पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(From Bhakta  to Maghaa )

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

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Bhakta - Bhagamaalaa ( words like Bhakta / devotee, Bhakti / devotion, Bhaga, Bhagamaalaa etc.)

Bhagavata - Bhadra ( Bhagini / Bhaginee / sister, Bhageeratha, Bhajamaana, Bhanda, Bhadra etc.)

Bhadraka - Bhadraa (  Bhadrakaali / Bhadrakaalee, Bhadrasena, Bhadraa etc.)

Bhadraayu - Bharata ( Bhadraayu, Bhadraashva, Bhaya / fear, Bharata etc. )

Bharata - Bhava ( Bharadvaaja, Bharga, Bhalandana, Bhava etc. )

Bhavamaalini - Bhaandira (  Bhavaani, Bhasma / ash, Bhaagavata, Bhaandira etc. )

Bhaata - Bhaaradwaaja ( Bhaadrapada, Bhaanu, Bhaanumati, Bhaarata, Bhaarati, Bhaaradwaaja etc.)

Bhaarabhuuti - Bhaashya (  Bhaarabhuuti, Bhaargava, Bhaaryaa, Bhaava etc.)

Bhaasa - Bheema  ( Bhaasa, Bhaaskara / sun, Bhikshaa / begging, Bhilla, Bheema etc.)

Bheemanaada - Bheeshmaka (  Bheemaratha, Bheemaa, Bheeshma, Bheeshmaka etc.)

Bhukti - Bhuuta (  Bhuja, Bhuva, Bhuu, Bhuugola / geology, Bhuuta / past / Bhoota / matter etc.)

Bhuutaketu - Bhuumi ( Bhuuti, Bhuumaa, Bhuumi / earth etc.)

Bhuumimitra - Bhrigu  (  Bhuuri, Bhrigu etc. )

Bhrigukachchha - Bhairava ( Bhringa, Bherunda, Bhairava etc.)

Bhairavi - Bhojana  ( Bhairavi, Bhoga, Bhogavati, Bhoja, Bhojana / food etc.)

Bhojaa - Bhruushunda ( Bhautya, Bhauma, Bharamara, Bhraataa / brother etc. )

Ma - Magha  ( Makara, Makaranda, Makha, Magadha, Maghaa etc.)

 

 

 

 

 

 

 

In vedic literature, there is a two – way feed of energy – from sun to earth and from earth to sun. We are all familiar with energy feed from sun to earth. J.A. Gowan has proposed that the energy fed from sun compensates for lost symmetry of matter on the earth. But why and how should earth feed energy to sun or heaven or moon. It is stated that the black portion of moon is that part which has been fed by earth. So, this is a subject matter which requires further attention in future. We have to keep in mind that in vedic literature, it is well known that one should strive hard to feed gods in heaven by his oblations called ‘havi’. Now, regarding Bharata of puraanic literature, the question will be whether this Bharata feeds energy from sun to earth or from earth to sun? This can be both ways.

            Puraanic literature mentions at least three names as fathers of Bharata. The first one is Dushyanta. The second is Rishabha and the third is Dasharatha. It seems from the analysis of names that there is similarity in these three names. Dushyanta is connected with satisfying all that which is creating ripples in us. These ripples can be of three kinds – of pious nature, of mixed nature and of bad nature. Only when one is able to satisfy these three types of ripples one is able to enter the realm of Bharata, the to – and – fro feeding.  This fact is supported by visit of king Dushyanta in three types of forests before he meets divine girl Shakuntalaa. In the story when Bharata is son of Rishabha, the qualities of Rishabha have to be taken into account. Rishabha can provide 3 or 4 weapons for protection from our enemies. One is ash( of our previous deeds) to protect from enemies of bad nature. The second is a sword to protect from enemies of mixed nature. The third is an armor made of recitation of pious names of God to protect from enemies of pious nature. Rishabha also contains the seeds of why Bharata has been called the middle son of king Dasharatha. Risha root has been stated to mean to live into( ecstasy). When one lives in ecstasy, then the next step will be that his lower level will start getting it’s benefit. This has been shown as two sons Raama and Bharata of king Dasharatha.

            Just like there is some sort of identity in three fathers of Bharata, in the same way the similarity in mothers should also exist. Bharata has three mothers – Shakuntalaa, Jayanti and Kaikeyi.

 

First published : 17-4-2009 AD( Vaishaakha krishna ashtami, Vikrami samvat 2066)

भरत

टिप्पणी : वैदिक और पौराणिक साहित्य में भरण के दो रूप हैं - देवों को भरना और मर्त्य प्रजा का भरण करना देवों को भरने के तथ्य को देवों को हवि प्रदान करना कहा जा सकता है इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि चन्द्रमा में जो कृष्ण भाग दिखाई देता है, वह पृथिवी द्वारा चन्द्रमा में भरा गया भाग है इस भरण से हमारा परिचय कम ही है और प्रश्न उठ सकता है कि मर्त्य स्तर से जो हवि देवों को प्रदान की जाएगी, वह देवताओं के किस काम की होगी, उससे कौन सा स्वार्थ सिद्ध होता होगा यह एक अन्वेषणीय विषय है श्री जे..गोवान ने अपनी वैबसाईट में यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि पृथिवी की जो गुरुत्वाकर्षण शक्ति है, वह सूर्य की किरणों को आकर्षित करके उनको अनन्त ब्रह्माण्ड में फैलने से रोकती है इससे प्रकृति की अव्यवस्था में, एण्ट्रांपी में जो वृद्धि हो रही है, उस पर अंकुश लगता है देव जिस प्रकार मर्त्य प्रजा का देव भाग द्वारा भरण करते हैं, उससे तो हम परिचित ही हैं । वैदिक और पौराणिक साहित्य के भरत का कार्य देव और मर्त्य, दोनों स्तरों पर भरण को सम्पादित करना है

दुष्यन्त और भरत : पुराणों में भरत को दुष्यन्त का पुत्र कहा गया है जबकि ऐतरेय ब्राह्मण .२३ और शतपथ ब्राह्मण १३...११ में भरत को 'दौ:षन्ति, दु:षन्त का पुत्र कहा गया है दुष्यन्त का अर्थ हो सकता है दूषित करने वाला और दु:षन्त का अर्थ हो सकता है दु: अर्थात् दुःख का शमन करने वाला

          भरत के दु:षन्त - पुत्र होने के संदर्भ में, ऋग्वेद .४१., .९४.१२ .१८.१४

में दु:शंस को मर्त्य रिपु कहा गया है जिसका प्रतिस्थापन सुशंस द्वारा करना है ( ऋग्वेद .२३.१०) दु:शंस शब्द को ऋग्वेद १०.३३.१ व में दु:शासु शब्द के आधार पर समझा जा सकता है दु:शासु के संदर्भ में कहा गया है कि - 'नि बाधते अमतिर्नग्नता जसुर्वेर् वेवीयते मति: ' अर्थात् अमति रूपी नग्नता बाधा उत्पन्न करती है और मति वे: - पक्षी की भांति चलायमान होती है दु:शासु शब्द को पुराणों में दु:शासन द्वारा समझा जा सकता है पद्म पुराण .१९१ में गीता के १७वें अध्याय के माहात्म्य के संदर्भ में एक कथा दी गई है एक राजा का दु:शासन नामक भृत्य था जो हाथी द्वारा मार दिए जाने पर दु:शासन नामक हाथी बना एक बार वह हाथी बहुत रुग्ण हो गया तब उस हाथी ने संकेत दिया कि गीता के १७वें अध्याय के श्रवण से उसे मुक्ति मिल जाएगी ऐसा ही हुआ भी गीता के १७वें अध्याय में श्रद्धा, भक्ति आदि को भागों में विभाजित किया गया है - सात्त्विक, राजसिक और तामसिक इसका अर्थ होगा कि वास्तविक जीवन में यदि हम किसी राजसिक दोष का उपचार सात्त्विक उपायों से करना चाहें तो वह सफल नहीं होगा वह दु:शासन कहलाएगा यही तथ्य भरत - पिता दुष्यन्त के संदर्भ में भी लागू होती है जैसा कि श्रीमती राधा ने शकुन्तला पर टिप्पणी के संदर्भ में ध्यान दिलाया है, राजा दुष्यन्त ने शकुन्तला तक पहुंचने के लिए तीन वनों को पार किया पहले वन में उसने हिंसक जन्तुओं का वध किया दूसरा वन मरुस्थल था और तीसरा वन हरा - भरा कण्व ऋषि का आश्रम था अतः शकुन्तला की प्राप्ति और शकुन्तला से भरत का जन्म सात्त्विक स्तर पर होता है अन्य दो स्तरों पर वह शकुन्तला को भूले रहता है यह उल्लेखनीय है कि दुष्यन्त इलिन रथन्तरी का पुत्र है रथन्तरी का अर्थ होता है वह पृथिवी जो अपना भाग देवों में स्थापित करने में समर्थ होती है

          अथर्ववेद में कईं सूक्तों के ऋषि के रूप में शन्ताति - शं की तति अर्थात् विस्तार करने वाला - का उल्लेख हुआ है यह शन्ताति भी दु:षन्त के तुल्य हो सकता है

भरत ऋषभ : भागवत पुराण के पांचवें स्कन्ध में भरत को ऋषभ का पुत्र और नाभि का पौत्र कहा गया है भरत को समझने के लिए ऋषभ को समझना महत्त्वपूर्ण होगा स्कन्द पुराण ..१० तथा शिव पुराण . में ऋषभ योगी की एक कथा दी गई है जिसमें पिंगला वेश्या और उसका पति मन्दार ब्राह्मण ऋषभ योगी की सेवा करते हैं जिससे पिंगला अगले जन्म में रानी बनती है और उसका पति उसका पुत्र लेकिन पूर्व जन्म के पाप से वह कुष्ठग्रस्त होते हैं । कालान्तर में भद्रायु नामक इस पुत्र का निधन हो जाता है और वह ऋषभ योगी की कृपा से पुनः जीवित होता है ऋषभ योगी उसे चार दिव्य वस्तुएं प्रदान करता है - शं, खड्ग, कवच और भस्म जिससे वह अपने शत्रुओं को परास्त करता है इस कथा में भस्म को तामसिक शत्रुओं को नाश करने वाले अस्त्र के रूप में लिया जा सकता है जबकि खड्ग कवच को क्रमशः राजसिक और सात्त्विक शत्रुओं का नियन्त्रण करने वाले अस्त्रों के रूप में अतः यह कहा जा सकता है कि भरत के दोनों पिताओं - ऋषभ और दु:षन्ति में साम्य है ऋग्वेद .६१.१२ में भरत को ऊर्ज - पुत्र कहा गया है -

'ऊर्ज: पुत्रं भरतं सृप्रदानुं देवा अग्निं धारयन् द्रविणोदाम् '

डा. फतहसिंह के अनुसार ऊर्ज वह ऊर्जा है जो पृथिवी के गुरुत्वाकर्षण से विपरीत दिशा में गति करती है

 ऋषभ के संदर्भ में संगीत के ऋषभ स्वर का उल्लेख भी उपयुक्त होगा भरतकोश ( सम्पादक - रामकृष्ण कवि, प्रकाशक - मुन्शीराम मनोहरलाल, दिल्ली) में देक: को उद्धृत करते हुए निम्नलिखित श्लोक दिया गया है -

तिस्रो धमन्यो वर्धन्यो मज्जाया नाभिमाश्रिता: तस्माद्धात्वाश्रितत्वेन ऋषभस्त्रिश्रुतिर्भवेत् ।।

षभ स्वर का स्थान शाकद्वीप कहा गया है इससे संकेत मिलता है कि हृदय की धमनियों और नाभि की मज्जा के किसी प्रकार मिलन से ऋषभ स्वर का जन्म होता है

          भागवत पुराण, नारद पुराण आदि में भरत के ब्राह्मण रूप का भी चित्रण किया गया है जिसका सम्यक उपयोग होने से वह जड स्थिति में पडा रहता है इस कथा में राजा रहूगण कौन हो सकता है? इसका संकेत ऋग्वेद के सूक्तों से मिलता है(द्र. रहूगण शब्द पर टिप्पणी) ऋग्वेद .३७ - ३८ सूक्त आङ्गिरस अर्थात् अङ्गिरा/अङ्गिरस कुल में उत्पन्न रहूगण ऋषि के हैं । ऋग्वेद .७३ - ९४ सूक्त रहूगण के पुत्र गौतम ऋषि के हैं । इससे संकेत मिलता है कि रहूगण अवस्था अङ्गिरस कुल की कोई अवस्था है जैसा कि अङ्गिरस शब्द की टिप्पणी में कहा जा चुका है, आध्यात्मिक प्रगति की दो अवस्थाएं हैं - आदित्य और अङ्गिरस आदित्य तीव्र गति से प्रगति करने वाले हैं । यह देवों का मार्ग है अङ्गिरस मन्थर गति से प्रगति करने वाले हैं । यह मनुष्यों का मार्ग है फिर रहूगण से गौतम - गौ के सर्वोच्च रूप का उत्पन्न होना कहा गया है इससे संकेत मिलता है कि रहूगण अवस्था किसी प्रकार से गौ से भी सम्बन्धित है भरत के संदर्भ में सार्वत्रिक रूप से यह उल्लेख मिलता है कि उसने अश्वमेध यज्ञ करके इन्द्र हेतु यज्ञीय अश्वों का बन्धन किया यह कहा जा सकता है कि यह तो भरत का राजसिक रूप है जिसके द्वारा वह देवों को हवि प्रदान करता है ब्राह्मण रूप में वह मर्त्य स्तर की प्रजा को शिक्षित करता है अङ्गिरसों को दक्षिणा के रूप में अश्व नहीं दिया जा सकता, वह अश्व को नहीं संभाल सकते उन्हें तो गौ ही दी जाती है रहूगण शब्द के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है कि या तो यह रथ के रंहण पर आधारित है( जब रथ राजमार्ग पर ठीक प्रकार से नहीं चलता, तो उसे रथ का रंहण कहते हैं?), अथवा यह शब्द रुह, आरोहण पर आधारित है

राम भरत : रामायण में राम और भरत के जिस सम्बन्ध का व्याख्यान है, वह वैदिक साहित्य में प्रत्यक्ष रूप में उपलब्ध नहीं होता लेकिन पुराणों के ऋषभ और भरत के सम्बन्ध का उपयोग राम और भरत के सम्बन्ध की व्याख्या के लिए भी किया जा सकता है ब्रह्माण्ड पुराण ..१९.१२९ में वर्ष शब्द की निरुक्ति के संदर्भ में कहा गया है कि ऋष धातु रमणे अर्थ में है और वृष धातु रति या शक्ति के प्रबन्धन अर्थ में यदि ऋष धातु रमणे अर्थ में है तो यह सीधे राम की ओर संकेत करती है समाधि अवस्था में रमण और फिर समाधि से व्युत्थान की अवस्था में चेतना के निचले स्तरों का भरण राम दशरथ का ज्येष्ठ पुत्र है और भरत मध्यम

भरत और ब्रह्मौदन : पुराणों में कुछ स्थानों पर भरत को ब्रह्मौदन अग्नि का रूप कहा गया है गोपथ ब्राह्मण में वृष के दो शीर्ष कहे गए हैं - प्रवर्ग्य और ब्रह्मौदन यह दोनों ही उदान प्राण के रूप कहे जा सकते हैं । उदान प्राण का अर्थ होगा वह ऊर्जा जो पृथिवी द्वारा द्युलोक में स्थापित की गई है प्रवर्ग्य और ब्रह्मौदन में क्या अन्तर हो सकता है, इसके बारे में अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रवर्ग्य उदान का वह भाग है जिसका सम्बन्ध द्युलोक में स्थापित होने के पश्चात् पृथिवी से छिन्न हो जाता है इसके विपरीत, ब्रह्मौदन का सम्बन्ध पृथिवी से बना रहता है दूसरे शब्दों में, यह समाधि की ओर प्रस्थान और व्युत्थान की प्रक्रिया हो सकती है अथर्ववेद ११. तथा ११. सूक्त ब्रह्मौदन देवता के हैं । इन सूक्तों में प्रश्न उठाया गया है कि ब्रह्मौदन की ऊर्जा को देह के विभिन्न  अंग किस देवता के माध्यम से ग्रहण करे यदि सामान्य स्तर पर ब्रह्मौदन की ऊर्जा को ग्रहण करने का प्रयास किया जाएगा तो वह अङ्ग नष्ट हो जाएगा अतः जिस  अंग का जो देवता है, उसका आह्वान करके ही ब्रह्मौदन की ऊर्जा को ग्रहण किया जाता है लगता है कि भरत के संदर्भ में ब्राह्मण ग्रन्थों पुराणों में जो अश्वमेधों के उल्लेख मिलते हैं, उनका सम्बन्ध इसी ब्रह्मौदन के भरण से है यह उल्लेखनीय है कि भरत के संदर्भ में दो प्रकार के अश्वमेधों का उल्लेख मिलता है - ५५ अश्वमेध गङ्गा के टों पर सम्पन्न किए गए और ७८ यमुना के टों पर निहितार्थ अन्वेषणीय है

          पुराणों में भरत को विष्णु के शं का अवतार कहा गया है ऐसा प्रतीत होता है कि शं का अर्थ शंस है जिसका मूल भरत - पिता दु:शंस/दुष्यन्त/दु:षन्त में छिपा है

          जिस प्रकार भरत के पिताओं दुष्यन्त, ऋषभ दशरथ में साम्य है, ऐसा ही साम्य क्या माताओं में भी उपलब्ध है, यह अन्वेषणीय है ऋषभ पिता के संदर्भ में भरत की माता जयन्ती है, वह प्रकृति जहां द्यूत विद्यमान है लेकिन हार नहीं है, जीत है दुष्यन्त पिता के संदर्भ में भरत की माता शकुन्तला है शकुन की स्थिति भी प्रकृति की द्यूत स्थिति में होती है शकुन भारी अव्यवस्था के बीच व्यवस्था की अल्पकालिक स्थिति उत्पन्न होने से प्रकट होते हैं । दशरथ पिता के संदर्भ में भरत की माता कैकेयी है जिसका जन्म केकय देश में हुआ है जैसा कि डा. लक्ष्मीनारायण धूत ने कैकेयी की टिप्पणी में स्पष्ट किया है, केकय की एक निरुक्ति कय - कय - शब्दे के आधार पर की जा सकती है अथवा केका शब्द को मयूर के शब्द के आधार पर लिया जा सकता है पुराणों में कथन आता है कि ऋषियों के आश्रम में मयूर केका शब्द करते हैं । केका से अभिप्राय प्रतिध्वनि से हो सकता है क्योंकि मयूर द्वारा ध्वनि सुनकर उसकी प्रतिध्वनि करना सर्वविदित है अतः जब मर्त्य स्तर पर श्रुति के स्तर की प्रतिध्वनि होने लगे, तब केकय देश उत्पन्न होता है पहले जन्म में कैकेयी कलहा थी जिसे पुण्यदान मिलने से इस जन्म में वह कैकेयी रूप में पुण्यदाता की पत्नी के रूप में उत्पन्न हुई पुराणों में निर्देश है कि केकय देश में भरत की आराधना करे दूसरी ओर, अयोध्या में भरत को प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न किया गया लेकिन वह असफल ही रहा अयोध्या में राम की प्रतिष्ठा अपेक्षित है क्योंकि, अथर्ववेद १०..३१ के शब्दों में - 'अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या'

भरत - पुत्र : सार्वत्रिक रूप से, दशरथ - पुत्र भरत के पुत्रों का उल्लेख आता है - तक्ष पुष्कल लेकिन भागवत पुराण में ऋषभ - पुत्र भरत द्वारा पञ्चजनी के गर्भ से पुत्र उत्पन्न करने का उल्लेख आता है - सुमति, राष्ट्रभत्, सुदर्शन, आवरण, धूम्रकेतु इनमें से केवल सुमति के वंश का विस्तार दिया गया है जिसमें सोमयाग के ऋत्विजों जैसे उद्गाता, प्रस्तोता आदि नाम भी सम्मिलित हैं । ऋग्वेद की कईं ऋचाओं जैसे .१३६., .२४., .२५.१३, .४६.१९ आदि में मति के भरण की प्रार्थना की गई है ऋग्वेद १०.३१. में सुमति के भरण की प्रार्थना की गई है ऋग्वेद .३६. तथा .५३.२४ में मरुतों को भरत के पुत्र कहा गया है

वैदिक निघण्टु में भरता: शब्द का वर्गीकरण ऋत्विज नामों में किया गया है

 

This page was last updated on 07/12/15.