शान्ति शक्ति शुद्धता ज्ञान प्रेम तथा आनन्द रूपी आत्मगुणों के भार या संगर्ह का प्रसार भरत कहलाता है। भरद्वाज मुनि द्वारा भरत के आतिथ्य सत्कार की इच्छा के रूप में यह संकेत किया गया है कि स्वस्वरूप की पहचान में स्थित मनुष्य का अपना ही आचरणपरक मन यह चाहता है कि जीवन में सुख शान्ति आदि आत्मगुणों का सदा प्रसार होता रहे।

14-                       भरत के आतिथ्य सत्कार हेतु भरद्वाज मुनि द्वारा विश्वकर्मा, त्वष्टा, इन्द्र, यम, कुबेर तथा सोम आदि विभिन्न देवताओं का आवाहन विभिन्न देवताओं के आवाहन का अर्थ है उन विभिन्न शक्तियों को तुरन्त प्रयोग में लाना, जो सामने उपस्थित हुई अप्रिय परिस्थिति को तुरन्त प्रिय बनाने में समर्थ होती हैं। ये शक्तियाँ अनेक प्रकार की होती हैं। उदाहरण के लिए सहन करने की शक्ति, स्वीकार करने की शक्ति, किसी भी बात को लम्बा न खींचकर तुरन्त छोड देने की शक्ति, अपने भीतर समा लेने की शक्ति, विस्तार से संकोच में आने की शक्ति, सहयोग करने की शक्ति, संयम की शक्ति, सामना करने की शक्ति, क्षमा की शक्ति, निश्चय करने की शक्ति तथा विवेक शक्ति आदि। इन सभी शक्तियों का आधार हैं सत्यसंकल्पता, समझ, शुद्धता, संयम, सकारात्मकता तथा शम आदि वे गुण जिन्हें कथा में क्रमशः विश्वकर्मा, त्वष्टा, इन्द्र, यम, कुबेर तथा सोम आदि कहकर इंगित किया गया है। आत्मस्वरूप में स्थित मनुष्य का अपना ही आचरणपरक मन अर्थात् भरद्वाज जब यह चाहता है कि जीवन में सुख शान्ति प्रेम आनन्द का सदा प्रसार होता रहे, तब वह मन अपनी उपर्युक्त वर्णित शक्तियों को प्रयोग में लाकर सुख और शान्ति को बनाए रखता है जिसे कथा में ससैन्य भरत के आतिथ्य सत्कार के रूप में चित्रित किया गया है।

प्रत्येक मनुष्य की सोच, व्यवहार और संस्कार अलग अलग होते हैं और सम्बन्ध सम्पर्क में रहते हुए यह कदापि सम्भव नहीं होता कि दूसरे मनुष्य हमारे अनुसार ही सोचें और व्यवहार करें। यह भी सम्भव नहीं है कि हमारे दृष्टिकोण से जो सही होता है, वह दूसरे के दृष्टिकोण से भी सही हो। इसलिए आत्मज्ञान में स्थित मनुष्य का अपना ही आचरणपरक मन परिस्थिति के अनुसार अपनी उपर्युक्त वर्णित विभिन्न शक्तियों का उपयोग करते हुए जीवन में सुख, शान्ति का प्रसार कर लेता है।

15 भरद्वाज मुनि द्वारा तप के प्रभाव से राम के वनगमन की प्रत्येक घटना को जानना आत्मस्वरूप में स्थित मनुष्य जब अपने संस्कारों (चित्त ) पर ध्यान देता है और वहाँ विद्यमान विकारों के विनाश हेतु प्रयत्नशील होता है, तब जहाँ एक ओर ज्ञान से सम्बन्ध रखने वाली बहुत सी शक्तियाँ उसके कार्य में सहायक स्वरूप होती हैं, वहीं दूसरी ओर अज्ञान से सम्बन्ध रखने वाली बहुत सी शक्तियाँ बाधकस्वरूप खडी हो जाती हैं। आत्मज्ञानी मनुष्य सहायक शक्तियों को साथ लेकर बाधक शक्तियों का विनाश करता है और शनैः शनैः मन की गहराई (चित्त ) में जडें डमाकर बैठे हुए काम क्रोध अहंकारादि विकारों के विनाश रूप अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। चूंकि विकार विनाश की यह सम्पूर्ण यात्रा आन्तरिक होती है, इसलिए अपना ही आचरणपरक मन इस सम्पूर्ण यात्रा को भलीभांति जानने में समर्थ होता है। इस जानने को ही कथा में यह कहकर चित्रित किया गया है कि भरद्वाज मुनि राम के वनगमन की प्रत्येक घटना को जानते हैं।

16 भरद्वाज मुनि का राम को वर देना, वर के रूप में राम का यह मांगना कि अयोध्या के मार्ग के सभी फलहीन वृक्ष असममय में ही मधुर फलों से युक्त हो जाएँ। वर के प्रभाव से फलरहित वृक्षों का मधुर फलों से युक्त हो जाना, पुष्परहित वृक्षों का पुष्पयुक्त हो जाना और सूखे वृक्षों का हरा भरा हो जाना

  अयोध्या (अ योध्या ) का अर्थ है युद्ध रहित स्थिति अर्थात् ऐसा मन जिसमें कोई द्वन्द्व (युद्ध ) न हो, जो स्थिर एवं शान्त हो।

  शरीर रूपी पृथ्वी पर खडे हुए रोम ही वृक्ष हैं जो रोमांच की स्थिति को इंगित करते हैं। यह रोमांच दो प्रकार का होता है। एक है भोग के फलस्वरूप प्राप्त हुआ निरर्थक रोमांच जिसे फलहीन वृक्ष के रूप में चित्रित किया गया है। दूसरा है योग के फलस्वरूप प्राप्त हुआ सार्थक रोमांच जिसे कथा में फलों और पुष्पों से युक्त हुए हरे भरे वृक्षों के रूप में दर्शाया गया है। योग (अर्थात् ज्ञान और कर्म के समन्वय) के फलस्वरूप प्राप्त हुए इस सार्थक रोमांच का अर्थ है कठिन एवं विपरीत परिस्थितियों में भी ज्ञान को आचरित करके मनुष्य को प्राप्त हुआ शान्ति, स्थिरता और प्रसन्नता रूप रोमांच। उदाहरण के लिए प्रियजन की हानि, धन की हानि अथवा सम्मान आदि की हानि ऐसी विपरीत परिस्थितियाँ हैं, जो मनुष्य को अस्थिर, अशान्त बना देती हैं परन्तु मनुष्य जब इस ज्ञान को आचरण में उतारता है कि जो भी घटित हो रहा है वह सही (उसी के किन्हीं पूर्व कर्मों का परिणाम), शुभ एवं कल्याणकारी है तब उन विपरीत परिस्थितियों में भी मनुष्य स्थिर एवं शान्त रहकर प्रसन्न बना रहता है। इस स्थिर, शान्त एवं प्रसन्न स्थिति को ही कथा में अयोध्या के मार्ग में असमय में ही वृक्षों पर आए हुए मीठे फलों तथा पुष्पों के रूप में इंगित किया गया है।

कथा का तात्पर्य

  जीवन जीने के दो तरीके हैं। पहला है स्वयं को शरीर मानकर जीना अर्थात् मैं शरीर हूँ ऐसा मानकर शरीर से सम्बन्ध रखने वाली अपनी भूमिकाओं और अपने पदों आदि को ही अपनी पहचान बना लेना और उसी पहचान के आधार पर जीवन में सारा व्यवहार करना। उदाहरण के लिए माँ होना अथवा पिता होना मनुष्य की महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ मात्र हैं। परन्तु भूमिकाओं को भूमिका न समझकर यही मैं हूँ ऐसा समझ लेना मनुष्य का गहरा अज्ञान है जो पहले तो सन्तान के प्रति आसक्ति और अधिकार भाव को उत्पन्न करता है और फिर उस भूमिका के प्रति सन्तान द्वारा कही हुई छोटी सी बात भी मनुष्य को पीडा पहुँचाने लगती है।

  जीवन जीने का दूसरा तरीका है स्वयं को आत्मा और शरीर को एक उपकरण की तरह मानना। इस तरीके में शरीर एक रथ की भाँति और मनुष्य स्वयं उस रथ को चलाने वाला रथी बन जाता है। अथवा शरीर एक कम्प्यूटर की भाँति और मनुष्य स्वयं उस कम्प्यूटर को चलाने वाले आपरेटर की भाँति हो जाता है। अथवा यह भी कह सकते हैं कि शरीर एक वीणा या बांसुरी की भाँति और मनुष्य स्वयं उस वीणा या बांसुरी को बजाने वाले म्यूजिशियन की भाँति हो जाता है। अब मनुष्य अपने मन या विचारों को (सूक्ष्म शरीर को ) तथा इन्द्रियादि को (स्थूल शरीर को) जिस दिशा में चाहे, उस दिशा में मोड लेता है अथा जैसा चाहे वैसा परिवर्तित कर लेता है। अब वह अपनी भूमिकाओं का तथा पद आदि का सम्यक् रीति से निर्वाह करता है और उन भूमिकाओं तथा पद आदि के प्रति कही हुई किसी की बात से पीडित या दुःखी नहीं होता।

  शरीर के ज्ञान में रहते हुए जहाँ मनुष्य के जीने का ढंग स्वचालित होता है, वहीं आत्मा के ज्ञान में रहने पर वह रचनात्मक ढंग से जीने लगता है और यही रचनात्मक ढंग उसके मन को आचरणपरक बना देता है अर्थात् शरीर के ज्ञान में रहते हुए जहाँ मनुष्य ज्ञान की बातों को सुनता, पढता तथा दूसरों को सुनाता भी है, परन्तु स्वयं के आचरण में नहीं उतारता, वहीं आत्मा के ज्ञान में रहने वाला मनुष्य ज्ञान की एक एक बात को अब सबसे पहले स्वयं के आचरण में ही उतारता है। ज्ञान को आचरण में उतारने वाले उस आचरणपरक मन को ही रामकथा में भरद्वाज मुनि के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

  मुनि शब्द मन का वाचक है और भरद्वाज शब्द का अर्थ है क्रियाशक्ति का भरण करने वाला अर्थात् जो मन ज्ञान को कोरे ज्ञान तक सीमित नहीं रखता अपितु उस ज्ञान में क्रियाशक्ति का समावेश (भरण) करके उसे आचरणपरक बना देता है वही भरद्वाज मुनि है। चूंकि ज्ञान को आचरण में उतारने वाला यह आचरणपरक मन केवल आत्मज्ञान (स्वयं को शरीर न मानते हुए आत्मा मानकर जीना) की अवस्था में ही प्रकट होता है, इसलिए कथा में इसे भरद्वाज मुनि (आचरणपरक मन) और राम (आत्मज्ञान) के मिलन के रूप में दर्शाया गया है।

  इस आचरणपरक मन के स्वरूप का चित्रण रामकथा में तीन रूपों में किया गया है

1 यही मन मनुष्य के चित्त पर चिन्तन के लिए प्रेरित करता है।

2- यही मन जीवन में सुख शान्ति आदि का प्रसार चाहता है और इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु विभिन्न प्रकार की शक्तियों का उपयोग करता है।

3- यही मन जीवन में उपस्थित विपरीत स्थिति में भी मनुष्य को स्थिर, शान्त तथा प्रसन्न बनाए रखता है।

  इन तीन स्वरूपों का चित्रण रामकथा में तीन भिन्न भिन्न कथाओं के अन्तर्गत किया गया है।

1-    कथा में सबसे पहले यह इंगित किया गया है कि आत्मज्ञानी मनुष्य का यह आचरणपरक मन (भरद्वाज मुनि) ही उसे चित्त पर चिन्तन करने के लिए प्रेरित करता है जिसे कथा में भरद्वाज मुनि द्वारा राम को चित्रकूट पर रहने के निर्देश के रूप में चित्रित किया गया है।

अपना ही गहरा मन चित्त कहलाता है जिसमें जन्मों जन्मों की यात्रा में संचित किए गए ढेरों संस्कार विद्यमान रहते हैं। यह संस्कार यद्यपि गुण रूप (अच्छे) तथा विकार रूप (बुरे) दोनों ही प्रकार के होते हैं, परन्तु विकार रूप संस्कार मनुष्य की उत्थान यात्रा में विघ्नस्वरूप होकर उसे बहुत हानि पहुँचाते हैं। उदाहरण के लिए, चित्त में विद्यमान काम क्रोध लोभ मोह अहंकारादि के संस्कार ही चेतन मन के तल पर प्रकट होकर चेतन मन को दूषित करते हैं और चेतन मन की शुद्धता में अर्थात् अच्छी सोच में निरन्तर रुकावट डालते हैं। इसलिए इस चित्त को समझना और उस पर ध्यान देना नितान्त आवश्यक होता है।

     कथा संकेत करती है कि श्रेष्ठ कर्म करता हुआ भी मनुष्य जिन काम क्रोधादि विकारों के अत्यन्त वशीभूत हो जाता है, वे विकार चित्त से निकलकर ही बाहर (चेतन मन के तल पर) आते हैं परन्तु मनुष्य का मन उन श्रेष्ठ कर्मों में ही ऐसा अटका रहता है कि उसका ध्यान उन विकारों की तरफ कभी नहीं जा पाता। केवल स्वस्वरूप (आत्मस्वरूप) की पहचान में स्थित हुए मनुष्य का अपना ही आचरणपरक मन उन चित्तगत विकारों पर ध्यान देने के लिए प्रेरकस्वरूप बनता है।

2 सम्बन्ध सम्पर्क में रहते हुए यह कभी भी सम्भव नहीं है कि दूसरे लोग हमारे साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा हम चाहते हैं अथवा जैसा हम उचित समझते हैं। प्रत्येक मनुष्य का स्वभाव, संस्कार भिन्न होता है और इसी भिन्नता के कारण प्रत्येक मनुष्य का व्यवहार भी भिन्न ही होता है। अब मनुष्य के पास दो ही रास्ते होते हैं। एक है जो जैसा है, उसे उसी रूप में स्वीकार करके सुखी रहना और दूसरा है जो जैसा है, उसे उसी रूप में स्वीकार न करके दुःखी रहना। आत्मज्ञानी मनुष्य का आचरणपरक मन सदा यह चाहता है कि जीवन में सुख और शान्ति बनी रहे। अतः वह अपनी विभिन्न शक्तियों यथा सत्य संकल्पता (विश्वकर्मा), समझ(त्वष्टा), शुद्धता (इन्द्र), संयम (यम), सकारात्मता (कुबेर) तथा शम (सोम) आदि का सहारा लेकर सम्बन्ध सम्पर्क में उपस्थित हुई प्रत्येक स्थिति में सुख और शान्ति को स्थापित कर लेता है। इसी तथ्य को कथा में यह कहकर संकेतित किया गया है कि भरद्वाज मुनि ने विश्वकर्मा, त्वष्टा, इन्द्र, यम, कुबेर तथा सोम आदि विभिन्न देवताओं का आवाहन करके सेना सहित भरत का आतिथ्य सत्कार किया।

3 प्रत्येक मनुष्य इस ज्ञान से परिचित होता है कि जीवन में घटित हो रही प्रत्येक घटना शुभ, मंगलमय और कल्याणकारी है। परन्तु यह ज्ञान केवल सुनने, पढने आथवा कहने तक ही सीमित रहता है। मनुष्य के जीवन में जैसे ही कोई विकट परिस्थिति उपस्थित होती है वह अस्थिर, अशान्त, दुःखी हो जाता है। कथा संकेत करती है कि स्वस्वरूप की पहचान (आत्मज्ञान ) में स्थित हुए मनुष्य का आचरणपरक मन इस ज्ञान को केवल ज्ञान तक सीमित न रखकर आचरण में उतार देता है। फलस्वरूप मनुष्य कठिन से कठिन परिस्थिति में भी स्थिर और शान्त बना रहता है। इसी तथ्य को कथा में यह कहकर संकेतित किया गया है कि भरद्वाज मुनि के प्रभाव से अयोध्या के मार्ग के फलहीन वृक्षों में असमय में ही फल आ गए, पुष्पहीन वृक्ष पुष्पों से युक्त हो गए और जो वृक्ष सूख गए थे, वह हरे भरे हो गए।

 प्रथम लेखन - 5-7-2015ई.(अधिक मास आषाढ कृष्ण चतुर्थी, विक्रम संवत् 2072)